Tuesday, 4 October 2022

श्रद्धेय डॉ. प्रकाश बाबा आमटे


जीवन की सार्थकता क्या हैं अथवा निरर्थकता क्या हैं ऐसे प्रश्न कभी ना कभी हम सभी के मन मे आते ही रहते हैं. हमारी युववस्था मे, हो सकता हैं कि हम अच्छी नौकरी अथवा व्यवसाय, विवाह, घर गाड़ी आदि भौतिक प्राप्तियों को सार्थकता अथवा सफलता से जोड़े. परंतु हम जब हमारे जीवन के आखरी पड़ाव मे पहुँचते हैं तो हम जरा व्यापकता से हमारे जीवन को तोलते हैं, ऐसा मेरा मानना हैं. किसी कविता मे कहे जैसा...

आओ हिसाब लगाकर देखें हमने क्या खोया क्या पाया,
कितनी ले ली मोल बुराई या फिर आशीर्वाद कमाया!

हमारी सभ्यता मे भी तो जीवन के प्रतेक चरण को 25 वर्षों मे विभाजित कर ब्रह्मचार्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम एवं सन्यासाश्रम की कल्पना की गई हैं. साम्प्रत समय मे भले ही हम सन्यासाश्रम की अवधारना का पालन नहीं करते हो किन्तु हमारे माता-पिता, हमारे बड़े बुजुर्ग वानप्रस्थी की तरह हमारा मार्गदर्शन करते ही रहते हैं. दुर्भाग्य से मेरे पिता की वानप्रस्थी आयु देखना मेरे भाग्य मे नहीं आया. परंतु मैं सौभाग्यशाली हू कि मेरे भाग्य मे कई महानुभाव हैं जिनका स्नेह एवं मार्गदर्शन मुझे सदैव मिलता रहा हैं. वे मार्गदर्शन के नाते भले ही मुझे कुछ समझाते ना हो, परंतु उनके व्यक्तिव एवं कृतित्व से सदैव अनगिनत सी बाते सिखने को मिलती हैं. उनसे केवल संवाद मात्र से मुझे स्वकेंद्रित जीने की चिंताओं से परे होकर सोचने की प्रेरणा मिलती रही हैं.
पद्मश्री आदरणीय डॉ. प्रकाश बाबा आमटे जी ऐसी ही एक महान समाजसेवी हैं जिनको मैं मेरी बाल्यावस्था से जानता हू. वैसे तो उनका परिचय हम सभी को हैं, परंतु उनके जीवन एवं कार्य के प्रति हो सकता हैं हम मे से कुछ लोग थोड़े अनभिज्ञ हो. 1970 के दशक से वे और उनकी पत्नी डॉ. मन्दाकिनी आमटे (दोनों भी MBBS एवं पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टर्स) भामरागड़ परिसर मे लोगों को आरोग्य सेवाएं प्रदान कर रहें हैं. आरोग्य सेवाओं के साथ ही शिक्षा, ग्रामविकास आदि अनेक कार्यों के माध्यम से परिसर मे रहनेवाले निवासियों के जीवन मे उन्होंने अमूलाग्र बदलाव लाये हैं. उन दोनों के जीवन पर आधारित अनेक डॉक्यूमेंट्रीज और लेख प्रकाशित हुए हैं. नाना पाटेकर एवं सोनाली कुलकर्णी द्वारा अभिणित "डॉ. प्रकाश बाबा आमटे- द रियल हीरो" नाम की मूवी भी उन दोनों के जीवन पर आधारित हैं.
ज्ञात हो कि गडचिरोली जिले मे स्थित भामरागड़ यह महाराष्ट्र का अत्यंत पिछड़ा तहसील हैं. आज भी भामरागड़ तहसील के कई सारे गावों मे बस सुविधा उपलब्ध नहीं हैं जिनमे से मेरा गांव कुक्कामेटा भी एक हैं. अभी तक हम लोगों ने गांव मे टेलीफोन भी नहीं देखा हैं. कुछ युवाओं के पास मोबाइल हैंडसेट तो आये हैं परंतु मोबाइल की रेंज केवल भामरागड़ मे ही मिलती हैं. अब कल्पना की जा सकती हैं कि डॉ. प्रकाश आमटे और उनकी पत्नी डॉ. मन्दाकिनी आमटे 1970 के दशक हमारे परिसर मे आते हैं! आज भी यह परिस्थितियां हैं तो उस समय की हालांतें क्या रही होंगी? सोचने भर से कुछ शहरी लोग डर से सिहर जायेंगे! उन दिनों हमारे क्षेत्र में चिकित्सा सुविधा नाम की कोई भी चीज उपलब्ध नहीं थी. लोगों का जीवन केवल ईश्वर के सहारे चलता था. ऐसे मे इन देवदूतों का हमारे परिसर मे आना हमारे लिए ईश्वर के वरदान से कम नहीं हैं. 23 दिसंबर 2023 को उनके द्वारा स्थापित "लोक बिरादरी प्रकल्प, ग्राम-हेमलकासा" इस जनकल्याणकारी संस्था के 50 वर्ष पूर्ण होने जा रहें हैं.
गत 8 जून को उन्हें ब्लड कैंसर हुआ हैं ऐसे डॉक्टरों को पता चला. उस समय वे प्रसिद्ध बी. जे. मेडिकल कॉलेज के दीक्षांत समारोह मे डॉक्टरों को डिग्रीयां प्रदान कर रहें थे. तेज बुखार एवं अत्यंत कमजोरी के कारण उन्हें पुणे के ह्रदयनाथ मंगेशकर अस्पताल मे भर्ती करना पड़ा. पिछले तीन चार वर्षों से उन्हें तेज बुखार अक्सर रहा करता था एवं कमजोरी भी रहती थी. परंतु सामाजिक गतिविधियों में उनकी अत्यंत व्यस्तता के कारण उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. इस समाचार से हम सभी भामरागड़वासी एवं सर्वदुर महाराष्ट्र और भारत भर उन्हें जाननेवाले सभी लोग चिंतित हो बैठे. ईश्वर कृपा से डॉक्टरों ने उनका सफल इलाज किया. अभी उनका स्वास्थ्य ठीक हैं और डॉक्टरों का कहना हैं कि उनका ब्लड कैंसर अभी बेअसर हुआ हैं. यह हम सभी के लिए अत्यंत राहत की बात हैं. उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए सारे महाराष्ट्र एवं भारत भर मे पूजा-पाठ, होम-हवन किये गए. मुझे लगता हैं यह उनके समर्पित एवं त्यागमय जीवन की फलनिष्पत्ती हैं. यही तो जीवन की सच्ची पूंजी हैं.
भामरागड मे जाने पर मैंने भाऊ (डॉ. प्रकाश आमटे) के दर्शन लिए. उनसे संवाद करते हुए मैंने अनुभव किया कि इस कर्मयोगी ने ब्रह्मत्व को प्राप्त किया हैं. मृत्यु के द्वार पर जाकर वापस आने पर भी कोई जीत का जल्लोष नहीं अथवा भविष्य मे इस प्रकार की तकलीफ और उभर सकती हैं इसका निमिष मात्र भी डर नहीं. मैंने उनके मुख पर केवल संतोष का भाव ही पाया. बचे हुवे जीवन के क्षणों मे समाज को और क्या दे सकते हैं इस बात की योजना पाई. मैंने अनुभव किया- यही तो हमारे सभ्यता के महान ऋषियों भी किया होगा इसलिए वे सभी हमारे लिए प्रातः स्मरणीय बने. यही जीवन की वास्तविक जमा पूंजी हैं, यही जीवन की सच्ची सार्थकता हैं. मैंने मन मे ही सोचा... "यद्यमे सफलम जीवन, यद्यमे धन्य जीवितम"
मैंने आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम मे हिंदी मे कविता पढ़ी थी. भाऊ से जब भी मिलना हुआ उस कविता का स्मरण मुझे सदैव हुआ....

