The recent news report regarding a professor named Md. Irfan Alam of Satyawati College (Morning), University of Delhi, allegedly clicking photographs of a female student wearing a backless dress in an examination hall is deeply disturbing. The matter is currently under investigation, and the facts will ultimately be established by the competent authorities. Nevertheless, the incident raises important questions about professional ethics, teachers' conduct, and the larger responsibilities associated with the teaching profession. As a teacher myself, the news compelled me to reflect not only on the conduct of an individual but also on the broader culture of higher education and the role we play in shaping the lives of young people.
Reflections (Vivekanand Nartam)
Saturday, 13 June 2026
Educating the Educators: Reflections on the Disturbing Incident at Satyawati College (Morning)
Sunday, 7 June 2026
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देबश्मिता पाल की हत्या: कुछ असहज प्रश्न
दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देबश्मिता पाल की हत्या ने विश्वविद्यालय परिवार के शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों को भीतर तक झकझोर दिया है। देबश्मिता की मृत्यु के साथ केवल एक व्यक्ति का जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि समाज द्वारा निर्मित एक ऐसी शिक्षिका का भी अंत हो गया, जो आने वाले वर्षों में असंख्य विद्यार्थियों, सहकर्मियों और समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती थीं।
स्वयं एक ऐड-हॉक शिक्षक होने के नाते मैं उनके संघर्ष को कुछ हद तक समझ सकता हूँ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वे वर्ष 2023 में स्थायी प्रोफेसर बनी थीं। लंबे संघर्षों के बाद जीवन की एक स्थिर और आश्वस्त अवस्था उनके सामने खुल रही थी। अब उन्हें एक उत्कृष्ट शिक्षिका के रूप में, समाज की नैतिक चेतना के संवाहक के रूप में और अनेक अन्य भूमिकाओं में योगदान देना था। किंतु उनकी असामयिक और क्रूर हत्या ने अनेक ऐसे प्रश्न हमारे सामने खड़े कर दिए हैं, जिन पर एक शिक्षक, एक विद्यार्थी और एक समाज के रूप में हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए।
मीडिया और पुलिस सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, उनकी हत्या कोलकाता स्थित उनकी पैतृक संपत्ति को लेकर हुई। बताया जा रहा है कि उनके मकान में किराये पर रहने वाले एक दंपति ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया, क्योंकि वे उस संपत्ति को खरीदना चाहते थे और देबश्मिता उसे बेचना नहीं चाहती थीं। संपत्ति के मोह ने उन्हें इतना अंधा कर दिया कि उन्होंने एक निर्दोष जीवन को समाप्त कर दिया।
मेरे मन में बार-बार एक प्रश्न उठता है—किसी व्यक्ति को यह विश्वास कैसे हो जाता है कि वह इतना बड़ा अपराध करके भी बच निकलेगा? क्या उसे कानून, न्याय और समाज की सामूहिक चेतना पर भरोसा नहीं रहता, या फिर उसे यह लगता है कि धन और प्रभाव हर अपराध को ढक सकते हैं? यह प्रश्न केवल इस घटना तक सीमित नहीं है; यह हमारे समय और समाज के चरित्र से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
