भाग–3 : पोलवा, हार्रो, आरु और सामुदायिक जीवन की आत्मा
Reflections (Vivekanand Nartam)
Sunday, 31 May 2026
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे
भाग–2 : आम्सताम, मक्का जात्रा, कुल देवता और गोटूल की स्मृतियाँ
पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद भी हमारे कृषि जीवन का उत्सवी क्रम समाप्त नहीं होता था। वास्तव में खेती का प्रत्येक चरण प्रकृति, देवताओं और समुदाय के साथ हमारे संबंधों को पुनर्स्थापित करने का अवसर बन जाता था। खेत में बीज बोने से लेकर फसल के घर पहुँचने तक, हर महत्वपूर्ण पड़ाव का अपना एक उत्सव और अपना एक सांस्कृतिक अर्थ था।
धान की फसल पक जाने और उसकी कटाई पूरी होने के बाद एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया आरम्भ होती थी। धान को खेतों से घर लाया जाता था, लेकिन उसके उपयोग से पहले धान की बालियों से भूसा और अन्य अवशेषों को अलग करने का कार्य किया जाता था। हमारी स्थानीय भाषा में इस प्रक्रिया को “चूरना” कहा जाता था।
किन्तु चूरने का कार्य भी सीधे आरम्भ नहीं किया जाता था। उससे पहले एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामुदायिक अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता था, जिसे “आम्सताम” कहा जाता था।
आम्सताम : फसल, पशुधन और ग्राम-सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना
आम्सताम हमारे गाँव के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन था। इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष हमारे गाँव के समीप बहने वाली पामूल गौतम नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी का वह शांत किनारा उस दिन श्रद्धा, उत्साह और सामुदायिक भावना का केंद्र बन जाता था।
वहाँ ग्राम-देवताओं और गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती थी। बकरे और सूअर की बलि अर्पित की जाती थी और सामूहिक रूप से यह प्रार्थना की जाती थी कि खेतों में बोई गई फसल सुरक्षित रहे, उसे कोई रोग या कीट न लगे, और वर्ष भर गाँव समृद्ध बना रहे।
हमारे समाज में यह विश्वास था कि खेती केवल मनुष्य के श्रम से नहीं चलती; उसमें प्रकृति, ऋतुओं, जल, वन और अदृश्य दैवी शक्तियों का भी योगदान होता है। इसलिए उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक था।
विशेष रूप से गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली देवी को, जिन्हें हमारे क्षेत्र में माराई अथवा कुछ स्थानों पर मरी आई कहा जाता है, विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता था। उनसे प्रार्थना की जाती थी कि वे खेतों, पशुओं और पूरे गाँव को संकटों से सुरक्षित रखें।
मेरे बचपन में इन अनुष्ठानों का अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं आता था, किंतु आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि इनके माध्यम से हमारे पूर्वज प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते थे। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि जीवन के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति भी था।
मक्का जात्रा : आम के प्रथम स्वाद का उत्सव
इसी प्रकार हमारे समाज में मक्का जात्रा का भी विशेष महत्व था।
माड़िया भाषा में मक्का का अर्थ आम होता है। जिस प्रकार नई फसल को ग्रहण करने से पहले नवा पंडूम मनाया जाता था, उसी प्रकार आम के मौसम में पहली बार आम खाने से पहले मक्का जात्रा आयोजित की जाती थी।
आज के समय में यह बात साधारण लग सकती है, किंतु हमारे लिए यह प्रकृति के प्रति सम्मान का विषय था। कोई भी नई उपज सीधे उपभोग की वस्तु नहीं मानी जाती थी। पहले उसका स्वागत किया जाता था, उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती थी और फिर उसे ग्रहण किया जाता था।
इन परंपराओं ने हमें सिखाया कि प्रकृति केवल संसाधनों का भंडार नहीं है; वह जीवनदायिनी शक्ति है, जिसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता आवश्यक है।
हमारे कुल देवता और गोटूल की परंपरा
हमारे गाँव के कुल देवता भी अत्यंत विशिष्ट थे। वे किसी भव्य मंदिर या मूर्तियों में स्थापित नहीं थे। उनके प्रतीक साधारण पत्थर थे, किंतु हमारे लिए वे अत्यंत पूजनीय थे।
प्रत्येक पाँच वर्ष में एक बार इन कुल देवताओं का पुनः आरोपण किया जाता था। यह अनुष्ठान गाँव के गोटूल में सम्पन्न होता था।
गोटूल हमारे समाज का केवल एक भवन नहीं था। वह हमारे सामुदायिक जीवन का केंद्र था। वहीं बैठकों का आयोजन होता था, वहीं महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, वहीं उत्सवों की योजनाएँ बनती थीं और वहीं हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती थीं।
कुल देवताओं की पुनः प्रतिष्ठा का यह अनुष्ठान रात्रि के समय सम्पन्न किया जाता था। इसकी एक विशेष बात यह थी कि उस समय गाँव की महिलाएँ और बच्चे गाँव के बाहर नदी किनारे चले जाते थे। केवल पुरुषों को ही इस अनुष्ठान में भाग लेने की अनुमति होती थी।
पूरी पुरुष मंडली गोटूल में एकत्रित होकर रात भर चलने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती थी। उस समय वातावरण अत्यंत गंभीर और रहस्यमय हो जाता था। जंगलों की निस्तब्धता, दूर बहती नदी की ध्वनि और गोटूल के भीतर चल रहे अनुष्ठानों की कल्पना मेरे बालमन को हमेशा रोमांचित करती थी।
माँ की गोद, नदी का किनारा और बचपन की स्मृतियाँ
इन अवसरों पर मैं भी अन्य बच्चों के साथ अपनी माँ के साथ नदी किनारे जाता था। रात धीरे-धीरे गहराती जाती थी। आकाश असंख्य तारों से भर जाता था और जंगल की शांति पूरे वातावरण को किसी लोककथा जैसा बना देती थी।
हम बच्चे खेलते-खेलते थक जाते और अंततः अपनी माताओं की गोद में ही सो जाते थे। मुझे आज भी याद है कि कई बार आधी नींद में दूर से आती आवाज़ें सुनाई देती थीं, लेकिन उनका अर्थ समझ में नहीं आता था।
जब गोटूल में पूजा सम्पन्न हो जाती थी, तब गाँव के पुरुष ऊँचे स्वर में सामूहिक उद्घोष करते थे। उनकी आवाज़ें रात के सन्नाटे को चीरती हुई नदी तक पहुँचती थीं। वह संकेत होता था कि अनुष्ठान समाप्त हो चुका है और अब महिलाएँ तथा बच्चे गाँव में लौट सकते हैं।