मुस्काओ तुम नभ मे जैसे बाल अरुण मुस्काता!
गाओ जैसे रोज सबेरे चिड़ियों का दल गाता!

देखो कहती नदी कि हरदम सब की प्यास बुझाना!
घने पेड़ कहते हैं तुम सब को छाया पहुँचाना!

दीप सुलग कर कहता हैं, तुम ऐसी ज्योति जगाओ,
भटक रहें जो अंधकार मे उनको को राह दिखाओ!

अपने लिए जिए जो उसको क्या जीना कहते हैं?
जीते हैं वे ही जो ओरों हित दुख सहते हैं!

ओरों की विपदा मे आते जो आते हैं सब दिन काम,
वो नरवर कर जाते हैं सदा देश का नाम!

अपने सुर मे पवन उन्ही की गाता गौरव गाथा,
उनके आगे झुक जाता हैं बड़े-बड़ों का माथा!

उनके आगे फिके लगते हैं सब राजदूलारें,
क्योंकि हुआ करते हैं वे जग की आँखों के तारे!

विजयादशमी के पावन अवसर पर मा दुर्गा एवं प्रभू श्रीराम के पावन चरणों मे पूज्य भाऊ के उत्तम स्वास्थ्य के लिए प्रार्थनायें!

Tuesday, 20 September 2022

Contributions of Tribal Heroes in India's Struggle for Independence

National Commission for Scheduled Tribes (NCST) under the ablest leadership of Shri Harshji Chauhan, Hon'ble Chairperson has been organizing seminars across the country in 125 universities to commemorate the invaluable "Contributions of the Tribal Freedom fighters in India's Struggle for Independence". Its important to note that the contributions of tribal freedom fighters in Indian freedom struggle are immense but their accounts find scarce mention in our academia and school curricula. This initiative led by Shri Harshji Chauhan is such an appreciable step particularly so since we have been celebrating "Azadi Ka Amrit Mahotsav" since a years time.

NCST, a constitutional body is created as per Article 338 A in 2004. Its deposed with the responsibility of protecting constitutional and legal rights of tribal people spread across India. It possess quasi-judicial powers and can summon the persons who do not discharge their responsibilities in this regard. It also is mandated to advise central and the state governments on the issues of development and planning for tribal people's overall wellbeing in the country. It publishes reports on various aspects of tribal rights and their development and submits them to the Hon'ble President of India as in when it deems fit.
Shri Harshji Chauhan, an alumnus of IIT Delhi, has done M. Tech. in Systems Management and has long standing experience of working for tribal people. He has remained associated with social activities since 1988 and established Shivganga(https://shivgangajhabua.org/aboutshivganga), an organization working for the socioeconomic and cultural development of tribal people in the Jhabua district in Madhya Pradesh state along with Padmashree Maheshji Sharma. The organization has been functioning since 1998 and has done stupendous job in improving livelihoods of tribal people along with orienting them to the sustainability approach.
Shri Harshji often observes that the governmental policies meant for the development of tribal people in the country are marred with image versus reality about them. Therefore, he has organized various dialogues called "Samvad" between the policy makers and the activists working at grassroot levels to fill in this gap. He holds that the objective behind any policy should be that of the empowerment of last person in the social ladder. That can only be done by taking care of their identity, existence and development particularly in relation to the scheduled tribes in India.