एक शिक्षक होने के साथ-साथ सामाजिक जीवन से जुड़े व्यक्ति के रूप में मुझे विविध प्रकार के लोगों से मिलने का अवसर मिला है। दिल्ली विश्वविद्यालय में आने से पहले मैंने संसद में कांग्रेस, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के सांसदों के संसदीय निजी सचिव के रूप में भी कार्य किया है। जीवन के 43 वर्षों में मुझे ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने निस्वार्थ भाव से मेरा मार्गदर्शन किया, मेरे जीवन को संवारने के अवसर दिए और कठिन समय में संबल बनकर खड़े रहे। वे मेरे लिए देवदूतों से कम नहीं है।
परंतु इसके साथ ही मैंने यह भी अनुभव किया है कि समाज में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो अपने स्वार्थ, महत्वाकांक्षाओं और व्यक्तिगत लाभ को ही जीवन का केंद्र बना लेते हैं। यह कोई नई बात नहीं है, परंतु चिंताजनक तब हो जाती है जब समाज की व्यवस्थाएँ भी, अनजाने में अथवा सत्ता में बने रहने के लिए जानबूझकर, ऐसे ही प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने लगती हैं।
हम व्यक्ति निर्माण, मूल्य शिक्षा और चरित्र निर्माण की बातें बड़े उत्साह से करते हैं। अनेक प्रशिक्षण शिविरों, व्याख्यानों और संगोष्ठियों में इन विषयों पर गंभीर चर्चा होती है। किंतु व्यवहारिक जीवन में अक्सर वही लोग निर्णयकारी स्थानों पर पहुँचते दिखाई देते हैं जो सफलता की दौड़ में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार होते हैं। संवेदनशील, ईमानदार और मूल्यनिष्ठ लोगों को प्रायः अव्यावहारिक मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप समाज के भीतर यह धारणा बनती जाती है कि सफलता का मार्ग केवल धन, प्रभाव और चतुराई से होकर गुजरता है।
यदि समाज के बड़े हिस्से में यह विश्वास स्थापित हो जाए कि मूल्य और नैतिकता केवल पुस्तकों के विषय हैं, जीवन के नहीं, तो फिर संपत्ति, शक्ति या लाभ के लिए अपराधों का बढ़ना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह जाती।
राजनीति इसका एक उदाहरण है। हमारे समाचार चैनल दिन-रात चुनावी समीकरणों, जीत-हार और सत्ता की रणनीतियों पर चर्चा करते हैं। राजनीति घर-घर में चर्चा का विषय बन चुकी है। परंतु आम जनमानस के मन में धीरे-धीरे यह भावना भी घर कर रही है कि राजनीति में वही आगे बढ़ता है जिसके पास धन, संसाधन और प्रभाव है। मेरे कई व्यक्तिगत अनुभव ऐसे है कि यह धारणा सत्य के नीव पर आधारित लगती है। यदि समाज के अन्य लोग भी सदैव ऐसा ही अनुभव करने लगें तो यह गहरी चिंता का विषय अवश्य है।
यह बात केवल राजनीतिक दलों पर लागू नहीं होती। अनेक सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संगठन भी समय-समय पर इसी प्रकार के आत्ममंथन की आवश्यकता महसूस करते हैं। हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या हम वास्तव में अच्छे लोगों को आगे बढ़ाने का साहस रखते हैं, या केवल उनकी प्रशंसा करके संतुष्ट हो जाते हैं? कभी कभी तो हम केवल उनका उपयोग कर लेते है।
हम अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, भारतीय ज्ञान परंपरा और विश्वगुरु बनने की आकांक्षा पर गर्व करते हैं। यह गर्व स्वाभाविक भी है। किंतु साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि समाज के भीतर कौन-सी प्रवृत्तियाँ हमारी जड़ों को कमजोर कर रही हैं। यह किसी राजनीतिक दल या संगठन को दोष देने का विषय नहीं है; यह सामूहिक आत्मचिंतन का विषय है। साथ ही में हमारे राजनितिक दल और सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों को भी इस बात पर आत्मचिंतन और आत्ममंथन करना ही होगा। सत्ता सदैव नहीं रहती।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।” समाज के रूप में हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या हम सद्कर्म करने वालों को पर्याप्त सम्मान और संरक्षण दे पा रहे हैं? क्या हम दुष्कर्मों के प्रति उतने ही स्पष्ट और कठोर हैं जितने होने चाहिए?