मेरी स्मृतियों में वह दृश्य आज भी उतना ही जीवंत है—रात का अंधकार, नदी का किनारा, माँ की गोद, और दूर से आती पुरुषों की सामूहिक आवाज़ें। बचपन में इन सबका अर्थ समझना संभव नहीं था, किंतु आज लगता है कि वे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे; वे हमारी सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक थे।
परंपराओं के भीतर छिपा जीवन-दर्शन
आज जब मैं इन परंपराओं को स्मरण करता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि उनमें केवल आस्था नहीं थी, बल्कि सामुदायिक अनुशासन, सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान भी निहित था।
गोटूल केवल एक भवन नहीं था; वह हमारे सामूहिक जीवन की आत्मा था।
वहीं हमारी परंपराएँ जीवित थीं।
वहीं हमारी स्मृतियाँ आकार लेती थीं।
वहीं हमारी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती थी।
और वहीं से हमें यह सीख मिलती थी कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने समुदाय, अपनी प्रकृति और अपनी परंपराओं के साथ मिलकर जीवन जीता है।
समय बदल गया है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन पामूल गौतम नदी के किनारे बिताई गई वे रातें, गोटूल की वह दुनिया और कुल देवताओं के प्रति लोगों की वह अटूट श्रद्धा आज भी मेरी स्मृतियों में उसी प्रकार सुरक्षित है, जैसे कल की ही बात हो।
(क्रमशः)
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे-स्मृतियों, परंपराओं और सामुदायिक जीवन का एक आत्मीय संस्मरण
भाग-१
जब भी मैं कुक्कमेटा के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे भीतर स्मृतियों का एक पूरा संसार जाग उठता है। भामरागढ़ के सुदूर वनों के बीच बसा यह छोटा-सा गाँव, जिसमें आज भी लगभग साठ घर हैं, केवल मेरा जन्मस्थान भर नहीं है; यह मेरे व्यक्तित्व, मेरी सांस्कृतिक चेतना और मेरे जीवन-दर्शन की आधारभूमि है। वर्षों बीत गए, जीवन मुझे गाँव से दूर ले गया, किंतु कुक्कमेटा आज भी मेरे भीतर उसी तरह जीवित है जैसे बचपन के दिनों में था।
कुक्कमेटा का नाम आते ही मेरे सामने मिट्टी की सोंधी गंध, जंगलों की हरियाली, पामूल गौतम नदी का कलकल प्रवाह, गोटूल के सामने का खुला मैदान, और उन लोगों के चेहरे उभर आते हैं जिनके साथ मेरा बचपन बीता। मेरे गाँव में जनजातीय और गैर-जनजातीय, दोनों समुदायों के लोग निवास करते थे। यद्यपि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमियाँ अलग थीं, फिर भी उनके बीच जो आत्मीयता, सहयोग और पारिवारिक संबंधों की भावना थी, वह आज भी मेरे लिए आश्चर्य और प्रेरणा का विषय है।
गाँव का जीवन केवल परिवारों तक सीमित नहीं था। पूरा गाँव ही एक विस्तृत परिवार की तरह था। सुख-दुःख, उत्सव और संकट—सब कुछ साझा था। शायद यही कारण था कि संसाधनों की कमी के बावजूद जीवन में संतोष और आत्मीयता की प्रचुरता थी।
तल्लिन पंडूम : धरती माता के प्रति कृतज्ञता का उत्सव
बरसात के मौसम के आगमन से पूर्व मनाया जाने वाला तल्लिन पंडूम मेरे बचपन की सबसे सशक्त स्मृतियों में से एक है। हमारी स्थानीय माड़िया भाषा में तल्लिन का अर्थ ‘माता’ और पंडूम का अर्थ ‘उत्सव’ होता है। इस प्रकार तल्लिन पंडूम धरती माता को समर्पित कृतज्ञता का पर्व है।
आज जब मैं इस उत्सव के बारे में सोचता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंधों की अभिव्यक्ति था। धरती को केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता मानने की जो दृष्टि हमारे समाज में थी, उसका सबसे सुंदर रूप तल्लिन पंडूम में दिखाई देता था।
इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष गाँव से दूर जंगल में नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी के तट पर अस्थायी चूल्हे बनाए जाते थे और सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया जाता था। उत्सव के लिए बकरे और सूअर की व्यवस्था पूरे गाँव की ओर से की जाती थी। इसके लिए आवश्यक धनराशि गाँव के सामूहिक कोष से आती थी, जिसमें नियमों का उल्लंघन करने वालों से प्राप्त दंड की राशि भी सम्मिलित होती थी। यदि वह पर्याप्त न होती, तो प्रत्येक परिवार अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था।
तल्लिन पंडूम के आयोजन में पेरमा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती थी। लगभग सात-आठ गाँवों के समूह का एक पेरमा होता था, जिसे मुख्य पुजारी माना जाता था। पेरमा सदैव जनजातीय समुदाय से ही होता था। उत्सव की तिथि भी उसकी उपलब्धता को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती थी। निश्चित तिथि पर गाँव के लोग स्वयं जाकर उसे आदरपूर्वक अपने साथ लेकर आते थे।
पूजा के दौरान पेरमा के साथ गाँव का भूमिया भी उपस्थित रहता था। भूमिया वह व्यक्ति होता था जिसे गाँव की भूमि तथा उससे जुड़े पारंपरिक अधिकारों का संरक्षक माना जाता था। पेरमा, भूमिया और समस्त ग्रामीण मिलकर धरती माता और ग्राम देवताओं की पूजा करते थे।
अनुष्ठान सम्पन्न होने के बाद सभी लोग सामूहिक रूप से मंगलकामनाएँ व्यक्त करते थे। उनके स्वर में गाँव की समृद्धि, भरपूर वर्षा, अच्छी फसल और पूरे समुदाय के कल्याण की कामना समाहित होती थी। आज भी उन सामूहिक प्रार्थनाओं की गूँज मेरी स्मृतियों में सुनाई देती है।
इसके बाद सामूहिक भोजन का आयोजन होता था। यद्यपि सभी लोग एक ही स्थान पर उपस्थित रहते थे, फिर भी प्रत्येक परिवार का अपना अलग चूल्हा होता था। परिवार का पुरुष सदस्य अपने परिवार के लिए भोजन स्वयं तैयार करता था। इस व्यवस्था में सामूहिकता और पारिवारिक स्वायत्तता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।
इस अवसर पर महुआ से निर्मित पारंपरिक मदिरा का सेवन भी किया जाता था। कभी-कभी कुछ लोग नशे के प्रभाव में आपस में विवाद कर बैठते थे, किंतु उन झगड़ों का प्रभाव केवल उसी दिन तक सीमित रहता था। अगले दिन सब कुछ सामान्य हो जाता था। किसी के मन में स्थायी वैर या कटुता नहीं रहती थी। आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि शायद संबंधों की गहराई ही ऐसी थी कि छोटी-छोटी कटुताएँ उसमें स्वतः विलीन हो जाती थीं।
महिलाओं का उत्सव और रेला नृत्य