Tuesday, 23 August 2022

जे.एन.यु. की कुलपति प्रो. शांतिश्री जी के व्याख्यान पर निरर्थक विवाद

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की माननीय कुलगुरु प्रो. शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित जी ने डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर, नई दिल्ली मे "Dr. Ambedkar's Thoughts on Gender Justice: Decoding the Uniform Civil Code" माने "लिंग सम्बन्धी न्याय पर डॉ. अम्बेडकर के विचार: समान नागरिक संहिता की समझ" इस विषय पर अपने व्याख्यान का अंत 'बृहदारण्यकोपनिषद्' के "ॐ असतो मा सद्गमय।तमसो मा ज्योतिर्गमय।मृत्योर्मामृतं गमय ॥" इस श्लोक से किया. इस श्लोक का अर्थ हैं - मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥

मेरी कुछ व्यस्तताओं के कारण मेरी तिव्र इच्छा के बावजूद मैं व्यख्यान सुनने प्रत्यक्ष उपस्थित नहीं रह पाया. सुबह "Indian Express" जैसी पत्रिकाओं मे उनके भाषण के बारे मे पढ़ा तो मुझे भी उनका व्याख्यान कुछ अटपटा सा लगा. व्हाट्सप्प पे अनेक मैसेज सर्कुलेट होते देखे एवं पढ़े तो थोड़ा क्रोधित हुआ. फिर "जी न्यूज़" एवं "आज तक" जैसे चैनलों पर डिबेट सुनी तो वहां पर विचार रखनेवालों ने उनका व्याख्यान सुना ही नहीं हैं इसका अंदाजा आ गया. इसलिए मुझे लगा कि प्रो. शांतिश्री जी का पूर्ण व्याख्यान मुझे सुनना ही चाहिए.

डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर के यूट्यूब चैनल पर उनका पूर्ण व्याख्यान अपलोड किया हुआ हैं. आवाज बहोत धीमी हैं परंतु प्रयास करने पर बड़े आराम से सुना जा सकता हैं. मैंने उनका पूर्ण व्याख्यान एकाग्रता से सुना. (व्याख्यान की लिंक https://youtu.be/DsNDpcElqZ4)

इस लेख आरम्भ मे ही मैंने कहा हैं कि प्रो. शांतिश्री जी ने बृहदारण्यकोपनिषद् के श्लोक से अपने व्यख्यान कि समाप्ति क़ी. परंतु मैंने इस लेख के आरम्भ मे ही उनके व्याख्यान समाप्ति के वचनों को उद्धरूत किया और वह इसलिए क़ी प्रो. शांतिश्री जी के व्याख्यान को सुनें बगैर ही जो लोग अनर्गल बाते कर रहे हैं उन्हें असत्य से सत्य और अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की आवश्यकता हैं. उसके लिए किसी कठिन साधना की आवश्यकता नहीं हैं. डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर मे प्रो. शांतिश्री जी द्वारा दिये गए पूर्ण व्यख्यान को सुनकर बड़ी आसानी से उसकी सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं.

उनके व्याख्यान को पूर्णता से सुनने के उपरांत जो लोग उन्हें वामपंथी अथवा अन्य सारी उपाधियों से आभूषित कर रहे हैं, उनकी सोच कितनी उथली हैं इसका पता चलता हैं. महत्वपूर्ण बात यह हैं कि यह एक ऐसा वर्ग हैं जो सत्य को उसके पूर्णत्व के साथ जाने बगैर ही अपने निष्कर्षों तक पहुँचता हैं. और एक दूसरी जमात हैं जिसके दम्भ की कोई सीमाएं नहीं. अपनी पहचान को आधार बनाते हुए इस वर्ग ने पूरे समुदाय को उनके संकुचित हितों के लिए बंधक बना रखा है. इसलिए यह मेरा मानना हैं कि सही सोच रखनेवाले व्यक्तियों को इन दोनों भी प्रकार के पाखंडी समूहों के सोच-विचार से दरकिनार कर लेना चाहिए. बृहत हिन्दू समाज की एकता, सद्भाव एवं समरसता के लिए ऐसा करना समय की आवश्यकता हैं.