कब तक हम केवल अपने गौरवशाली अतीत का गुणगान करते रहेंगे और वर्तमान की चुनौतियों से आँख चुराते रहेंगे? कब तक मूल्य और आदर्श हमारे भाषणों तक सीमित रहेंगे? कुछ लोगों को तो बोलना ही होगा, कुछ लोगों को जोखिम उठाना ही होगा। लाभ-हानि के गणित से ऊपर उठकर समाज के सामने नवसृजन के स्वप्न रखने होंगे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की पंक्तियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं—“जोदी तोर डाक सुने केउ ना आसे तोबे एकला चलो रे।
इस पूरी घटना का एक दूसरा पक्ष भी है, जो हमारे परिवार और सामाजिक संबंधों से जुड़ा हुआ है। आज परिवार भी समाज में बढ़ती स्वार्थपरायणता और व्यक्तिकेंद्रित जीवनशैली के प्रभाव से अछूते नहीं रहे हैं। अकेलापन बढ़ रहा है। संबंधों में स्थायित्व और प्रतिबद्धता का संकट दिखाई देता है। कई बार प्रेम भी आवश्यकता के साथ शुरू होता है और आवश्यकता समाप्त होने पर समाप्त हो जाता है।
ऐसे समय में देबश्मिता की बड़ी बहन का स्नेह और सतर्कता उल्लेखनीय है। यदि वह नियमित रूप से उनसे संपर्क न करतीं, यदि उनके फोन का उत्तर न मिलने पर चिंता न करतीं, तो संभव है कि इस दुखद घटना का पता और देर से चलता। यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि जीवन में रिश्तों की ऊष्मा कितनी महत्वपूर्ण है।
शायद आज आवश्यकता इस बात की भी है कि परिवारों में, विद्यालयों में और विश्वविद्यालयों के कक्षाओं में हम संबंधों, संवेदनाओं, जिम्मेदारियों और मानवीय मूल्यों पर पुनः चर्चा करें। परिवार प्रबोधन, सामाजिक शुचिता और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व जैसे विषय केवल कार्यक्रमों तक सीमित न रहें, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना का हिस्सा बनें।
इस लेख के माध्यम से मैं कोई नया विचार प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ। मुझसे पहले भी करोड़ों लोगों ने इन विषयों पर लिखा है, आज भी लिख रहे हैं और आगे भी लिखते रहेंगे। किंतु कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिन्हें बार-बार पूछना पड़ता है। कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन पर उंगली रखनी ही पड़ती है, क्योंकि वहीं से उपचार की शुरुआत होती है।
केवल मधुर और सुविधाजनक बातें हमारे व्यक्तिगत हितों को तो साध सकती हैं, परंतु वे उस गहरे और स्थायी परिवर्तन को जन्म नहीं देतीं जिसकी मानव समाज को आवश्यकता है। देबश्मिता पाल की दुखद मृत्यु हमें एक बार फिर यही स्मरण कराती है कि समाज का निर्माण केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि मूल्यों, संबंधों, संवेदनाओं और नैतिक साहस से होता है। और इन्हीं की रक्षा करना हमारे समय की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
Wednesday, 3 June 2026
Beyond False Binaries: Tribal Faith, Conversion, and the Real Challenges Before Adivasi India
A
response to Brinda Karat's article in The Hindu (1 June)
Brinda
Karat's article, "The majoritarian shadow over Adivasi identity,
faith" published in The Hindu on 1 June, raises important questions about
tribal identity, religion, and constitutional rights. However, the article is
marked by a selective reading of realities on the ground and an unmistakable
hostility towards the Janjati Suraksha Manch (JSM), an organisation founded and
led primarily by tribal individuals themselves. While presenting herself as a
defender of Adivasi rights, Karat ends up reducing a complex civilisational and
cultural issue into a simplistic political narrative of "majoritarianism
versus minorities."
As
someone who comes from one of the remotest tribal regions of India and has
lived within the realities of tribal society rather than observing them from
ideological distance, I find this portrayal deeply inadequate and, in several
respects, misleading.
The
central weakness of Karat's argument is that she treats the growing concern
over religious conversions among tribal communities as if it were merely an
extension of a majoritarian political project. In doing so, she completely
ignores the genuine anxieties of countless tribal families who have witnessed
the gradual erosion of their traditional belief systems, customs, rituals,
festivals, and community institutions under the influence of organised
missionary activity.
The
issue is not whether an individual has the constitutional right to choose a
religion. Article 25 of the Constitution guarantees precisely that freedom. The
real question is whether conversions achieved through inducement, dependency
networks, social pressure, material incentives, educational monopolies, or
cultural delegitimisation can genuinely be described as exercises of free
choice. This is a question that deserves honest engagement rather than
ideological dismissal.
For
decades, Christian missionary organisations belonging to different
denominations have systematically expanded their presence across the tribal
belt of Central India. Having achieved significant success in many parts of the
North-East, their focus increasingly shifted towards tribal communities in
Chhattisgarh, Jharkhand, Odisha, Madhya Pradesh, Maharashtra, and adjoining
regions. Today, it is difficult to find a tribal district in Central India
where missionary institutions do not exercise considerable influence over
social, educational, and religious life.