तल्लिन पंडूम का एक रोचक पक्ष यह था कि जंगल में होने वाले मुख्य अनुष्ठान में केवल पुरुष भाग लेते थे। महिलाएँ गाँव में रहकर अपने ढंग से उत्सव मनाती थीं। उनके लिए भी गाँव की ओर से बकरे की व्यवस्था की जाती थी। वे अपने घरों में भोजन बनाती थीं और भोजन के उपरांत रेला नृत्य प्रस्तुत करती थीं।
रेला माड़िया समाज का अत्यंत लोकप्रिय लोकनृत्य है। इसकी लय, सामूहिकता और सहजता पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती थी। मेरे बचपन की स्मृतियों में रेला के गीतों और नृत्य की छवियाँ आज भी जीवित हैं।
जब पुरुषों की टोली जंगल से लौटती थी, तब गाँव की महिलाएँ एक लंबी और मजबूत रस्सी बाँधकर उनका मार्ग रोक लेती थीं। पुरुषों को गाँव में प्रवेश तभी मिलता था, जब वे महिलाओं को कुछ उपहार या बख्शीश देते थे। यह परंपरा हँसी-मज़ाक, आत्मीयता और सामुदायिक सौहार्द से भरपूर होती थी। पूरे गाँव में उत्सव का वातावरण छा जाता था।
नवा पंडूम : नई उपज के स्वागत का पर्व
तल्लिन पंडूम के सम्पन्न होते ही हमारे गाँवों में उत्सवों का एक नया क्रम आरंभ हो जाता था। इन्हीं उत्सवों में सबसे पहले आता था नवा पंडूम।
हमारे घरों के आसपास थोड़ी-सी भूमि होती थी, जिसमें परिवार की आवश्यकता के लिए विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाई जाती थीं। अम्बाड़ी, लोबिया, सेम, ककड़ी, दूधी और अनेक अन्य मौसमी सब्जियाँ हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं।
जब ये फसलें तैयार हो जाती थीं, तब भी उनका सेवन तुरंत नहीं किया जाता था। पहले नवा पंडूम का आयोजन होता था। इस उत्सव के पश्चात ही नई उपज को खाने की अनुमति होती थी। यदि कोई व्यक्ति उससे पहले नई उपज का सेवन करता, तो उस पर गाँव की ओर से दंड लगाया जाता था।
इस परंपरा के पीछे केवल सामाजिक अनुशासन नहीं था, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा भी थी। नई उपज को धरती माता का आशीर्वाद माना जाता था और उसे ग्रहण करने से पहले कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक समझा जाता था।
पिंडी पंडूम : धान और जीवन का उत्सव
नवा पंडूम के बाद आता था पिंडी पंडूम, जो हमारे कृषि जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
हमारे गाँवों में मुख्यतः धान की खेती होती थी और वह भी केवल जीवन-निर्वाह के लिए। उस समय गाँवों में कृषि को व्यवसाय के रूप में नहीं देखा जाता था। हमारे क्षेत्र के गाँव इतने दूरस्थ और भौगोलिक रूप से पृथक थे कि व्यापार और बाजार की अवधारणाएँ वहाँ तक पहुँची ही नहीं थीं।
मेरे बचपन के दिनों में सरकारी व्यवस्था भी लगभग अनुपस्थित थी। गाँव में केवल तीसरी कक्षा तक का एक छोटा-सा विद्यालय था, जिसमें एक ही शिक्षक सभी कक्षाओं को पढ़ाते थे। संसाधन सीमित थे, लेकिन जीवन अपनी स्वाभाविक लय में चलता था।
जब धान पककर भोजन के योग्य हो जाता था, तब पिंडी पंडूम का आयोजन किया जाता था। प्रत्येक परिवार का अपना पारंपरिक पुजारी होता था और उसका माड़िया समुदाय से होना आवश्यक माना जाता था।
हमारे परिवार के पुजारी थे चैतु विडपी। वे हमारे परिवार के लिए केवल पुजारी नहीं थे, बल्कि एक सम्मानित बुज़ुर्ग भी थे। उनकी अगुवाई में पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद ही धान की कटाई आरंभ होती थी।
बचपन में मैं अनेक बार उनकी पूजा में उपस्थित रहा, किंतु आज भी मुझे यह ज्ञात नहीं कि वे कौन-से मंत्रों का उच्चारण करते थे। संभवतः वे प्रकृति, धरती और ग्राम देवताओं का स्मरण करते होंगे। लेकिन इतना निश्चित है कि उनकी प्रार्थनाओं में अच्छी फसल, समृद्धि और पूरे गाँव के कल्याण की कामना अवश्य होती थी।
नवा पंडूम और पिंडी पंडूम दोनों ही नई उपज के स्वागत के उत्सव थे। इनके माध्यम से हम प्रकृति, धरती माता और अपने देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते थे। हमारे लिए भोजन केवल जीविका का साधन नहीं था; वह प्रकृति का प्रसाद था।
इसी कारण हमारे त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे। वे प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध, सामुदायिक जीवन की एकता और परंपराओं के प्रति सम्मान के जीवंत प्रतीक थे।
(क्रमशः)
Friday, 8 May 2026
अबूझमाड़ में जीवन और आजीविका : पारिस्थितिकी और सामाजिक संरचना
यद्यपि “अबूझमाड़” शब्द ने हाल के दशकों में प्रशासनिक तथा अकादमिक प्रचलन प्राप्त कर लिया है, तथापि यह सम्भावना कम है कि यह स्थानीय समुदायों द्वारा प्रयुक्त मूल अथवा ऐतिहासिक नाम रहा हो। नृवंशविज्ञान (एथनोग्राफी) संबंधी साक्ष्य तथा मौखिक परंपराएँ संकेत करती हैं कि इस क्षेत्र को लंबे समय से पड़ोसी जनजातीय समाजों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता रहा है, जो यहाँ की बसावट, आजीविका और सामाजिक विभेदों को प्रतिबिंबित करते हैं। बस्तर के मैदानी अथवा अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में निवास करने वाले माड़िया (मारिया) समुदायों के बीच वर्तमान अबूझमाड़ से संबद्ध घने वनाच्छादित और पहाड़ी आंतरिक क्षेत्र को प्रायः “माड़ेम” कहा जाता है। स्थानीय प्रयोग में “माड़ेम” किसी औपचारिक रूप से सीमांकित भौगोलिक इकाई को नहीं, बल्कि ऐसे भू-भाग को सूचित करता है जहाँ मुख्यतः माड़िया लोग निवास करते हैं। अबूझमाड़ के आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त मौखिक विवरण इस शब्द को “माड़ियाओं की भूमि” के रूप में व्याख्यायित करते है। इस प्रकार यह एक जातीय-भौगोलिक सूचक (ethno-territorial descriptor) के रूप में कार्य करता है, न कि किसी मानचित्रगत (cartographic) संज्ञा के रूप में।
लोकप्रिय तथा कभी-कभी प्रशासनिक विमर्श में इस आंतरिक क्षेत्र के निवासियों को “बड़ा माड़िया” भी कहा जाता है। शाब्दिक रूप से इसका अर्थ “बड़ा” अथवा “महान” माड़िया होता है, किंतु यह सम्बोधन प्रायः अपमानजनक भी माना जाता है। इसलिए अकादमिक उपयोग में इसके प्रति सावधानी अपेक्षित है। यह शब्द वस्तुनिष्ठ नृवंशीय (ethnographic) भिन्नता की अपेक्षा असमान शक्ति-संबंधों और सांस्कृतिक धारणाओं को अधिक प्रतिबिंबित करता है। प्रारम्भिक मानवशास्त्रीय लेखन, विशेषकर वेरियर एल्विन के अध्ययनों में, जनजातीय समूहों को उनके पारिस्थितिक क्षेत्रों तथा आजीविका पद्धतियों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया। एल्विन और अन्य विद्वानों ने वनाच्छादित पहाड़ियों में रहने वाले समुदायों और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच भेद स्थापित करते हुए उन्हें क्रमशः “हिल मारिया” और “बाइसन-हॉर्न मारिया” कहा। यद्यपि इन श्रेणियों का उद्देश्य वर्णनात्मक प्रकारिकी (descriptive typologies) प्रस्तुत करना था। बाद के अध्ययनों ने यह रेखांकित किया कि ऐसी वर्गीकरण प्रणालियाँ प्रायः पारिस्थितिक अंतरों को कठोर सामाजिक श्रेणियों में रूपांतरित कर देती थीं।
