"What is taught in the classrooms today will be the philosophy of government tomorrow." This oft-quoted observation, attributed to Abraham Lincoln, underscores a profound truth that education is not merely about producing employable individuals. It is about shaping a civilization's character, values, and intellectual orientation. The future of a nation is determined not only by its economic policies or political institutions but by the philosophy that guides its education.
Reflections (Vivekanand Nartam)
Friday, 26 June 2026
Reclaiming Education: From Colonial Conditioning to Civilisational Awakening
Monday, 22 June 2026
मानसून की पावन लय: अंबुबाची, रज पर्व और तल्लिन पंडुम
जैसे-जैसे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर मानसून के बादल घिरने लगते हैं, विभिन्न क्षेत्रों के विविध समुदाय ऐसे उत्सवों को मनाने की तैयारी करते हैं जो उर्वरता, नारीत्व, मातृभूमि और प्रकृति की पुनर्योजी शक्तियों का सम्मान करते हैं। यद्यपि ये परंपराएँ भौगोलिक स्थिति, भाषा और सामाजिक पहचान के आधार पर एक-दूसरे से भिन्न दिखाई देती हैं, फिर भी ये भारत की सांस्कृतिक संरचना में व्याप्त एक अद्भुत सभ्यतागत निरंतरता को उजागर करती हैं।
असम में कामाख्या मंदिर में मनाया जाने वाला "अंबुबाची" देवी के वार्षिक रजस्वला होने का प्रतीक है। ओडिशा में "रज पर्व" धरणीमाता के रजस्वला होने और उसके पुनरुत्थान का उत्सव है। वहीं गडचिरोलीऔर बस्तर के वनों में माड़िया जनजातीय समुदाय "तल्लिन पंडुम अथवा बीजा पंडुम" का आयोजन करता है, जिसमें बुवाई के मौसम के आरम्भ से पूर्व धरणीमाता और पूर्वज देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
पहली दृष्टि में ये परंपराएँ एक-दूसरे से भिन्न प्रतीत हो सकती हैं। किंतु गहराई से देखने पर एक ऐसी साझा दृष्टि सामने आती है जो नारीत्व की पवित्रता, स्त्री की सृजनात्मक शक्ति, धरती की उर्वरता और मानव जीवन तथा प्रकृति के मध्य घनिष्ठ संबंध को स्वीकार करती है। ये सभी मिलकर यह दर्शाती हैं कि भारत की विविध आध्यात्मिक परंपराएँ ऐतिहासिक रूप से सह-अस्तित्व, पारस्परिक प्रभाव और साझा सांस्कृतिक संवेदनाओं के माध्यम से विकसित हुई हैं।
अंबुबाची : देवी के रजस्वला होने का उत्सव
असम के कामाख्या मंदिर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला अंबुबाची, जून के महीने में (22 जून, 2026), पूर्वी भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक है। इसे प्रायः “पूर्व का महाकुंभ” कहा जाता है, जो भारत और विश्व के विभिन्न भागों से लाखों श्रद्धालुओं, साधुओं और तांत्रिक साधकों को आकर्षित करता है।
यह उत्सव शक्ति की सर्वाधिक पूजनीय अभिव्यक्तियों में से एक देवी कामाख्या के वार्षिक रजस्वला होने का स्मरण कराता है। इस अवधि में मंदिर तीन दिनों तक बंद रहता है, जो देवी के मासिक धर्म और सार्वजनिक पूजा से उनके अस्थायी विराम का प्रतीक है। मंदिर के पुनः खुलने पर श्रद्धालु उर्वरता, समृद्धि और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ा आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
अंबुबाची का प्रतीकवाद अत्यंत गहन है। यहाँ मासिक धर्म को अशुद्ध या लज्जाजनक नहीं माना जाता। इसके विपरीत, उसे पवित्रता के सर्वोच्च स्तर तक प्रतिष्ठित किया जाता है। देवी रजस्वला होती हैं क्योंकि वे स्वयं सृष्टि का स्रोत हैं। उनका मासिक चक्र एक लौकिक घटना बन जाता है, जो भूमि की उर्वरता और मानसून की वर्षा के आगमन से जुड़ जाता है।