To
point out this reality is not a form of communalism. It is simply acknowledging
a sociological fact.
The
concern expressed by organisations such as the Janjati Suraksha Manch emerges
from this lived reality. Contrary to the portrayal offered by Karat, JSM was
not created by some external force seeking to impose an alien identity upon
tribal communities. It emerged from within tribal society itself. Its members
include individuals who fear that indigenous traditions inherited over
centuries may disappear within a few generations if current trends continue
unchecked.
Those
who have grown up in tribal villages understand that tribal identity is not
merely an ethnic label. It is intimately connected with sacred groves,
ancestral deities, village festivals, collective rituals, oral traditions, and
a worldview centred around nature. Forests, rivers, mountains, and ancestral
spirits are not symbolic abstractions; they form the living foundation of
community life.
When
conversion occurs, what often follows is not merely a change of personal faith.
Traditional rituals are abandoned, ancestral practices are denounced as
"pagan" or "backward," village festivals lose participants,
and social institutions that once bound communities together begin to fragment.
This cultural transformation cannot be wished away by invoking constitutional
rhetoric alone.
Ironically,
while Karat speaks passionately about preserving Adivasi identity, she remains
conspicuously silent about the role that organised missionary activity has
played in weakening many of the very cultural traditions she claims to defend.
One searches her article in vain for any serious reflection on this aspect.
Equally
absent from her analysis is the question of constitutional safeguards available
to Scheduled Tribes. The debate surrounding the extension of provisions
analogous to those applicable to Scheduled Castes is undoubtedly complex and
deserves careful discussion. Yet it cannot be denied that a growing section of
tribal society feels that converted individuals continue to enjoy benefits
intended to protect vulnerable tribal communities while simultaneously becoming
part of a separate religious minority framework.
Whether
one agrees with this concern or not, it deserves reasoned debate rather than
caricature.
Having
said this, there is one aspect of Karat's article that cannot be dismissed
outright. She is correct in drawing attention to the continuing dispossession
of tribal communities through mining projects, land acquisition, and failures
in implementing protective legislation such as the provisions of the Panchayats
(Extension to Scheduled Areas) Act (PESA) and the Forest Rights Act, 2006.
Indeed,
this is one of the greatest challenges confronting tribal India today.
Across
the country, tribal communities have repeatedly witnessed forests being
diverted, mountains being excavated, rivers being polluted, and ancestral lands
being acquired in the name of development. These are not merely economic
resources for tribal communities. They are sacred landscapes inhabited by their
deities, ancestors, and collective memories.
Any
development model that treats tribal territories merely as repositories of
minerals while ignoring their cultural and spiritual significance is
fundamentally flawed.
The
implementation of PESA and the Forest Rights Act must therefore be strengthened
in both letter and spirit. Gram Sabhas must be empowered rather than bypassed.
Free, prior, and informed consent must become a meaningful reality rather than
a bureaucratic formality. If mineral extraction is undertaken, tribal
communities must receive a substantial and lasting share of the benefits
generated from resources extracted from their lands.
Token
employment opportunities and occasional compensation packages cannot substitute
for genuine economic participation and decision-making power.
Unfortunately,
the beneficiaries of many extractive projects are often not the nation as a
whole but a nexus of corporate interests, political influence, and local power
brokers. Tribal communities frequently bear the environmental and cultural
costs while receiving only a fraction of the benefits.
Yet
acknowledging this reality does not require us to ignore another reality.
The
exploitation of tribal lands and the erosion of tribal faith traditions are not
mutually exclusive concerns. Both can exist simultaneously. One cannot be used
to excuse or conceal the other.
This
is where Karat's article falls short. By focusing almost exclusively on alleged
majoritarian threats, she overlooks the profound cultural consequences of
organised conversion efforts among tribal communities. In her eagerness to
defend missionary activity from criticism, she neglects the voices of those
tribal men and women who seek to preserve their indigenous traditions and who
view conversion as a serious challenge to their cultural continuity.