हमारे भगवान ब्राह्मण समुदाय से नहीं हैं इसका तात्पर्य भगवानों को जातियों मे बाँटने से नहीं अपितु सामाजिक समरसता को स्थापित करने से हैं. और यह प्रो. शांतिश्री जी का निजी अन्वेंशन नहीं अपितु हमारी पुरातन एवं सनातन सभ्यता के गहन अधेताओं का मानना हैं. जनजाति समाज मे बड़ा देव, बुड़ा देव अथवा पेरसा पेन इन नामों से अनादि काल से भगवान शिव की अर्चना होती आई हैं. भगवान जगन्नाथ की पूजा एवं रथ को ओढने का पहला अधिकार भी तो जनजाति समाज के लोगों को जाता हैं. आचार्य विनोबा भावे ऋग्वेद को जनजातियों का ग्रन्थ मानते हैं क्योंकि आरण्यक संस्कृति के अनेक आख्यान उसमे उद्धरूत हैं. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, क्षुद्र एवं जनजाति समाज का प्रतिनिधि निषाद इन पंच जनों का वर्णन ऋग्वेद मे हैं ऐसा वेदों के अभ्यासकों का मानना हैं.

जातिव्यवस्था का वर्णन वेदों मे नहीं एवं वर्ण किसी के जन्म को आधार मानकर नहीं अपितु व्यक्ति के कर्म पर निर्धारित होता था यही तो हम सनातनी कहते आये हैं. आधुनिक समय मे जातियाँ जन्माधारित बनी और हमारे समाज को विखंडित करने का कारण भी बनी. उनमे से जो जाती अपने आप को समाज धुरी मानती हैं और उसे एक सूत्र मे पिरोने का दाइत्व निभाने मे अग्रणी भूमिका मे रही हैं , उसके कुछ व्यक्तियों को इतना आहत होने की क्या आवश्यकता हैं?

अब बात करते हैं दूसरे वर्ग की. इस वर्ग सम्बंधित कुछ व्यक्ति जो सामाजिक गतिशीलता मे ऊपरीले पायदान पर जा बैठे, उन्होंने अपने हितों को अपने वर्ग के हितों के रूप दिखाया. शायद इसलिए बाबासाहब अम्बेडकर कह गए, "मुझे पढ़े लिखें लोगों ने धोखा दिया". प्रो. शांतिश्री जी के व्याख्यान पर चर्चा करते एक दलित चिंतक को मैंने आर्य आक्रमण के सिद्धांत को सही ठहराते हुए सुना. ऐसा करते हुए वह बाबासाहेब का सन्दर्भ दे रहे थे. उन बेचारे को यह पता ही नहीं हैं कि "Who Were Kshudras- क्षुद्र कोन थे" इस किताब मे बाबासाहब ने मानववंश शास्त्र सम्बन्धी तर्क देते हुए 'आर्य आक्रमण सिद्धांत' को पूरी तरहा से नकारा हैं. भारत के संविधान को संविधान समिति के सामने पेश करने के एक दिन पहले याने की 25 नवंबर, 1949 दिये गए उनके भाषण को इस प्रकार के लोगों को सुनना चाहिए कि वे ग्रामर ऑफ़ अनार्की के सन्दर्भ मे क्या कह रहे हैं, वे अपने ही समाज एवं देश से गद्दारी करनेवालों पर क्या टिपणी कर रहे हैं, भारत की पुरातन राजनितिक व्यवस्था एवं परंपराओं के सन्दर्भ मे क्या कह रहे हैं. मैं इस वर्ग के लोगों को अज्ञानी अथवा नादान नहीं मानता. वास्तव मे स्वार्थी, स्वयंकेंद्रित एवं राष्ट्रीय एकता एवं संप्रभूता को बाधित करनेवाली मानसिकता से ग्रसित हैं. कुछतो ऐसी षड़यंत्रकारी ताकतों से मिले हुए हैं. अन्यतः अपने देश मे मूलनिवासी-गैर-मूलनिवासी, आर्य-द्रविड़ ये विचार कैसे पनपते.

इस सब के बावजूद, क्या इस बात को नकारा जा सकता हैं कि जातिगत बुराइयाँ हमारे समाज मे व्याप्त हैं? क्या हमारे समाज के कुछ तबके औपनिवेशीक शासन से स्वाधीनता के 75 वर्षों के पश्चात् भी अत्यंत पिछड़े नहीं रह गए हैं? क्या हमारे समाज मे जातिगत भेद पूरी तरह से समाप्त हो चूका हैं? क्या लिंग भेद एवं स्त्री सबलीकरण पर बात आवश्यक नहीं हैं? हम आँखे मुंद नहीं सकते.

आनेवाले पीढ़ीयों के लिए बेहतर समाज एवं बेहतर देश निर्माण करने की भूमिका हमारे समाज के विविध क्षेत्रों मे कार्यरत धुरिनों को निभानी हैं. इस कार्य मे उन्हें कभी -कभी अप्रिय बातें भी करनी पडती हैं. उससे तात्पर्य समाज को विभाजित करने से नहीं होता अपितु समाज को योग्य दिशा मे विचार करने के लिए बाध्य करने से होता हैं. मुझे लगता हैं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की माननीय कुलगुरु प्रो. शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित जी ने अपने डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर मे दिये हुए व्याख्यान मे वही किया हैं.

Thursday, 7 July 2022

राकेट्री: द नम्बी इफ़ेक्ट



महान वैज्ञानिक डॉ. नम्बी नारायणन जी पर फ़िल्माया "राकेट्री: द नम्बी इफ़ेक्ट" फ़िल्म कल देखा| डॉ. नम्बी नारायणन के जीवन के प्रेरणादायक क्षण, भारत के स्पेस रिसर्च मे उनके योगदान, राष्ट्र के प्रती समर्पण भाव एवं त्याग यह देखकर छाती अभिमान से फूलती है| परंतु यह देखकर कि इतने महान एवं प्रतिभाषाली वैज्ञानिक के साथ कितना निम्न एवं क्षुद्र प्रकार का व्यवहार किया गया, छाती क्रोध से धधक उठती है| उद्विग्नता से हम यह खुद से पूछ बैठते है "हेची फळ का मम तपाला?" माने 'मेरे तप का क्या यही फल मुझे मिलना था?' 