ऐसा दृष्टिकोण एक ऐसी सभ्यतागत समझ को प्रतिबिंबित करता है जो स्त्री शरीर को अशौच का विषय नहीं, बल्कि सृजनात्मक ऊर्जा की अभिव्यक्ति के रूप में देखती है।
रज पर्व : जब मातृभूमि विश्राम करती है
इसी प्रकार का एक दार्शनिक विचार ओडिशा के रज पर्व में दिखाई देता है, जो मानसून के आगमन के समय जून माह में मनाया जाता है। यह उत्सव भूदेवी अर्थात् मातृभूमि को समर्पित है, जिनके बारे में माना जाता है कि इस अवधि में वे रजस्वला होती हैं। इस दौरान हल चलाने और भूमि की खुदाई जैसी कृषि गतिविधियाँ परंपरागत रूप से रोक दी जाती हैं, जिससे धरती को अगले कृषि चक्र के लिए बीज ग्रहण करने से पूर्व विश्राम और पुनर्जीवन का अवसर मिल सके।
इस उत्सव के केंद्र में महिलाएँ और युवतियाँ होती हैं। नए वस्त्र, झूले, लोकगीत, पारंपरिक व्यंजन और सामुदायिक समारोह इसकी विशेषताएँ हैं। मातृभूमि का रजस्वला होना उर्वरता, समृद्धि और पुनर्नवीकरण का प्रतीक बन जाता है।
रज पर्व समाज को यह स्मरण कराता है कि सृजन के लिए विश्राम भी आवश्यक है। जिस प्रकार स्त्रियाँ जैविक चक्रों का अनुभव करती हैं, उसी प्रकार प्रकृति भी पुनरुत्थान की लयों का अनुसरण करती है। मनुष्य इन लयों से पृथक नहीं हैं, बल्कि उनके सहभागी हैं।
तल्लिन पंडुम: धरित्री के प्रति जनजातीय श्रद्धा
मानसून के आगमन से पूर्व मनाए जाने वाले इस उत्सव में बीजों का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है तथा धरती माता और कुल-देवताओं को अनुष्ठानिक अर्पण किए जाते हैं। कृषि कार्य प्रारंभ करने से पहले समुदाय समृद्धि और दैवीय संरक्षण की कामना करता है।
माड़िया भाषा में “तल्लिन” शब्द का अर्थ माता है, जबकि “पंडुम” का अर्थ उत्सव होता है। इसका नाम ही जीवन और आजीविका के स्रोत के रूप में धरित्री के प्रति समुदाय की श्रद्धा को व्यक्त करता है।
अंबुबाची और रज पर्व की भाँति तल्लिन पंडुम भी इस सत्य को स्वीकार करता है कि धरती की उर्वरता जीवन की निरंतरता से अविभाज्य है। बीज बोना केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं माना जाता, बल्कि कृतज्ञता, विनम्रता और दैवीय आशीर्वाद की अपेक्षा रखने वाला एक पवित्र कर्म माना जाता है।
यद्यपि भौगोलिक स्थिति और सामाजिक वर्गीकरण के कारण इसे मुख्यधारा की हिंदू परंपराओं से अलग देखा जाता है, फिर भी तल्लिन पंडुम की दार्शनिक आधारभूमि अंबुबाची और रज पर्व में निहित विचारों से गहराई से मेल खाती है।
साझा सभ्यतागत आधार
ये तीनों उत्सव भिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से उत्पन्न हुए हैं। अंबुबाची शाक्त परंपराओं से जुड़ा हुआ है। रज पर्व ओड़िया सांस्कृतिक जीवन में गहराई से समाहित है। तल्लिन पंडुम माड़िया जनजाति की परंपराओं से संबंधित है। फिर भी ये तीनों अत्यंत समान विचारों का उत्सव मनाते हैं।
प्रथम, ये सृजन के स्रोत के रूप में स्त्री तत्व का सम्मान करते हैं। द्वितीय, ये उर्वरता को केवल जैविक प्रक्रिया न मानकर पवित्र मानते हैं। तृतीय, ये धरणीमाता को एक जीवंत सत्ता के रूप में देखते हैं, जो श्रद्धा और सम्मान की अधिकारी हैं। चतुर्थ, ये मानव गतिविधियों को ऋतुचक्र और पारिस्थितिक लयों के अनुरूप स्थापित करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये एक ऐसी सांस्कृतिक निरंतरता को प्रकट करते हैं जो "जनजातीय" और "गैर-जनजातीय" के आधुनिक विभाजन से परे जाती है।