गहन परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि अबूझमाड़ क्षेत्र की पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में निवास करने वाले मारिया (माड़िया) और मुरिया समुदाय मूलतः एक ही व्यापक जातीय-भाषाई (ethnolinguistic group) समूह का हिस्सा हैं, जिनमें दिखाई देने वाले अंतर मुख्यतः भौगोलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक पृथकता तथा बाहरी प्रभावों के असमान संपर्क के परिणाम हैं। इन समूहों को सामान्यतः व्यापक गोंड जनजातीय समूह की उप-श्रेणियों के रूप में समझा जाता है, जिनमें भाषाई, सांस्कृतिक और अनुष्ठानिक समानताएँ विद्यमान हैं। तथापि, यह स्वीकार करना भी समान रूप से आवश्यक है कि गोंड सामाजिक संरचना के भीतर आंतरिक पदानुक्रम भी मौजूद रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से गोंड शासक वंशों ने बस्तर और उससे लगे क्षेत्रों के बड़े हिस्सों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया था, किंतु उन्होंने माड़ियाओं को सामाजिक समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं किया। नृवंशविज्ञानिक तथा ऐतिहासिक विवरण संकेत करते हैं कि उच्च गोंड समूहों में कठोर अंतर्विवाह प्रथा विद्यमान थी तथा गोंड अभिजात वर्ग माड़िया समुदायों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने से परहेज़ करता था। यह प्रवृत्ति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि गोंड पहचान कभी भी पूर्णतः सामाजिक रूप से समरूप नहीं रही और जिस “जनजातीय” श्रेणी को बाहरी दृष्टि से अक्सर एकरूप माना जाता है, उसके भीतर भी स्तरीकरण विद्यमान था।
माड़िया जनसंख्या केवल अबूझमाड़ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। माड़िया समुदाय पूरे बस्तर क्षेत्र में व्यापक रूप से फैले हुए हैं तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले तक विस्तृत हैं। अबूझमाड़ के माड़ियाओं को सामान्यतः अबूझमाड़िया कहा जाता है। इनको अन्य क्षेत्रों के माड़ियाओं से जो बात अलग करती है, वह उनकी जातीय उत्पत्ति नहीं, बल्कि उनका ऐतिहासिक पृथक्करण है। क्षेत्र के घने जंगलों, दुर्गम भू-आकृति और लंबे प्रशासनिक उपेक्षा काल के कारण अबूझमाड़ लंबे समय तक गैर-जनजातीय समाज के सतत संपर्क से लगभग पृथक बना रहा। परिणामस्वरूप, मैदानी और अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में रहने वाले माड़िया समुदाय पड़ोसी गाँवों, बाजारों और नगरीय केंद्रों के नियमित संपर्क में आए तथा धीरे-धीरे बाहरी सांस्कृतिक व्यवहारों, भौतिक रूपों और सामाजिक संस्थाओं के कुछ तत्वों को अपनाने लगे। इसके विपरीत, अबूझमाड़ के आंतरिक भागों में रहने वाले अबूझमाड़िया समुदायों ने अपनी सामाजिक संस्थाओं, अनुष्ठानिक परंपराओं और निर्वाह पद्धतियों को अपेक्षाकृत सीमित बाहरी प्रभावों के साथ संरक्षित रखा। अतः इस विभेदन को पृथक जनजातीय पहचान के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि असमान ऐतिहासिक संपर्क और भौगोलिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप समझा जाना चाहिए।
अबूझमाड़ के आंतरिक क्षेत्र में निवास करने वाले समुदाय मुख्यतः कृषक हैं और वे वनाच्छादित तथा पहाड़ी भूभाग में फैली छोटी तथा विरल आबादी वाली बस्तियों में रहते हैं। गाँवों का आकार सीमित बना रहता है, जो एक ओर पारिस्थितिक सीमाओं को और दूसरी ओर बाज़ारोन्मुख कृषि के स्थान पर निर्वाह-आधारित उत्पादन प्रणालियों पर उनकी निरंतर निर्भरता को दर्शाता है। अबूझमाड़िया जनजातियाँ आज भी स्थानांतरण कृषि (झूम अथवा पोडू कृषि) पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार का कृषि जीवन विशेषकर पहाड़ियों की ढलानों पर निवास करने वाले इस समुदाय के लोग करते हैं। यह कृषि पद्धति, जो नाजुक ऊपरी पारिस्थितिक (fragile upland ecosystems) तंत्रों के अनुकूल विकसित हुई है, वन क्षेत्रों की चक्रीय सफाई और पुनरुत्पादन (cyclical clearing and regeneration of forest patches) पर आधारित है तथा स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान (local ecological knowledge) से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। विकासवादी विमर्शों में यद्यपि इसे प्रायः “आदिम” कृषि कहा जाता है, किंतु अबूझमाड़ में यह एक ऐतिहासिक रूप से विकसित आजीविका रणनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जो निर्वाह की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करती है।
अबूझमाड़िया समुदायों की खाद्य आदतें पारिस्थितिक उपलब्धता (ecological availability) तथा निर्वाहगत सीमाओं (subsistence constraints) दोनों को प्रतिबिंबित करती हैं। दैनिक भोजन सामान्यतः तीन साधारण आहारों तक सीमित रहता है, जिनमें मुख्यतः मोटे अनाज और वन उत्पाद सम्मिलित होते हैं। प्रातःकालीन भोजन सामान्यतः रागी (एल्यूसाइन कोरकाना) से निर्मित पतले माड़ अथवा पेय के रूप में होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर “पेज” कहा जाता है। मध्याह्न भोजन भी लगभग इसी प्रकार का होता है और उसमें प्रायः उबले हुए महुआ (मधुका इंडिका) को सम्मिलित किया जाता है, जो पोषण और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण वन उत्पाद है। रात्रिकालीन भोजन में सामान्यतः रागी अथवा मोटा चावल सम्मिलित होता है, जिसे प्रायः नमक और अत्यंत सीमित सहायक खाद्य पदार्थों के साथ ग्रहण किया जाता है। पशु-आधारित प्रोटीन का सेवन सीमित मात्रा में होता है और वह मुख्यतः अनुष्ठानों तथा उत्सवों तक सीमित रहता है। चिकन सबसे सामान्य रूप से खाया जाने वाला मांस है। मांस का नियमित उपभोग केवल व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक मानदंडों से भी नियंत्रित होता है।