मदुराई में मैकेनिकल इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के बाद, नम्बि साहब ने 1966 में इसरो में थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन पर एक तकनीकी सहायक के रूप में अपना करियर शुरू किया। उन्होंने नासा फेलोशिप अर्जित की और 1969 में उन्होंने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया । उन्होंने प्रोफेसर लुइगी क्रोको के मार्गदर्शन में केमिकल राकेट प्रोपल्शन में अपना मास्टर का अध्ययन पूर्ण किया। उनकी लिक्विड प्रोपल्शन की एक्सपरटाइज भारत के लिए अत्यावश्यक रही क्योकि तब तक भारत की रॉकेट्री की तकनिकी केवल सॉलिड प्रोपलेंट्स पर ही निर्भर थी। 
 

उनके अथक प्रयास, टैलेंट एवं व्यवस्थापन कौशल के ही कारण 'विकास राकेट इंजन' का निर्माण भारत में किया गया कि जिसके माध्यम से PSLV एवं GSLV रॉकेट्स का अंतरिक्ष में प्रक्षेपण किया जाता है। आज भी विकास इंजन की सटीकता बरक़रार है। उन्ही के नेतृत्व में क्रोयोजेनिक इंजन का विकास होना था। परन्तु उनपर यह तकनिकी पाकिस्तान को पैसे के लालच में बेचने की आरोप लगाए गए। उन्हें अरेस्ट किया गया और उनका पुलिस और IB के लोगो ने भयंकर टार्चर किया । यह निश्चित रूप से उनकी देशभक्ति, प्रतिभा और राष्ट्र के लिए बलिदान का भद्दा मजाक था। 

यह हमें नहीं भूलना चाहिए कि उन्हें नासा में काम करने का बहुतही आकर्षक मौका मिला था। अगर वे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में अध्ययन के बाद अमेरिका में ही रह जाते, वे खूब पैसा और शौहरत कमा लेते। परन्तु उन्होंने पैसो से ज्यादा अपने देश के हितों को अहमियत दी और NASA के प्रस्ताव को ठुकराते हुए ISRO के स्पेस रिसर्च कार्यक्रम से ही जुड़े रहे। 


इन आरोपों के कारण उनका करियर और उनका कौटुम्बिक एवं सामाजिक जीवन एक प्रकार से ध्वस्त ही हुआ। इस मुद्दे से जुड़े दो पहलू हैं। पहला, केरल की क्षुद्र राजनीति और दूसरा, अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र। अंतर्राष्ट्रीय षडयंत्र तो समझा जा सकता है। बड़े राष्ट्र विशेषकर अमेरिका, उन दिनों में भारत को स्वयभू होने नहीं देना चाहते थे। भारत का ISRO के वैज्ञानिकों के कारण स्पेस रिसर्च में विक्सित होना और अन्य राष्ट्रों, अमेरिका आदि. पर हमारी निर्भरता समाप्त होना उनको मंजूर नहीं था। इसी के साथ, हम अन्य राष्ट्रों को बहुत ही किफायती दरों में उनके स्पेस स्याटेलाइट प्रक्षेपणों में सहायता कर सकते थे जिससे भारत का रुतबा अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और ही उभर जाता। 


परन्तु भारत में क्षुद्र राजनीती का क्या कहा जाए? अपने ही देश में वह कोनसी शक्तिया थी जो भारत को उभरते हुए नहीं देखना चाहती थी? आखिर वह कोनसे राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने अपने क्षुद्र राजनितिक हितों के चलते भारत के प्रगति में इतना बड़ा रोड़ा डाला? वह कोनसे अधिकारी थे जिन्होंने अपने आकाओं की गुलामी करतें इतने माहान और प्रतिभाशाली वैज्ञानिक को इस तरह प्रताड़ित किया? 

डॉ नम्बि नारायणन साहब को भारत के उच्चतम न्यायालय ने बाइज्जत बरी किया यह ख़ुशी की बात है। परन्तु यदि वे दोषी नहीं तो वह कौन है जो इस षड्यंत्र में शामिल थे इसका पूरा पता लगाना अभी बाकि है। हमें एक राष्ट्र के रूप में यदि अंतररष्ट्रीय परिदृश्य में सीना तानकर और सर उठाकर कर चलना है तो ऐसी शक्तियों का इलाज समय पर होना अत्यावश्यक है। 

इस फिल्म के लिए R Madhvan का ह्रदय से आभार। उनका अभिनय हृदयस्पर्शी है और अत्यंत उतकृष्ट फिल्म उन्होंने बनाई है। इसके लिए उन्होंने चार-साढे साल का खासा समय लगाया है। उनकी टीम को हार्दिक बधाई। सब को अवश्य देखने जैसी फिल्म है। अवश्य देखें।

Friday, 18 February 2022

My View of the NCST's Internship Program


Grateful to National Commission for Scheduled Tribes (NCST) for having me invited to conduct mentoring sessions with interns participating in its national internship program. Had the opportunity to conduct sessions on "Primary Data Research in Social Sciences" and "Scheduled Tribes in India-Society and Culture: Central India".