जनजातीय और गैर-जनजातीय जैसी श्रेणियाँ प्रायः गहरे सभ्यतागत संबंधों को ओझल कर देती हैं। यद्यपि अनुष्ठान, मिथक और सामाजिक संरचनाएँ भिन्न हो सकती हैं, फिर भी भारत के अनेक समुदाय प्रकृति, उर्वरता, पूर्वजों, पवित्र भूगोल और जीवन की परस्पर संबद्धता के बारे में समान धारणाएँ साझा करते हैं।
अंबुबाची, रज पर्व और तल्लिन पंडुम के बीच की समानताएँ यह संकेत देती हैं कि ये परंपराएँ एक व्यापक स्वदेशी सांस्कृतिक आधारभूमि से विकसित हुई हैं, जिसका विकास भारतीय उपमहाद्वीप में सहस्राब्दियों के दौरान हुआ।
भारतीय सभ्यता के अनुभव में विविधता और एकता
भारतीय सभ्यता की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि उसने एकरूपता की अपेक्षा किए बिना विविधता को आत्मसात करने की क्षमता विकसित की। विभिन्न समुदायों ने अपने विशिष्ट अनुष्ठान, स्थानीय देवताओं और सांस्कृतिक परंपराओं का विकास किया, जबकि वे साथ ही व्यापक सभ्यतागत ढाँचों में भी सहभागी बने रहे।
विचार एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुँचे। समुदायों ने एक-दूसरे से ग्रहण किया। स्थानीय परंपराएँ क्षेत्रीय परंपराएँ बनीं और क्षेत्रीय परंपराओं ने व्यापक सभ्यतागत आख्यानों में योगदान दिया। यह प्रक्रिया एकरूपीकरण पर आधारित नहीं थी। बल्कि यह पारस्परिक स्वीकृति, अनुकूलन और सह-अस्तित्व पर आधारित थी।
एक जनजातीय समुदाय अपने पूर्वज देवताओं की पूजा कर सकता था और साथ ही पड़ोसी हिंदू समुदायों के साथ व्यापक सांस्कृतिक मूल्यों को भी साझा कर सकता था। कोई क्षेत्रीय देवी एक ओर स्थानीय संरक्षिका हो सकती थी और दूसरी ओर किसी व्यापक पवित्र सिद्धांत की अभिव्यक्ति भी। अनेक मार्ग एक साथ विद्यमान रह सकते थे, बिना किसी एकमात्र आधिकारिक सिद्धांत की आवश्यकता के।
'जितने दर्शन राहे उतनी चिंतन से चैतन्य भरा'।
विविधता में एकता का यह सिद्धांत भारतीय सभ्यतागत चिंतन में बार-बार रेखांकित किया गया है। अंबुबाची, रज पर्व और तल्लिन पांडुम जैसे उत्सव यह प्रदर्शित करते हैं कि अनुष्ठानों की विविधता के पीछे जीवन, प्रकृति, नारीत्व और सृष्टि की पवित्रता के प्रति एक साझा श्रद्धा विद्यमान है।
भारत की सांस्कृतिक बहुलता के समक्ष चुनौतियाँ
इन परंपराओं का सह-अस्तित्व भारतीय स्वदेशी आस्था प्रणालियों की एक मूलभूत विशेषता को भी उजागर करता है, वे सामान्यतः अनन्यतावादी (exclusive ) नहीं हैं। ऐतिहासिक रूप से, समुदायों ने पूजा और आध्यात्मिक साधना के अनेक रूपों की वैधता को स्वीकार किया। सांस्कृतिक आदान-प्रदान, अनुकूलन और पारस्परिक प्रभाव सामान्य बात थी। परंपराएँ कठोर एकरूपता के बजाय देने और ग्रहण करने की प्रक्रियाओं के माध्यम से विकसित हुईं।
यह बहुलतावादी दृष्टिकोण अनेक बार उन धार्मिक ढाँचों के साथ तनाव की स्थिति में आया है जो विशिष्ट सत्य-दावों (exclusive truth claims) और सार्वभौमिक अनुरूपता (universal conformity) पर बल देते हैं। जहाँ कहीं भी अनन्यतावादी विचारधाराएँ स्थानीय परंपराओं के साथ संवाद स्थापित करने के बजाय उनका स्थान लेने का प्रयास करती हैं, वहाँ स्वाभाविक रूप से तनाव उत्पन्न होता है।
अतः चुनौती केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत भी है। प्रश्न यह है कि क्या विविध परंपराएँ आगे भी सह-अस्तित्व में रहकर एक-दूसरे को समृद्ध करती रहेंगी, अथवा एकरूपीकरण के दबाव उन सांस्कृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को कमजोर कर देंगे जिन्होंने उन्हें अब तक जीवित रखा है।
इसलिए तल्लिन पंडुम जैसे स्वदेशी उत्सवों का संरक्षण, अंबुबाची और रज पर्व जैसी परंपराओं के साथ, केवल सांस्कृतिक विरासत की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भारत के बहुलतावादी सभ्यतागत चरित्र को बनाए रखने के लिए भी आवश्यक है।