भौतिक सादगी के बावजूद अबूझमाड़िया समुदाय अत्यंत समृद्ध मौखिक परंपरा (vibrant oral tradition) के धारक हैं। लोककथाएँ (Folklore), मिथक (myths), अनुष्ठानिक आख्यान (ritual narratives), गीत और ऐतिहासिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती हैं। यह विधाएँ सामूहिक पहचान, नैतिक मूल्यों, पारिस्थितिक ज्ञान तथा सामाजिक मान्यताओं के संरक्षण का प्रमुख माध्यम बानी हैं। लिखित परंपरा के अभाव में मौखिक संस्कृति न केवल इतिहास के भंडार के रूप में कार्य करती है, बल्कि सामुदायिक एकता की संरचना के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
स्वतंत्रता के पश्चात अबूझमाड़ क्षेत्र में शासन-प्रशासन केवल भौगोलिक दुर्गमता से ही नहीं, बल्कि विशिष्ट नीतिगत विकल्पों (deliberate policy choices) और प्रशासनिक दृष्टिकोणों (administrative philosophies) से भी प्रभावित हुआ। कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों, विशेषकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व अधिकारी और बस्तर के जिला कलेक्टर रहे बी. डी. शर्मा की भूमिका ने राज्य और अबूझमाड़ के संबंधों को आकार देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। शर्मा ने निरंतर इस क्षेत्र के प्रति गैर-हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण का समर्थन किया और यह तर्क दिया कि आदिवासी समुदायों को राज्यीय हस्तक्षेप तथा बाहरी शोषण से बचाया जाना चाहिए। यद्यपि यह दृष्टिकोण जनजातीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण की चिंता पर आधारित था, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इसका परिणाम प्रशासनिक अनुपस्थिति के दीर्घीकरण के रूप में सामने आया। संतुलित राज्यीय हस्तक्षेप के अभाव में अबूझमाड़ नियमित शासन-व्यवस्थाओं, जैसे राजस्व प्रशासन, सार्वजनिक सेवा वितरण और संस्थागत निगरानी, के दायरे से काफी हद तक बाहर बना रहा। समय के साथ, जब गैर-हस्तक्षेपवादी नीति के साथ सहभागी शासन की वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित नहीं की गईं, तब इसने अबूझमाड़िया समुदायों की निरंतर पृथकता को और गहरा किया।
ऐतिहासिक अभिलेख संकेत करते हैं कि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में अबूझमाड़ क्षेत्र का कम-से-कम आंशिक मानचित्रण (partially mapped) और सर्वेक्षण किया गया था, जो सीमित और संसाधन-उन्मुख प्रशासनिक रुचि (limited and extractive in nature) को दर्शाता है। किंतु स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक अथवा विकासोन्मुख प्रशासन का समान विस्तार नहीं हुआ। इसके विपरीत, अबूझमाड़ उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के भीतर एक परिधीय क्षेत्र (marginal space within the post-colonial state) के रूप में बना रहा, जहाँ आंतरिक भागों में कोई पूर्णतः कार्यशील अथवा स्थायी प्रशासनिक ढाँचा विकसित नहीं हो सका। शासन के इस दीर्घकालिक रिक्त स्थान ने क्षेत्र को माओवादी उग्रवादी समूहों के लिए विशेष रूप से अनुकूल बना दिया, जिन्होंने अबूझमाड़ को “सुरक्षित आश्रय” (“safe haven”) अथवा “मुक्त क्षेत्र” (“liberated zone”) के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। घने जंगल, कठिन भूभाग और न्यूनतम राज्यीय उपस्थिति ने उग्रवादी समूहों को अपेक्षाकृत स्वतंत्र संचालन की सुविधा प्रदान की, जिसके माध्यम से उन्होंने इस क्षेत्र का उपयोग संगठन, प्रशिक्षण और रसद समन्वय के लिए किया। समय के साथ माओवादी प्रभाव ने नागरिक प्रशासन की संभावनाओं को और जटिल बना दिया, जिससे एक ऐसा चक्र निर्मित हुआ जिसमें असुरक्षा ने राज्यीय अनुपस्थिति को उचित ठहराया और अनुपस्थिति ने उग्रवादी जड़ों को और गहरा किया।
प्रशासनिक उपेक्षा के दीर्घकालिक परिणाम अबूझमाड़िया समुदायों के दैनिक जीवन में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वर्तमान समय में भी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच अत्यंत सीमित बनी हुई है। आंतरिक गाँवों के निवासियों को नमक, खाद्य तेल, वस्त्र तथा घरेलू उपयोग की अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए निकटतम साप्ताहिक हाटों तक पहुँचने हेतु प्रायः 20–25 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। ये यात्राएँ अधिकांशतः घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर की जाती हैं तथा मौसमी परिस्थितियों और गाँव की स्थिति के अनुसार दो से चार दिनों तक भी चल सकती हैं। आधारभूत अवसंरचना (Basic infrastructure) अत्यंत अपर्याप्त है। सुरक्षित पेयजल की विश्वसनीय व्यवस्था लगभग अनुपस्थित है, जिसके कारण समुदायों को मौसमी जलधाराओं (seasonal streams), वन स्रोतों अथवा अत्यंत साधारण कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक पहुँच भी सीमित अथवा अनियमित बनी हुई है, जिससे दीर्घकालिक असुरक्षा और वंचना की स्थितियाँ लगातार पुनरुत्पादित होती रहती हैं।
वंचना की यह स्थिति क्षेत्र की समृद्ध प्राकृतिक संपदाओं जैसे घने वनों और विविध वन-आधारित संसाधनों आदि के साथ तीव्र विरोधाभास प्रस्तुत करती है। इन संसाधनों का लाभ स्थानीय समुदायों के जीवन-स्तर में सुधार के रूप में परिवर्तित नहीं हो सका है। इसके विपरीत, कठोर वन व्यवस्थाओं, बाज़ार तक सीमित पहुँच तथा कमजोर संस्थागत समर्थन के कारण संसाधन-संपन्नता और स्थायी निर्धनता साथ-साथ विद्यमान हैं। परिणामस्वरूप, अबूझमाड़िया समुदायों का भौतिक जीवन आज भी कठिनाइयों, असुरक्षा और अनिश्चितताओं से चिह्नित है। यह विरोधाभास की जहाँ पारिस्थितिक समृद्धि के साथ मानवीय अभाव सह-अस्तित्व में हैं, अबूझमाड़ में संरचनात्मक हाशियाकरण की प्रकृति को रेखांकित करता है तथा ऐसे शासन-मॉडलों की तात्कालिक आवश्यकता को उजागर करता है जो अधिकार-सुरक्षा, विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित हों।
Wednesday, 6 May 2026
जनगणना, पहचान और आदिवासी धर्म कोड: समाधान या भ्रम?