The 2011Population Census of India estimates the Scheduled Tribes population to be around 8.6% of India's total population. Based on the position of Scheduled Tribes' population, they have been located in four different zones namely Northern and North Eastern Zone (Zone-1), Central Zone (Zone-2), South Western Zone (Zone-3) & Scattered Territories of Andman and Nicobar Islands (Zone-4).

Central India's 8 administrative regions i. e., Madhya Pradesh (14.69%), Maharashtra (10.08%), Odisha (9.2%), Rajasthan (8.86%), Gujarat (8.55), Jharkhand (8.29%), Chhatisgarh (7.5%), and Andhra Pradesh & Telangana (5.7%) host tribal people hugely. Seven Indian States i. e., Madhya Pradesh, Maharashtra, Odisha, Gujarat, Rajasthan, Jharkhand and Chhattisgarh alone constitute around 2/3 of India's total tribal population.

The trends in relation to socio-economic and political development of tribal communities in India are not satisfactory even after 75 years of independence. Though India's constitution makers and the successive governments have arranged for many positive provisions, their substantive implantation still illudes. The provisions enshrined in the 5th and 6th Schedules, Panchayat Extension to the Scheduled Areas Act (PESA), 1996, Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006 etc. need to be implemented more substantively. Furthermore, certain provisions in these legislations might be in need of revision. Therefore, there is a strong need of real time understanding of the situation prevailing on the ground and data that's needed for further action to resolve long pending issues concerning tribal people in India.

It's therefore, this particular initiative by NCST under the ablest leadership Shri Harsh Chauhan Ji, Hon'ble Chairperson, NCST and his team, is such an appreciable step. As a part of this national level internship program graduates, postgraduates and research scholars from different educational institutions and universities in India would be regularly recruited on a paid internship. The interns thus recruited would be imparted with rigorous training sessions in terms of acquainting them with tribal life and culture. They would also be oriented to various research methods in social sciences before placing them in various tribal districts  for field studies. In the last part of the program, the interns are required to submit their on field experiences in the form of a well designed report.

The ongoing internship program is being jointly conducted by NCST and Rishihood University, Sonepat on the latter's beautiful and sprawling academic campus. It has 25 interns from different parts of India who would carry out their field studies in the districts located in different parts of India. It's quite an overwhelming experience to witness the astute hardwork being put in by the NCST and Rishihood University's team.

Tuesday, 8 February 2022

प्रिय लता ताई…..



गडचिरोली जिल्ह्यातल्या एका छोट्या गावात वाढत असतांना मला माझ्या बाबांनी तुझी गाणी ऐकवली. माझे बाबा भजन छान गात असत. तुझे पंडित भीमसेनजी सोबत गायलेले "बाजे रे मुरलिया.." हे गीत त्यांनीच ऐकवले. लहानपणी ते तेवढे आवडले नाही. मोठा झाल्यानंतर मात्र तुमच्या दोघांच्या स्वरातले ते गीत कीतीदा ऐकले त्याची गणती मला करवता येणार नाही.



मला वाटतं मी तीसरीत होतो. आमच्या गावात सालेवार कपडे विकायला आणत असत. लहानपणी आमच्याकडेच काय तर सम्पूर्ण गावात कोणाकडेही रेडिओ नवतं. टेपरेकॉर्डर तर दूरची गोष्ट. एकदा एक सालेवार काका रेडिओ वाजवत त्यांच्या कपड्यांच्या दुकानात बसले होते. त्यांच्या रेडिओवर "जब से मिलें नैना तुमसे मिलें नैना.." हे गाणे चाललेले. मला बोल कळत नव्हते कारण मला त्या वयात हिंदी समजत नव्हती. पण मला तुझा आवाज आणि त्या गाण्याची धुन भुरळ पाडून गेली. मला जमेल तसे ते गाणे कित्येक दिवस मी गुणगुणत राहिलो.

जसजसा मोठा होत गेलो, तुझी अनेक गाणी ऐकली आणि ऐकतच राहिलो. दहावित असतांना गडचिरोलीच्या होस्टेलला पड़लेलेल्या सुट्टीच्या दिवसांत संघ कार्यालयात राहायचो. तेथे एक टेपरेकॉर्डर होते. मुख्यता संघ गीतांचे कैसेट्स कार्यालयात होते. मला कोणाकडून तरी "सर पे हिमालय का छत्र है, चरणों मे नदिया एकत्र है..", "आकाश के उस पार भी आकाश है..." ही गाणी मुद्रीत असलेले कैसेट मिळाले. कार्यालयात कोणी नसतांना ती सगळी गाणी कीतीदा तरी ऐकली. अकरव्या वर्गात शिकत असतांना एकदा शिक्षकांनी गाणी कोण छान म्हणतो म्हणून विचारले. मी तसा जरा लाजरा-बुजराच पण तू गायिलेले "सर पे हिमालय का छत्र है.." हे गाणे गाण्याची उर्मी काही केल्या शमेना. मग काय उठलो, शिक्षकांना म्हणालो मला गाणे गायचेय. गाणे छान जमले आणि वर्गात सगळ्यांची वाह-वायकी कमावली. अश्या किती तरी आठवणी तुझ्या गाण्यांशी जुळलेल्या आहेत.