The
future of tribal India cannot be secured through ideological binaries. It
requires a commitment to protecting tribal faith traditions, strengthening
constitutional safeguards, implementing PESA and the Forest Rights Act
effectively, preventing coercive or inducement-based conversions, and ensuring
that development occurs with the consent and participation of tribal
communities.
The
defence of jal, jungle, zameen and the defence of tribal civilisational
heritage are not competing causes. They are inseparable.
Those
who genuinely care about Adivasi rights must be willing to defend both.
Sunday, 31 May 2026
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे
भाग–3 : पोलवा, हार्रो, आरु और सामुदायिक जीवन की आत्मा
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे
भाग–2 : आम्सताम, मक्का जात्रा, कुल देवता और गोटूल की स्मृतियाँ
पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद भी हमारे कृषि जीवन का उत्सवी क्रम समाप्त नहीं होता था। वास्तव में खेती का प्रत्येक चरण प्रकृति, देवताओं और समुदाय के साथ हमारे संबंधों को पुनर्स्थापित करने का अवसर बन जाता था। खेत में बीज बोने से लेकर फसल के घर पहुँचने तक, हर महत्वपूर्ण पड़ाव का अपना एक उत्सव, अपनी एक परंपरा और अपना एक सांस्कृतिक अर्थ था। 'कोळक', 'पाकिंग', 'पीरता डगी' जैसी कृषि प्रक्रियाएँ केवल खेती के तकनीकी चरण नहीं थीं, बल्कि हमारे सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा थीं।
धान की फसल पक जाने और उसकी कटाई पूरी होने के बाद एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया आरम्भ होती थी। कटे हुए धान को पहले खेत में ही छोटे-छोटे बंडलों में सूखने के लिए रखा जाता था। इन बंडलों को स्थानीय मराठी भाषा में “कड़प्या” तथा माड़िया भाषा में “कोळकु” कहा जाता था। जब वे अच्छी तरह सूख जाते, तब उनकी व्यवस्थित गंजियाँ बनाकर सुरक्षित रखी जाती थीं। धान की इन गांजियों को स्थानिक माडिया भाषा में पाकिंग कहा जाता था। धान से अलग की हुई धान की घास (तनीस) अपने अपने घरों के पास गंजी बनाकर राखी जाती थी उसे स्थानिक मराठी भाषा में "तनसीचा ढग" तो माडिया भाषा में "पीरता डगी" कहा जाता था। इस का उपयोग बैलों के लिए चारे के रूप में किया जाता था।
इसके बाद चूरने का समय आता था। “धान चूरना” अर्थात धान के दानों को उनकी घास और भूसे से अलग करना। यह कार्य आज की तरह मशीनों से नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम और पारंपरिक तरीकों से किया जाता था। सामान्यतः पंद्रह से बीस बैलों को एक साथ बाँधकर उस स्थान पर चलाया जाता था जहाँ धान बिछाया गया होता था। जिस समतल भूमि पर धान फैलाकर रखा जाता था, उसे स्थानीय मराठी भाषा में “खरा” कहा जाता था। और बंधे हुए बैलों के समूह को स्थानिक मराठी भाषा में "दावन" कहा जाता था।
यह प्रक्रिया कितने दिनों तक चलेगी, यह इस बात पर निर्भर करता था कि खेत में धान की कितनी गंजियाँ एकत्रित हुई हैं। कई बार यह कार्य अनेक दिनों तक चलता था और गाँव के कई लोग उसमें सहभागी होते थे। इस प्रक्रिया में सम्मिलित लोगों को उनकी मजदूरी धान के रूप में ही दी जाती थी।
धान पूरी तरह घास से अलग हो जाने के बाद “पोली” लगाने की परंपरा होती थी। पोली हमारे गाँव की एक अत्यंत आत्मीय और मानवीय परंपरा थी। गाँव के गरीब लोग, विशेषकर बच्चे, उस खरा के चारों ओर बैठ जाते थे जहाँ चूरने की प्रक्रिया सम्पन्न हुई होती थी। इसके बाद खेत का मालिक अपनी सामर्थ्य और उदारता के अनुसार सबको थोड़ा-थोड़ा धान भेंट करता था।