निष्कर्ष
कामाख्या में देवी रजस्वला होती हैं। ओडिशा में मातृभूमि विश्राम करती है। माड़िया समुदाय वर्षा के आगमन से पूर्व अपने बीजों के लिए आशीर्वाद प्राप्त करता है।
यद्यपि ये उत्सव विभिन्न अनुष्ठानों और भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होते हैं, फिर भी वे एक ही शाश्वत सत्य का उत्सव मनाते हैं कि जीवन स्त्री की सृजनात्मक शक्ति से उत्पन्न होता है, धरती की उर्वरता से विकसित होता है और प्रकृति के साथ मानवता के सामंजस्यपूर्ण संबंधों में फलता-फूलता है।
अंबुबाची, रज पर्व और तल्लिन पंडुम यह उद्घाटित करते हैं कि भारत के आध्यात्मिक परिदृश्य की प्रत्यक्ष विविधता के नीचे एक गहरी सांस्कृतिक एकता विद्यमान है (beneath the apparent diversity of India's spiritual landscape lies a deep cultural unity)। वे हमें स्मरण कराते हैं कि जनजातीय और गैर-जनजातीय परंपराएँ लंबे समय से ऐसे साझा सभ्यतागत आधारों से जुड़ी रही हैं जो प्रकृति के प्रति श्रद्धा, नारीत्व के सम्मान और सृष्टि की पवित्र लयों की पहचान पर आधारित हैं।
जिस प्रकार मानसून प्रत्येक वर्ष धरती को पुनर्जीवित करता है, उसी प्रकार ये उत्सव भी एक प्राचीन ज्ञान को पुनर्जीवित करते हैं कि एकता के लिए समानता आवश्यक नहीं होती, और सबसे समृद्ध सभ्यताएँ वे होती हैं जो अनेक परंपराओं को फलने-फूलने का अवसर देती हैं, साथ ही उन गहरे सत्यों को भी पहचानती हैं जिन्हें वे साझा करती हैं।
Sunday, 21 June 2026
The Day Kaki Maa Became Mother and Kaku Became Father: A Story of Love, Community, and Our First Jamai Shashthi in Bengal
"Family is not always defined by blood. Sometimes, it is defined by those who choose to stand beside us when life leaves an empty chair at the table."

Thursday, 18 June 2026
युद्ध के बीच मानवता की एक अमर कहानी
कुछ कहानियाँ समय और स्थान की सीमाओं को लाँघ जाती हैं। वे किसी देश, भाषा या युग की नहीं रह जातीं, बल्कि पूरी मानवता की धरोहर बन जाती हैं। ऐसी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि मनुष्य के भीतर अभी भी करुणा जीवित है; कि युद्ध, हिंसा और स्वार्थ के बीच भी कहीं न कहीं प्रेम का एक दीपक जलता रहता है।
यह कहानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों की है।
सन् 1944 का जनवरी महीना। इटली का एंज़ियो (Anzio) क्षेत्र। चारों ओर युद्ध की विभीषिका फैली हुई थी। धरती बारूद की गंध से भरी थी। आसमान में उड़ते विमानों की गर्जना और तोपों की गूँज लगातार सुनाई देती थी। घर खंडहर बन चुके थे, खेत उजड़ चुके थे और इंसान अपनी जान बचाने के लिए दर-दर भटक रहे थे।
अमेरिकी सेना का एक युवा सैनिक, कॉर्पोरल जेम्स व्हिटेकर, अपने कुछ साथियों के साथ गश्त पर निकला था। उसकी उम्र मात्र चौबीस वर्ष थी। वह जॉर्जिया के एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। युद्ध उसके लिए केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; वह हर दिन मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखता था।
उस दिन भी वह एक बमबारी से तबाह हुए पुराने फार्महाउस की तलाशी ले रहा था। अचानक उसे एक अजीब-सी आवाज़ सुनाई दी।
वह रोने की आवाज़ नहीं थी।
शायद रोते-रोते थक जाने के बाद निकलने वाली वह करुण ध्वनि थी, जिसमें दर्द था, भूख थी और जीवन से चिपके रहने की आख़िरी कोशिश थी।
जेम्स उस आवाज़ का पीछा करते हुए तहखाने तक पहुँचा।
वहाँ जो उसने देखा, उसे वह जीवनभर नहीं भूल पाया।