स्मार्ट फ़ोन हाती आल्यानंतर तुझी मराठी आणि हिंदी मधली अनेक भजनं ऐकलीत. संत ज्ञानेशाच्या "अवचित परिमळू, झुळकला आळूमाळू", "पैल तो गे काऊ कोकताहे.." ह्या रचना तुझ्या आवाजात अगदी जिवंत होतात आणि तल्लीन करुन सोडतात. "गजानना श्री गणराया आधी वंदु तुज मोरया..", "गणराज रंगी नाचतो.." ही गाणी कोणत्या मराठी माणसानी ऐकली नसतील? "श्रीरामचंद्र कृपालु भजमन.." किंवा "पायो जी मैंने रामरतन धन पायो.." आदि प्रभु श्रीरामाची गीत कोणास राममय करुन सोडली नसतील? "ए मेरे वतन के लोगों" ने तर पंडित नेहरूजी सारख्या पुढाऱ्यांच्या डोळ्यात अश्रु आणुन सोडले. या गाण्यातून तू आमच्या वीर सैनिकाना श्रद्धांजलि देवून त्यांस अणि त्यांच्या बलिदानस अमर केलस   

कवी ग्रेसची कवीता "भय इथले संपत नाही..." तुझ्या आवाजात कशी कातरवेळी घेवून जाते! "सीली हवा छू गई, सीला बदन छिल गया.." हे तू गायिलेले गीत पण त्यातलेच एक. "राम तेरी गंगा मेली" किंवा "हीना" या चित्रपटांत तू गायीलेली सीने गीते, त्यामधे तू घेतलेला आलाप अगदी रानात कोकिळा जशी करते ना तसेच वाटतात. एकट्यात तुझी गाणी ऐकताना वेळ कसा अगदी भूरर्कन उडून जातो हे कळतच नाही. जेव्हा तंद्री टूटते, बराच उशीर झालेला असतो. तू विश्वाला भारावून, अगदी तल्लीन करुन सोडलंस आणि सदैव करत राहशील.

म्हणून तू आज  इथे नाहीस असे म्हणवतच नाही. तुझ्या गाण्यामधून तू सदैव आमच्यात आहेस. कोणी थकूनभागुन घरी येईल आणि तुझी गाणी ऐकेल, निश्चितच तो ताज़ा आणि टवटावीत होईल. आंतर आणि बाह्य  गोष्टीतुन येणाऱ्या नैराश्य आणि पराभावा सारख्या अत्यंत घातक भावनांमधून बाहेर पड़ण्यास तुझ्या गाण्यामधून तू अनेकांचे साह्य करतच राहशील. एकाग्र आणि तल्लीन होण्यास तुझी गाणी कारणीभुत होतच राहतील. तू इथेच आहेस आणि सदैव राहशील. तुला वंदन!

हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों में भारतीयता का विरोध क्यों ?



 माननीय राष्ट्रपतीजी के बजट सत्र पर अभिभाषण के उपलक्ष्य मे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए निम्न पंक्तियाँ उद्धृत की...

वो जो दिन को रात कहें तो तुरंत मन जाओ,

नहीं मानोगे तो वो दिन मे नकाब ओढ़ लेंगे!

जरुरत हुई तो हकीकत को थोड़ा बहुत मरोड़ लेंगे!

वो मगरूर है खुद की समझ पर बेइंतहा,

उन्हें आईना मत दिखाइए, वो आईने को भी तोड़ देंगे!

 

प्रो. शांतिश्री पंडितजी के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलुगुरु नियुक्त होने पर समाज के विविध घटकों से, विशेषकर अकादमीक जगत से जुड़े व्यक्तियों द्वारा अभिनन्दन की वर्षा होना स्वाभाविक प्रतिक्रिया है. उनके जैसे भारतीय विचारों से प्रेरित शिक्षाविदों का राष्ट्र की प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों के अत्यंत महत्वपूर्ण प्रशासकीय दाइत्वों पर नियुक्त होना सकारात्मक पहलकदमी है. प्रो. पंडित जैसे शिक्षा जगत से जुड़े व्यक्तियों का ऐसे महत्वपूर्ण दाइत्वों पर नियुक्त होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीती का हमारे शिक्षा संस्थानों मे लागु होना है. अभी तक की हमारी शिक्षा नीतियाँ प्रायः औपनिवेशिक अथवा सरल शब्दों मे पश्चिम से आयातित विचारों से प्रणीत थी. अगर आगामी राष्ट्रीय शिक्षा नीती का भारतीयता मे अंतर्निहित होना आवश्यक है तो प्रो. पंडित जैसे लोगों का नेतृत्व इस दिशा मे मील का पत्थर साबित होगा. परन्तु कल से उनके नियुक्ति के उपरांत कुछ तथाकथित बौद्धिक लोग या फिर जिन्हे साम्प्रत काल मे "लेफ्ट-लिबरल इंटेलेक्चुअल" कहा जाता है, उन्होंने असत्य और षड़यंन्त्रों की उल्टी करना शुरू कर दिया है जैसा कि वो आम तौर पर करते आये है. इसलिए माननीय प्रधानमंत्री द्वारा उद्धृत उपर्युक्त पंक्तियाँ उन्हें समर्पीत करने जैसी है.