चूरने के बाद धान को बड़े-बड़े बोरों में भरा जाता था। इन बोरों को "गोना" कहते थे। पेरकी समाज के लोग गोनें बनाने का काम परंपरागत रूप से करते थे। हालाँकि हमारे गांव में पेरकी समाज नहीं था। हमें दूसरे गांवों से गोनें खरीद कर लाना पड़ता था। केवल एक ही गोना एक बैलगाड़ी पर रहता था। इस गोने को बैलगाड़ी पर इस प्रकार रखा जाता था कि धान को सुरक्षित रूप से घर तक पहुँचाया जा सके। चूरने की पूरी प्रक्रिया में अनेक लोग श्रम करते थे और प्रत्येक व्यक्ति को उसके कार्य के अनुसार उचित पारिश्रमिक भी प्राप्त होता था। इस प्रकार कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं थी; वह सहयोग, सहभागिता और सामुदायिक जीवन का जीवंत उदाहरण थी।
किन्तु चूरने का कार्य भी सीधे आरम्भ नहीं किया जाता था। उससे पहले एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामुदायिक अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता था, जिसे “आम्सताम” कहा जाता था।
आम्सताम : फसल, पशुधन और ग्राम-सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना
आम्सताम हमारे गाँव के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन था। इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष हमारे गाँव के समीप बहने वाली पामूल गौतम नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी का वह शांत किनारा उस दिन श्रद्धा, उत्साह और सामुदायिक भावना का केंद्र बन जाता था।
वहाँ ग्राम-देवताओं और गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती थी। बकरे और सूअर की बलि अर्पित की जाती थी और सामूहिक रूप से यह प्रार्थना की जाती थी कि खेतों में बोई गई फसल सुरक्षित रहे, उसे कोई रोग या कीट न लगे, और वर्ष भर गाँव समृद्ध बना रहे।
हमारे समाज में यह विश्वास था कि खेती केवल मनुष्य के श्रम से नहीं चलती; उसमें प्रकृति, ऋतुओं, जल, वन और अदृश्य दैवी शक्तियों का भी योगदान होता है। इसलिए उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक था।
विशेष रूप से गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली देवी को, जिन्हें हमारे क्षेत्र में माराई अथवा कुछ स्थानों पर मरी आई कहा जाता है, विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता था। उनसे प्रार्थना की जाती थी कि वे खेतों, पशुओं और पूरे गाँव को संकटों से सुरक्षित रखें।
मेरे बचपन में इन अनुष्ठानों का अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं आता था, किंतु आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि इनके माध्यम से हमारे पूर्वज प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते थे। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि जीवन के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति भी था।
मक्का जात्रा : आम के प्रथम स्वाद का उत्सव
इसी प्रकार हमारे समाज में मक्का जात्रा का भी विशेष महत्व था।
माड़िया भाषा में मक्का का अर्थ आम होता है। जिस प्रकार नई फसल को ग्रहण करने से पहले नवा पंडूम मनाया जाता था, उसी प्रकार आम के मौसम में पहली बार आम खाने से पहले मक्का जात्रा आयोजित की जाती थी।
आज के समय में यह बात साधारण लग सकती है, किंतु हमारे लिए यह प्रकृति के प्रति सम्मान का विषय था। कोई भी नई उपज सीधे उपभोग की वस्तु नहीं मानी जाती थी। पहले उसका स्वागत किया जाता था, उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती थी और फिर उसे ग्रहण किया जाता था।
इन परंपराओं ने हमें सिखाया कि प्रकृति केवल संसाधनों का भंडार नहीं है; वह जीवनदायिनी शक्ति है, जिसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता आवश्यक है।
हमारे कुल देवता और गोटूल की परंपरा
हमारे गाँव के कुल देवता भी अत्यंत विशिष्ट थे। वे किसी भव्य मंदिर या मूर्तियों में स्थापित नहीं थे। उनके प्रतीक साधारण पत्थर थे, किंतु हमारे लिए वे अत्यंत पूजनीय थे।