भारत को यदि किसी एक सूत्र में समझना हो, तो वह उसकी असाधारण सांस्कृतिक बहुलता और उस बहुलता के भीतर विद्यमान गहरी एकात्म चेतना है। यह वह भूमि है जहाँ हजारों वर्षों से अनेक भाषाएँ, पंथ, पूजा-पद्धतियाँ, परंपराएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एक-दूसरे के विरोध में नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित होती रही हैं। भारतीय धार्मिक संरचना की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि यहाँ धर्म किसी कठोर, बंद और एकरूप व्यवस्था का नाम नहीं है। यहाँ धर्म जीवन की विविध अभिव्यक्तियों, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, लोकाचार, परंपरा, स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता का व्यापक अनुभव है। इसी कारण भारत के जनजातीय समाजों की धार्मिक परंपराएँ, प्रकृति पूजा, पूर्वज पूजा, टोटेम, ग्राम देवताओं की आराधना, धरती माता और वनदेवताओं के प्रति श्रद्धा आदि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सबसे प्राचीन और जीवंत अभिव्यक्तियों के रूप में दिखाई देती हैं।
किन्तु हाल के वर्षों में “Other Religions and Persuasions (ORP)” के स्थान पर पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग ने एक नया विमर्श खड़ा किया है। इस मांग को कुछ लोग जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रश्न मानते हैं, जबकि यह मांग भारतीय सभ्यता की उस ऐतिहासिक एकात्मता को खंडित करने का प्रयास है, जिसने सदियों से जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों को एक साझा सांस्कृतिक प्रवाह में बाँधकर रखा। यह विवाद केवल जनगणना के एक कॉलम या प्रशासनिक वर्गीकरण का नहीं है; यह भारत की सभ्यतागत आत्मा, धार्मिक पहचान और संवैधानिक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
भारतीय धार्मिक परंपरा का विकास किसी एक पैगंबर, एक ग्रंथ या एक संस्थापक पर आधारित नहीं रहा। यही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। ऋग्वेद में अग्नि, वायु, सूर्य, पृथ्वी और जल जैसे प्रकृति तत्वों की उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। बाद की पुराणिक परंपराओं में ग्रामदेवताओं, कुलदेवियों और लोक-आस्थाओं को व्यापक धार्मिक संरचना के भीतर स्थान मिला। यदि हम जनजातीय समाज की धार्मिक परंपराओं को देखें, तो धरती माता, वनदेवता, सूर्य-चंद्र, पूर्वजों और पवित्र वृक्षों की पूजा उसी सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है। वास्तव में भारतीय पूजा-पद्धतियों की जड़ें ही प्रकृति और लोक परंपराओं में निहित हैं। इसलिए तथाकथित “आदिवासी धर्म” और “सनातन परंपरा” के बीच एक कृत्रिम विभाजन रेखा खींचने का प्रयास ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से असंगत है।
समस्या तब और गहरी हो जाती है जब भारतीय जनजातीय समाज को समझने के लिए पश्चिमी मानवविज्ञान के मॉडल लागू किए जाते हैं। औपनिवेशिक काल में यूरोपीय मानवविज्ञानियों ने अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के अनुभवों के आधार पर मानव समाजों को “आदिम” से “सभ्य” अवस्था की ओर बढ़ने वाले विकासवादी ढाँचे में देखने का प्रयास किया। इस दृष्टिकोण में जनजातीय समुदायों को सामाजिक विकास की प्रारंभिक अवस्था का प्रतिनिधि माना गया। भारत के संदर्भ में भी यही दृष्टिकोण थोपा गया और यह स्थापित करने का प्रयास हुआ कि जनजातीय समाज “मुख्यधारा” से पृथक और कम विकसित समुदाय हैं। किन्तु भारतीय अनुभव इस पूरी अवधारणा को अस्वीकार करता है। भारत की जनजातियाँ कभी भी भारतीय सभ्यता से अलग-थलग इकाई नहीं रहीं। वे इस सभ्यता के निर्माण, संरक्षण और विस्तार की सहभागी रही हैं।
भारतीय समाजशास्त्र और मानवविज्ञान के प्रमुख विद्वानों, गोविन्द सदाशिव घुर्ये, निर्मल कुमार बोस, श्यामा चरण दुबे और सुरजीत सिन्हा आदि ने अपने अध्ययनों में स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया कि भारतीय जनजातीय समाज को समझने के लिए भारतीय इतिहास, संस्कृति और सामाजिक संरचना की विशिष्टता को स्वीकार करना आवश्यक है। भारत में जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों के संबंध केवल सह-अस्तित्व तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें भावनात्मक, सांस्कृतिक, धार्मिक और नातेदारी के गहरे संबंध विकसित हुए। यह संबंध किसी औपनिवेशिक संरचना की तरह शासक और शासित का नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय और सहजीवन का उदाहरण था।
भारतीय सभ्यता का मूल तत्व “एकता में विविधता” रहा है। यहाँ विभिन्न समुदायों के बीच संबंध संघर्ष या अलगाव पर आधारित नहीं रहे, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान और सांस्कृतिक सहभागिता पर आधारित रहे हैं। मध्य भारत के गोंड समुदाय की धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति पूजा और व्यापक भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। झारखंड के सरना समुदाय में साल वृक्ष की पूजा भारतीय वृक्ष-पूजा परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है। अरुणाचल प्रदेश की डोनी-पोलो परंपरा में सूर्य और चंद्रमा की उपासना वैदिक देवताओं की स्मृति जगाती है। राजस्थान के भील समुदाय में शिव पूजा शैव परंपरा से उनका सांस्कृतिक संबंध स्पष्ट करती है। यदि इन परंपराओं को ध्यान से देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय धार्मिक जीवन की विविध धाराएँ किसी विभाजन की नहीं, बल्कि निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह की कहानी कहती हैं।
भारतीय समाज में विवाह और नातेदारी के संबंधों ने भी जनजातीय और अन्य समुदायों के बीच गहरी सामाजिक एकता का निर्माण किया। अनेक क्षेत्रों में स्थानीय जातीय समूहों और जनजातीय समुदायों के बीच वैवाहिक संबंधों ने सामाजिक दूरी को कम किया और सांस्कृतिक निकटता को बढ़ाया। यह स्थिति पश्चिमी औपनिवेशिक समाजों से बिल्कुल भिन्न थी, जहाँ आदिवासी समुदायों को अक्सर “रिजर्व” क्षेत्रों में सीमित कर दिया गया और उन्हें मुख्य समाज से अलग रखने की नीति अपनाई गई। भारत में जनजातीय समाज गाँवों, मेलों, तीर्थों, धार्मिक उत्सवों और आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से निरंतर व्यापक समाज के संपर्क में रहे। यही कारण है कि भारतीय जनजातीय जीवन को अलग-थलग या पृथक पहचान के रूप में देखना भारतीय यथार्थ को नकारने जैसा है।