 



प्रो. शांतिश्री पंडित म्याडम के संपर्क मे मैं गत कई वर्षों से राहा हू. मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानता हू कि मुझे उनका मार्गदर्शन एवं अभिभावक जैसा स्नेह सदैव मिलता राहा है. मूलतः वे तमिल और तेलगु भाषिक है और उनका सारा अध्ययन अंग्रेजी माध्यम मे हुआ है. परन्तु जब से उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय मे अध्यापन का दाइत्व संभाला, उन्होंने मराठी मे बोलना एवं पढ़ना सीखा. उनके साथ के वार्तालाप मे उन्होंने मुझसे कहा "अरे, विवेक, हमारे विश्वविद्यालय मे प्रमुखता से छोटे छोटे गावों से मराठी माध्यम मे पढ़ने वाले छात्र आते है. उन्हें शुरुवात मे अंग्रेजी ठीक से समझ नहीं आती है. उन्हें अगर अंग्रेजी मे पढ़ाया जाए तो उनके कुछ भी समझ मे नहीं आएगा. वे परीक्षा के उत्तर भी तो मराठी मे ही लिखते है. इसलिए मुझे मराठी बोलना एवं पढ़ना सीखना अनिवार्य था." इससे अपने छात्रों के प्रती वे कितनी संवेदनशील रही है इसका अंदाजा हम सबको होगा.

 


मेरे जैसे अकादमीक यात्रा के प्रारंभिक पड़ाव पर खड़े कई लोगों का उन्होंने मार्गदर्शन किया है. उनका सदैव उत्साहवर्धन किया है. यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर कह राहा हू. कोरोना काल के शुरुवाती समय मे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद वर्धा द्वारा छात्रों एवं शोधार्थियों के लिए व्याख्यानमाला चलाई जा रही थी. म्याडम तब अपने पती के स्वास्थ्य के देखभाल हेतु अमेरिका मे रह रही थी. मैंने उन्हें फ़ोन करके व्याख्यानमाला मे मार्गदर्शन का आग्रह किया. उन्होंने बड़े उत्साह के साथ प्रस्ताव का स्वीकार किया एवं आयोजकों को बधाई दी. ऐसे अन्य कई अवसरों पर उन्हें मैंने आमंत्रित किया. मेरे जैसे सामन्य व्यक्ती के साथ कार्यक्रम करने मे भी उन्होंने हिचकिचाहट नहीं की किंतु मुझे प्रोत्साहित ही किया. वो इसलिए कि हम भी उनके अनुभव से कुछ सीखें और आनेवाले दिनों मे अपने आप को एक अच्छे अकादमीक के रूप मे स्थापित करें.

 


पिछले एक-दो दिनों मे, विशेषकर उनके उपकुलुगुरु के दाइत्व पर नियुक्ति के उपरांत उनके बारे अनेक षड्यंत्रकारी बातें प्रसारित की जा रही है. कुछ सोशल मिडिया ट्रोलर्स सक्रिय भूमिका मे आ गए है. बिना जाने कुछेकों ने तो उनके अकादमीक साख पर भी सवाल उठाना शुरू कर दिया है. उन्हें शायद पता नहीं इसलिए उनके जानकारी के लिए कह दू उनके पिता जी तमिलनाडु कैडर के प्रशासकीय अधिकारी थे. उन्होंने Ph. D. कर रखी थी. उनकी कई किताबें प्रकाशीत है. उनकी माता जी  पिटर्सबर्ग विश्वविद्यालय (रूस) मे तमिल एवं भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्यापन केंद्र शुरू करने वाली प्रथम प्राध्यापिका रही है. प्रो. शांतिश्री म्याडम का जन्म भी वही हुआ है. सेंट जेविर महाविद्यालय, चैन्नई मे स्नातक एवं परा-स्नातक की पढ़ाई मे वे गोल्ड मैडलिस्ट रही है. जे. एन. यू. के अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन केंद्र से उन्होंने एम. फील. और पीएच. डी. किया है. गत तीन साडे तीन दशकों से वे गोवा विश्वविद्यालय एवं सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय मे अध्यापन का कार्य वे निरंतरता से कर रही है. इसके साथ ही उन्होंने विविध शासकीय संस्थाओं मे अनेक दाइत्व निभाए है. यह सब उनके अविरत तप का फल है.

 


एक विशेष प्रकार का अकादमीक गिरोह उन सब को अपमानित करने के षड़यंत्रो मे सदैव सक्रिय रहता है जो उनकी मनमुताबिक योजनाओं के हिसाब से कार्य नहीं करते. उनके जैसी सोच न रखने पर उन्हें अनेक अग्नी परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है. इसमें हमें कतई संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि इन्होने आर. सी. मुजमदार जैसे इतिहासकारों पर साम्प्रदाईकता को बढ़ावा देने तक का लांछन लगाया है. पश्चिम के विचार एवं सिद्धांतो को जस के तस रटकर उन्हें भारतीय परिप्रेक्ष थोपना यही उनके लिए बौद्धिकता की निशानी है. अब समय आ गया है कि राष्ट्रवादी एवं भारतीयता के विचारों की मशाल ले चलनेवाले सभी को इस प्रकार की मानसिकताओं का डटकर विरोध करना होगा.