एक लकड़ी के बक्से में, ऊनी कोट के ऊपर, एक नन्ही बच्ची लेटी हुई थी। उसकी उम्र आठ-नौ महीने से अधिक नहीं रही होगी। चेहरा पीला पड़ चुका था। होंठ सूख चुके थे। शरीर ठंड से काँप रहा था।
आसपास कोई नहीं था।
न माँ, न पिता, न कोई पड़ोसी।
सिर्फ़ वह बच्ची और चारों ओर पसरा हुआ सन्नाटा।
जेम्स कुछ क्षणों तक उसे देखता रहा। शायद उसके माता-पिता बमबारी में मारे जा चुके थे। शायद वे उसे बचाने के लिए वहाँ छोड़ गए थे। शायद वे लौटना चाहते थे, लेकिन लौट नहीं पाए।
इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं था।
उसके सामने केवल एक सच था और वह था यदि अभी कुछ नहीं किया गया, तो यह बच्ची जीवित नहीं बचेगी।
जेम्स ने उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई।
वह एक युद्धरत सैनिक था। उसके पास न दूध था, न कोई दवा, न बच्चों की देखभाल का कोई साधन। निकटतम फील्ड अस्पताल लगभग चालीस मील दूर था। रास्ते में दुश्मन की गोलियाँ थीं, बर्फीली हवाएँ थीं और मृत्यु हर मोड़ पर घात लगाए बैठी थी।
फिर भी उसने निर्णय ले लिया।
वह बच्ची को लेकर चलेगा।
चाहे कुछ भी हो जाए।
उसने बच्ची को अपनी सैन्य जैकेट के भीतर, सीने से लगाकर रखा ताकि उसके शरीर की गर्मी उसे ठंड से बचा सके।
यात्रा शुरू हुई।
रास्ते भर जेम्स उसे पानी की छोटी-छोटी बूंदें अपनी उँगली से पिलाता रहा। उसे अचानक अपनी माँ की याद आई, जो खेतों में जन्मे छोटे जानवरों को इसी तरह पानी पिलाया करती थीं।
उसके पास एक चॉकलेट बार थी।
वह उसके छोटे-छोटे टुकड़े करता और अपनी उँगली पर लगाकर बच्ची को चटाता, ताकि उसके शरीर को थोड़ी ऊर्जा मिल सके।
दिन-रात का भेद मिट गया।
जेम्स चलता रहा।
गोलियों की आवाज़ों के बीच।
बारूद के धुएँ के बीच।
ठंडी हवाओं के बीच।
और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि वह उस बच्ची से लगातार बातें करता रहता।
उसे पता था कि बच्ची उसकी भाषा नहीं समझती।
लेकिन शायद प्रेम की भाषा समझती थी।
वह उसे अपने गाँव के बारे में बताता।
जॉर्जिया के हरे-भरे खेतों के बारे में।
अपनी माँ के हाथों के बने भोजन के बारे में।
अपने बचपन की शरारतों के बारे में।
और हर थोड़ी देर में कहता,
"सब ठीक हो जाएगा।"
हालाँकि उसे स्वयं भी नहीं पता था कि सब सचमुच ठीक होगा या नहीं।
लगभग दो दिनों की कठिन यात्रा के बाद, भोर के समय वह फील्ड अस्पताल पहुँचा।
बच्ची अभी भी जीवित थी।
नर्सों ने तुरंत उसे अपने संरक्षण में ले लिया।
जेम्स ने उसे अंतिम बार देखा।
फिर वह अस्पताल के बाहर जमीन पर बैठ गया।
शायद थकान से।
शायद राहत से।
शायद उस भावनात्मक बोझ से, जिसे वह दो दिनों से ढो रहा था।
कुछ देर बाद उसे बताया गया कि बच्ची अब सुरक्षित है और उसे रेड क्रॉस के हवाले कर दिया जाएगा।
बस इतना ही।
युद्ध ने उसे आगे बढ़ने का आदेश दिया और वह वापस अपनी यूनिट में लौट गया।
युद्ध समाप्त हुआ।
जेम्स घर लौट आया।
उसने विवाह किया।
बच्चे हुए।
फिर पोते-पोतियाँ।
जीवन अपनी सामान्य गति से चलता रहा।
लेकिन उस बच्ची की स्मृति उसके मन से कभी नहीं गई।
कभी सुबह चाय पीते समय।
कभी रात को सोने से पहले।
कभी अपने बच्चों को खेलते हुए देखकर।
वह सोचता-
"क्या वह जीवित होगी?"
"क्या उसे कोई परिवार मिला होगा?"
"क्या वह खुश होगी?"
इन प्रश्नों का उत्तर उसके पास नहीं था।
और शायद यही अधूरापन उसके जीवन का हिस्सा बन गया।
साठ वर्ष बीत गए।
सन् 2004 में उसकी पोती सारा स्कूल प्रोजेक्ट के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध पर काम कर रही थी।
उसने अपने दादा से पूछा,
"क्या आपके पास युद्ध की कोई कहानी है?"