इतिहास भी इस सत्य की पुष्टि करता है कि जनजातीय समाज केवल सांस्कृतिक इकाई नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारत की राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता संघर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संथाल विद्रोह, भील आंदोलन, कोल विद्रोह और भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान केवल स्थानीय असंतोष नहीं थे; वे औपनिवेशिक दमन और सांस्कृतिक अपमान के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध के शक्तिशाली अध्याय थे। इन आंदोलनों में जनजातीय समाज स्वयं को भारत की व्यापक सभ्यतागत चेतना से पृथक नहीं मानता था। वे अपनी परंपराओं की रक्षा के साथ-साथ उस सांस्कृतिक स्वाभिमान की भी रक्षा कर रहे थे, जो भारत की आत्मा का हिस्सा है।
भारतीय दर्शन में प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य को अत्यंत महत्व दिया गया है। यही दृष्टिकोण जनजातीय जीवन में भी दिखाई देता है। वन, जल, भूमि और जीव-जंतुओं के प्रति श्रद्धा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। आज जब पूरी दुनिया “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” और पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब यह समझना आवश्यक है कि भारतीय जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीता आया है। आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श जिन मूल्यों को नए सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत करता है, वे जनजातीय जीवन में प्राचीन काल से विद्यमान रहे हैं।
ऐसी स्थिति में पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या सैकड़ों जनजातीय पंथों और स्थानीय आस्थाओं को एक ही “आदिवासी धर्म” की श्रेणी में समाहित किया जा सकता है? यदि गोंड, सरना, डोनी-पोलो, भील, मुंडा और अन्य समुदायों की परंपराएँ अलग-अलग हैं, तो क्या उन्हें एक कृत्रिम प्रशासनिक कोड में बाँधना उनकी वास्तविक विविधता को समाप्त नहीं करेगा? विडंबना यह है कि जो लोग सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण के नाम पर पृथक कोड की मांग कर रहे हैं, वही विविधता को एक प्रशासनिक श्रेणी में सीमित करने का प्रयास भी कर रहे हैं।
दूसरा प्रश्न संविधान और भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण से जुड़ा है। संविधान सभा की बहसों में धर्म को एक व्यापक सांस्कृतिक श्रेणी के रूप में देखा गया था। “हिंदू” शब्द को केवल संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत श्रेणी के रूप में समझा गया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वयं यह स्पष्ट किया था कि भारतीय समाज में धार्मिक पहचान बहुस्तरीय है। हिंदू विधि सुधारों (Hindu Code बिल्स) के दौरान भी “हिंदू” की परिभाषा में अनेक पंथों और समुदायों को शामिल किया गया। भारतीय न्यायपालिका ने भी बार-बार यही माना है कि हिंदू धर्म किसी एक पैगंबर, एक ग्रंथ या एक सिद्धांत पर आधारित नहीं है। शास्त्री यज्ञपुरुषदास बनाम मूलदास वैश्य (1966) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “हिंदू धर्म जीवन जीने की एक पद्धति है।” एस.पी. मित्तल बनाम भारत संघ (1983) और रामकृष्ण मिशन केस (1995) में भी न्यायालय ने हिंदू धर्म की व्यापकता और बहुलता को रेखांकित किया। इन निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय आस्थाएँ इस व्यापक सांस्कृतिक परंपरा के भीतर स्वाभाविक रूप से समाहित हैं।
जनगणना के संदर्भ में भी पृथक धर्म कोड की मांग व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करती है। भारत सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि धर्म कोड का उद्देश्य केवल गणना और प्रशासनिक सुविधा है। 2001 की जनगणना में सौ से अधिक जनजातीय धर्मों और पंथों का उल्लेख सामने आया था। ऐसे में प्रत्येक समुदाय के लिए पृथक कोड देना प्रशासनिक दृष्टि से लगभग असंभव है। “Other Religions and Persuasions” श्रेणी किसी भेदभाव का संकेत नहीं, बल्कि एक तकनीकी व्यवस्था है। इसे सांस्कृतिक अस्वीकृति के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।
यह भी याद रखना चाहिए कि “animism” और “tribal religion” जैसी श्रेणियाँ औपनिवेशिक प्रशासन की देन थीं। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज को अलग-अलग वर्गों में बाँटकर देखने की नीति अपनाई, ताकि सांस्कृतिक एकता को कमजोर किया जा सके। आज यदि हम उसी औपनिवेशिक दृष्टिकोण को नए नामों के साथ पुनर्जीवित करते हैं, तो यह भारत की सभ्यतागत निरंतरता को समझने में गंभीर भूल होगी।
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जनजातीय समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल पृथक धर्म कोड में निहित है? क्या इससे उनकी आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य, वनाधिकार या सांस्कृतिक संरक्षण के प्रश्न हल हो जाएंगे? वास्तविक आवश्यकता यह है कि जनजातीय भाषाओं, लोककला, परंपराओं, ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक संस्थाओं को सशक्त किया जाए। संरक्षण का मार्ग सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सम्मान में है, न कि केवल प्रशासनिक वर्गीकरण में।
भारत की जनजातीय परंपराएँ इस राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों का हिस्सा हैं। वे “अन्य” नहीं हैं; वे भारत की आत्मा की मूल अभिव्यक्तियाँ हैं। उन्हें पृथक पहचान देने के नाम पर भारतीय सभ्यता की व्यापक सांस्कृतिक एकता से काटना समाधान नहीं, बल्कि एक नया भ्रम उत्पन्न करना है। भारत का वास्तविक मॉडल संघर्ष का नहीं, बल्कि समन्वय, सहजीवन और सांस्कृतिक एकात्मता का रहा है। यही भारतीयता की शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी सभ्यतागत विशेषता भी।
Monday, 4 May 2026
भय से विश्वास तक: बंगाल के बदलते राजनीतिक मानस की कहानी
Bengal’s Political Reset: Why the BJP’s Rise Signals a New Era of Governance and Aspiration
The
spectacular electoral success of the Bharatiya Janata Party (BJP) in West Bengal
Assembly Elections marks far more than a routine change in political fortunes.