जेम्स ने पहली बार विस्तार से उस बच्ची की कहानी सुनाई।
सारा ने वह कहानी इंटरनेट पर डाल दी।
और फिर एक चमत्कार हुआ।
तीन महीने बाद इटली के बोलोन्या शहर से एक ईमेल आया।
उस महिला का नाम मारिया कॉन्टी था।
उसकी उम्र साठ वर्ष थी।
उसने लिखा था कि उसे उसके दत्तक माता-पिता ने बताया था कि वह युद्ध के दौरान एक अमेरिकी सैनिक द्वारा बचाई गई थी, जिसने उसे एंज़ियो से उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया था।
वह पिछले चालीस वर्षों से उस सैनिक को खोज रही थी।
जब सारा ने यह ईमेल अपने दादा को दिखाया, तो जेम्स की आँखें भर आईं।
उन्होंने पत्र दो बार पढ़ा।
फिर धीरे से कहा,
"वह जीवित है..."
साठ वर्षों का बोझ जैसे एक क्षण में हल्का हो गया।
अगले कुछ महीनों में दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान हुआ।
फोन पर बातचीत हुई।
और फिर 2005 में मारिया इटली से अमेरिका आई।
वह इकसठ वर्ष की थी।
एक स्कूल शिक्षिका।
तीन बच्चों और पाँच नाती-पोतों की माँ।
जब वह जेम्स के घर पहुँची, तब जेम्स पचासी वर्ष के हो चुके थे।
दरवाज़ा खुला।
दोनों आमने-सामने खड़े थे।
एक वह सैनिक जिसने उसे मौत के मुँह से निकाला था।
दूसरी वह बच्ची, जो अब एक पूर्ण जीवन जी चुकी महिला थी।
मारिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसने जेम्स के दोनों हाथ पकड़ लिए।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसने इतालवी भाषा में कुछ कहा।
सारा ने अनुवाद किया-
"वह कहती हैं कि वह जीवनभर आपको धन्यवाद कहना चाहती थीं। उन्हें खेद है कि इसमें साठ वर्ष लग गए।"
जेम्स मुस्कुराए।
उन्होंने उसके हाथों को कसकर थामा।
और बोले-
"उसे बताओ कि साठ साल कोई मायने नहीं रखते।"
कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा-
"मुझे बस इतना जानना था कि वह बच गई।"
उस क्षण वहाँ कोई सैनिक नहीं था, कोई युद्ध नहीं था, कोई राष्ट्र नहीं था।
वहाँ केवल दो मनुष्य थे।
एक जिसने बिना किसी स्वार्थ के जीवन बचाया था।
और दूसरी, जिसका पूरा जीवन उस करुणा का जीवित प्रमाण था।
शायद यही मानवता है।
युद्धों से बड़ी।
विचारधाराओं के दम्भ से बड़ी।
सीमाओं से बड़ी।
समय से भी बड़ी।
और यही कारण है कि ऐसी कहानियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं। वे हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि दुनिया चाहे कितनी भी कठोर क्यों न हो जाए, एक दयालु हृदय अभी भी हमें मानवता और उसमे निहित करुणा का पाठ पढ़ाता रहेगा। मानवता और करुणा के आगे सारी चीजें कितनी छोटी लगने लगती हैं।
किसी कविता में कहा है ना.....
रात का नाम अँधेरा है, ये जितना सच है,
सच ये उतना ही है कि कुछ जलते सितारें होंगे।
Saturday, 13 June 2026
Educating the Educators: Reflections on the Disturbing Incident at Satyawati College (Morning)
The recent news report regarding a professor named Md. Irfan Alam of Satyawati College (Morning), University of Delhi, allegedly clicking photographs of a female student wearing a backless dress in an examination hall is deeply disturbing. The matter is currently under investigation, and the facts will ultimately be established by the competent authorities. Nevertheless, the incident raises important questions about professional ethics, teachers' conduct, and the larger responsibilities associated with the teaching profession. As a teacher myself, the news compelled me to reflect not only on the conduct of an individual but also on the broader culture of higher education and the role we play in shaping the lives of young people.