It represents a structural transformation in the state’s political
consciousness. For decades, West Bengal remained a stronghold of ideological
continuity, first under the Left Front and later under the All India Trinamool
Congress (TMC) led by Mamata Banerjee. This continuity, however, increasingly
came at the cost of governance innovation, economic dynamism, and institutional
accountability.
The
BJP’s rise, therefore, must be interpreted not merely as an electoral outcome,
but as a collective assertion of voter aspiration, a demand for governance that
is efficient, transparent, and aligned with national growth trajectories.
The Political Momentum Behind the
BJP’s Rise
At
the heart of this transformation lies the leadership of Narendra Modi and Amit
Shah. Their sustained engagement with West Bengal, through high-energy
campaigns, organizational consolidation, and narrative-building, played a
decisive role in repositioning the BJP from a marginal player to a formidable
political force.
What
distinguished this campaign was not merely its scale, but its strategic
clarity:
- · A focus on grassroots expansion beyond urban pockets
- · Engagement with youth and first-time
voters
- ·
A consistent articulation of governance
and development
As
reflected in field-level observations, there was a growing perception among
voters that the BJP leadership was not only willing but eager to assume
responsibility for transforming Bengal’s governance landscape.
Governance Fatigue and the Limits of
Political Continuity
A
central factor behind the electoral shift was the accumulation of governance
fatigue under the TMC regime. While Mamata Banerjee initially emerged as a
symbol of resistance against Left stagnation, over time her administration came
to be associated with several structural concerns.
Employment and Economic Stagnation
One
of the most pressing issues has been the persistent lack of employment
opportunities. As highlighted through sustained personal interactions over the
years, many young people in the state have faced prolonged uncertainty due to
delayed or absent government recruitment processes.
Equally
concerning is the limited growth of the private sector. West Bengal’s
industrial ecosystem has not kept pace with other Indian states, leading to an
overdependence on government employment, an increasingly unsustainable model.
Corruption and Institutional Erosion
Perceptions
of corruption, particularly in public institutions, have further eroded public
trust. Allegations of informal monetary demands in sectors such as education
have reinforced the belief that access to opportunities is mediated not by merit,
but by political patronage.
Such
perceptions, whether universally experienced or not, have had a profound impact
on voter sentiment, contributing to a broader desire for systemic change.
Restoring Faith in the Electoral
Process
An
often-overlooked dimension of this election has been the role of enhanced
security arrangements. The extensive deployment of central forces contributed
to a more credible electoral environment, particularly in regions historically
affected by political intimidation.
Voters
reported a greater sense of confidence in exercising their democratic rights,
free from coercion. The assurance provided by Amit Shah regarding continued
security presence further strengthened this trust .
This
shift underscores a critical principle: free and fair elections are not merely
procedural—they are foundational to democratic legitimacy.
Beyond Welfare: The Rise of
Aspirational Politics
The
TMC government’s welfare initiatives, including schemes such as Lakshmi
Bhandar, undoubtedly provided short-term relief to economically vulnerable
sections. However, the BJP’s success suggests that welfare politics alone is no
longer sufficient.
Across
West Bengal, there is a growing demand for:
- · Sustainable employment
- ·
Industrial development
- · Transparent governance
·
Opportunities for upward mobility
This
transition from welfare dependency to aspirational politics mirrors broader
national trends and reflects a more assertive and forward-looking electorate.
Identity, Equity, and Political
Perception
Another
dimension shaping electoral outcomes has been the perception of uneven
governance. Concerns regarding selective law enforcement and identity-based
political prioritization have contributed to a sense of imbalance among
sections of the electorate.
While
such perceptions are often contested, they nonetheless play a powerful role in
shaping political behavior. The BJP’s ability to channel these concerns into a
broader narrative of equal citizenship and rule of law resonated with many
voters.
Historical Context: From Left Legacy
to Political Realignment
West
Bengal’s political culture has long been shaped by its Left legacy,
characterized by strong cadre networks and mass mobilization strategies. While
Buddhadeb Bhattacharjee made attempts at industrial reform—most notably through
the Tata Nano project—these efforts were ultimately derailed by political
opposition.
The
subsequent transition to TMC rule did not entirely dismantle entrenched
political practices. Instead, elements of cadre-based control and
politicization persisted, leading to cumulative public fatigue.
The
BJP’s rise must therefore be seen as part of a larger process of political
realignment, where voters seek to break from historical continuities that no
longer serve their interests.
Youth, Migration, and the Crisis of
Opportunity
Perhaps
the most compelling driver of change has been the frustration of Bengal’s
youth. With limited local opportunities, many have been compelled to migrate to
other states in search of employment.
This
has created:
- ·
Economic dislocation
- ·
Social strain
- · A growing disconnect between state policy
and citizen aspiration
The
BJP’s promise of development and job creation tapped into this latent
dissatisfaction, transforming it into electoral momentum.
National Security and Strategic
Concerns
West
Bengal’s geopolitical position adds another layer of complexity. Issues related
to border management, illegal immigration, and demographic shifts have increasingly
entered public discourse.
The
BJP’s emphasis on these concerns—framed within a broader narrative of national
security—found resonance among voters who view stability and sovereignty as
integral to development.
The Road Ahead: From Victory to
Governance
While
the BJP’s electoral success is significant, it also raises expectations. The
transition from opposition to governance requires:
- · Delivery on employment promises
- · Revitalization of industrial policy
- ·
Strengthening of institutional integrity
- ·
Inclusive and balanced development
Equally
important is the need to avoid replicating past political patterns, particularly
the absorption of elements that may undermine governance standards.
Bengal and the Vision of a Developed
India
West
Bengal occupies a unique place in India’s civilizational and political history.
From its role in the freedom movement to its contributions to literature, art,
and intellectual discourse, the state has long been a beacon of cultural and
political vitality.
The
BJP’s rise presents an opportunity to reconnect this legacy with contemporary
aspirations. With its rich human capital and strategic advantages, West Bengal
can play a pivotal role in India’s journey toward becoming a developed nation.
Conclusion: A Mandate for
Transformation
The
BJP’s victory in West Bengal is, at its core, a mandate for transformation. It
reflects a collective desire for governance that is:
- · Transparent
- ·
Development-oriented
- · Responsive to citizen needs
It
is also a reminder that democracy, at its best, enables renewal. When political
systems stagnate, the electorate retains the power to demand change.
If
this mandate is translated into meaningful governance outcomes, West Bengal
could once again emerge as a leading force in India’s growth story—fulfilling
not only regional aspirations but also contributing significantly to the
national vision of Viksit Bharat @ 2047.