Sunday, 7 June 2026
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देबश्मिता पाल की हत्या: कुछ असहज प्रश्न
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देबश्मिता पाल की हत्या ने विश्वविद्यालय परिवार के शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को भीतर तक झकझोर दिया है। देबश्मिता की मृत्यु के साथ केवल एक व्यक्ति का जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि समाज द्वारा निर्मित एक ऐसी शिक्षिका का भी अंत हो गया, जो आने वाले वर्षों में असंख्य विद्यार्थियों, सहकर्मियों और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती थीं।
स्वयं एक ऐड-हॉक शिक्षक होने के नाते मैं उनके संघर्ष को कुछ हद तक समझ सकता हूँ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वे वर्ष 2023 में स्थायी प्रोफेसर बनी थीं। लंबे संघर्षों के बाद जीवन की एक स्थिर और आश्वस्त अवस्था उनके सामने खुल रही थी। अब उन्हें एक उत्कृष्ट शिक्षिका के रूप में, समाज की नैतिक चेतना के संवाहक के रूप में और अनेक अन्य भूमिकाओं में योगदान देना था। किंतु उनकी असामयिक और क्रूर हत्या ने अनेक ऐसे प्रश्न हमारे सामने खड़े कर दिए हैं, जिन पर एक शिक्षक, एक विद्यार्थी और एक समाज के रूप में हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।
मीडिया और पुलिस सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उनकी हत्या कोलकाता स्थित उनकी पैतृक संपत्ति को लेकर हुई। बताया जा रहा है कि उनके मकान में किराये पर रहने वाले एक दंपति ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया, क्योंकि वे उस संपत्ति को खरीदना चाहते थे और देबश्मिता उसे बेचना नहीं चाहती थीं। संपत्ति के मोह ने उन्हें इतना अंधा कर दिया कि उन्होंने एक निर्दोष जीवन को समाप्त कर दिया।
मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है—किसी व्यक्ति को यह विश्वास कैसे हो जाता है कि वह इतना बड़ा अपराध करके भी बच निकलेगा? क्या उसे कानून, न्याय और समाज की सामूहिक चेतना पर भरोसा नहीं रहता, या फिर उसे यह लगता है कि धन और प्रभाव हर अपराध को ढक सकते हैं? यह प्रश्न केवल इस घटना तक सीमित नहीं है; यह हमारे समय और समाज के चरित्र से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
एक शिक्षक होने के साथ-साथ सामाजिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के रूप में मुझे विविध प्रकार के लोगों से मिलने का अवसर मिला है। दिल्ली विश्वविद्यालय में आने से पहले मैंने संसद में कांग्रेस, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के सांसदों के संसदीय निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया है। जीवन के 43 वर्षों में मुझे ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने निस्वार्थ भाव से मेरा मार्गदर्शन किया, मेरे जीवन को संवारने के अवसर दिए और कठिन समय में संबल बनकर खड़े रहे। वे मेरे लिए देवदूतों से कम नहीं है।
परंतु इसके साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया है कि समाज में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपने स्वार्थ, महत्वाकांक्षाओं और व्यक्तिगत लाभ को ही जीवन का केंद्र बना लेते हैं। यह कोई नई बात नहीं है, परंतु चिंताजनक तब हो जाती है जब समाज की व्यवस्थाएँ भी, अनजाने में अथवा सत्ता में बने रहने के लिए जानबूझकर, ऐसे ही प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने लगती हैं।
हम व्यक्ति निर्माण, मूल्य शिक्षा और चरित्र निर्माण की बातें बड़े उत्साह से करते हैं। अनेक प्रशिक्षण शिविरों, व्याख्यानों और संगोष्ठियों में इन विषयों पर गंभीर चर्चा होती है। किंतु व्यवहारिक जीवन में अक्सर वही लोग निर्णयकारी स्थानों पर पहुँचते दिखाई देते हैं जो सफलता की दौड़ में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार होते हैं। संवेदनशील, ईमानदार और मूल्यनिष्ठ लोगों को प्रायः अव्यावहारिक मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप समाज के भीतर यह धारणा बनती जाती है कि सफलता का मार्ग केवल धन, प्रभाव और चतुराई से होकर गुजरता है।
यदि समाज के बड़े हिस्से में यह विश्वास स्थापित हो जाए कि मूल्य और नैतिकता केवल पुस्तकों के विषय हैं, जीवन के नहीं, तो फिर संपत्ति, शक्ति या लाभ के लिए अपराधों का बढ़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह जाती।
राजनीति इसका एक उदाहरण है। हमारे समाचार चैनल दिन-रात चुनावी समीकरणों, जीत-हार और सत्ता की रणनीतियों पर चर्चा करते हैं। राजनीति घर-घर में चर्चा का विषय बन चुकी है। परंतु आम जनमानस के मन में धीरे-धीरे यह भावना भी घर कर रही है कि राजनीति में वही आगे बढ़ता है जिसके पास धन, संसाधन और प्रभाव है। मेरे कई व्यक्तिगत अनुभव ऐसे है कि यह धारणा सत्य के नीव पर आधारित लगती है। यदि समाज के अन्य लोग भी सदैव ऐसा ही अनुभव करने लगें तो यह गहरी चिंता का विषय अवश्य है।
यह बात केवल राजनीतिक दलों पर लागू नहीं होती। अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संगठन भी समय-समय पर इसी प्रकार के आत्ममंथन की आवश्यकता महसूस करते हैं। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में अच्छे लोगों को आगे बढ़ाने का साहस रखते हैं, या केवल उनकी प्रशंसा करके संतुष्ट हो जाते हैं? कभी कभी तो हम केवल उनका उपयोग कर लेते है।
हम अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, भारतीय ज्ञान परंपरा और विश्वगुरु बनने की आकांक्षा पर गर्व करते हैं। यह गर्व स्वाभाविक भी है। किंतु साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि समाज के भीतर कौन-सी प्रवृत्तियाँ हमारी जड़ों को कमजोर कर रही हैं। यह किसी राजनीतिक दल या संगठन को दोष देने का विषय नहीं है; यह सामूहिक आत्मचिंतन का विषय है। साथ ही में हमारे राजनितिक दल और सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को भी इस बात पर आत्मचिंतन और आत्ममंथन करना ही होगा। सत्ता सदैव नहीं रहती।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।” समाज के रूप में हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम सद्कर्म करने वालों को पर्याप्त सम्मान और संरक्षण दे पा रहे हैं? क्या हम दुष्कर्मों के प्रति उतने ही स्पष्ट और कठोर हैं जितने होने चाहिए?
कब तक हम केवल अपने गौरवशाली अतीत का गुणगान करते रहेंगे और वर्तमान की चुनौतियों से आँख चुराते रहेंगे? कब तक मूल्य और आदर्श हमारे भाषणों तक सीमित रहेंगे? कुछ लोगों को तो बोलना ही होगा, कुछ लोगों को जोखिम उठाना ही होगा। लाभ-हानि के गणित से ऊपर उठकर समाज के सामने नवसृजन के स्वप्न रखने होंगे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—“जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चलो रे।
इस पूरी घटना का एक दूसरा पक्ष भी है, जो हमारे परिवार और सामाजिक संबंधों से जुड़ा हुआ है। आज परिवार भी समाज में बढ़ती स्वार्थपरायणता और व्यक्तिकेंद्रित जीवनशैली के प्रभाव से अछूते नहीं रहे हैं। अकेलापन बढ़ रहा है। संबंधों में स्थायित्व और प्रतिबद्धता का संकट दिखाई देता है। कई बार प्रेम भी आवश्यकता के साथ शुरू होता है और आवश्यकता समाप्त होने पर समाप्त हो जाता है।
ऐसे समय में देबश्मिता की बड़ी बहन का स्नेह और सतर्कता उल्लेखनीय है। यदि वह नियमित रूप से उनसे संपर्क न करतीं, यदि उनके फोन का उत्तर न मिलने पर चिंता न करतीं, तो संभव है कि इस दुखद घटना का पता और देर से चलता। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि जीवन में रिश्तों की ऊष्मा कितनी महत्वपूर्ण है।
शायद आज आवश्यकता इस बात की भी है कि परिवारों में, विद्यालयों में और विश्वविद्यालयों के कक्षाओं में हम संबंधों, संवेदनाओं, जिम्मेदारियों और मानवीय मूल्यों पर पुनः चर्चा करें। परिवार प्रबोधन, सामाजिक शुचिता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व जैसे विषय केवल कार्यक्रमों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बनें।
इस लेख के माध्यम से मैं कोई नया विचार प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ। मुझसे पहले भी करोड़ों लोगों ने इन विषयों पर लिखा है, आज भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे। किंतु कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिन्हें बार-बार पूछना पड़ता है। कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन पर उंगली रखनी ही पड़ती है, क्योंकि वहीं से उपचार की शुरुआत होती है।
केवल मधुर और सुविधाजनक बातें हमारे व्यक्तिगत हितों को तो साध सकती हैं, परंतु वे उस गहरे और स्थायी परिवर्तन को जन्म नहीं देतीं जिसकी मानव समाज को आवश्यकता है। देबश्मिता पाल की दुखद मृत्यु हमें एक बार फिर यही स्मरण कराती है कि समाज का निर्माण केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि मूल्यों, संबंधों, संवेदनाओं और नैतिक साहस से होता है। और इन्हीं की रक्षा करना हमारे समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।