प्रत्येक तीन वर्षों में एक बार इन कुल देवताओं का पुनः आरोपण किया जाता था। यह अनुष्ठान गाँव के गोटूल में सम्पन्न होता था।
गोटूल हमारे समाज का केवल एक भवन नहीं था। वह हमारे सामुदायिक जीवन का केंद्र था। वहीं बैठकों का आयोजन होता था, वहीं महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, वहीं उत्सवों की योजनाएँ बनती थीं और वहीं हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती थीं।
कुल देवताओं की पुनः प्रतिष्ठा का यह अनुष्ठान रात्रि के समय सम्पन्न किया जाता था। इसकी एक विशेष बात यह थी कि उस समय गाँव की महिलाएँ और बच्चे गाँव के बाहर नदी किनारे चले जाते थे। केवल पुरुषों को ही इस अनुष्ठान में भाग लेने की अनुमति होती थी।
पूरी पुरुष मंडली गोटूल में एकत्रित होकर देर रात तक चलने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती थी। उस समय वातावरण अत्यंत गंभीर और रहस्यमय हो जाता था। जंगलों की निस्तब्धता, दूर बहती नदी की ध्वनि और गोटूल के भीतर चल रहे अनुष्ठानों की कल्पना मेरे बालमन को हमेशा रोमांचित करती थी।
माँ की गोद, नदी का किनारा और बचपन की स्मृतियाँ
इन अवसरों पर मैं भी अन्य बच्चों के साथ अपनी माँ के साथ नदी किनारे जाता था। रात धीरे-धीरे गहराती जाती थी। आकाश असंख्य तारों से भर जाता था और जंगल की शांति पूरे वातावरण को किसी लोककथा जैसा बना देती थी।
हम बच्चे खेलते-खेलते थक जाते और अंततः अपनी माताओं की गोद में ही सो जाते थे। मुझे आज भी याद है कि कई बार आधी नींद में दूर से आती आवाज़ें सुनाई देती थीं, लेकिन उनका अर्थ समझ में नहीं आता था।
जब गोटूल में पूजा सम्पन्न हो जाती थी, तब गाँव के पुरुष ऊँचे स्वर में सामूहिक उद्घोष करते थे। उनकी आवाज़ें रात के सन्नाटे को चीरती हुई नदी तक पहुँचती थीं। वह संकेत होता था कि अनुष्ठान समाप्त हो चुका है और अब महिलाएँ तथा बच्चे गाँव में लौट सकते हैं।
मेरी स्मृतियों में वह दृश्य आज भी उतना ही जीवंत है—रात का अंधकार, नदी का किनारा, माँ की गोद, और दूर से आती पुरुषों की सामूहिक आवाज़ें। बचपन में इन सबका अर्थ समझना संभव नहीं था, किंतु आज लगता है कि वे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे; वे हमारी सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक थे।
परंपराओं के भीतर छिपा जीवन-दर्शन
आज जब मैं इन परंपराओं को स्मरण करता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि उनमें केवल आस्था नहीं थी, बल्कि सामुदायिक अनुशासन, सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान भी निहित था।
गोटूल केवल एक भवन नहीं था; वह हमारे सामूहिक जीवन की आत्मा था।
वहीं हमारी परंपराएँ जीवित थीं।
वहीं हमारी स्मृतियाँ आकार लेती थीं।
वहीं हमारी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती थी।
और वहीं से हमें यह सीख मिलती थी कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने समुदाय, अपनी प्रकृति और अपनी परंपराओं के साथ मिलकर जीवन जीता है।
समय बदल गया है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन पामूल गौतम नदी के किनारे बिताई गई वे रातें, गोटूल की वह दुनिया और कुल देवताओं के प्रति लोगों की वह अटूट श्रद्धा आज भी मेरी स्मृतियों में उसी प्रकार सुरक्षित है, जैसे कल की ही बात हो।
(क्रमशः)
कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे-स्मृतियों, परंपराओं और सामुदायिक जीवन का एक आत्मीय संस्मरण
भाग-१
जब भी मैं कुक्कमेटा के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे भीतर स्मृतियों का एक पूरा संसार जाग उठता है। भामरागढ़ के सुदूर वनों के बीच बसा यह छोटा-सा गाँव, जिसमें आज भी लगभग साठ घर हैं, केवल मेरा जन्मस्थान भर नहीं है; यह मेरे व्यक्तित्व, मेरी सांस्कृतिक चेतना और मेरे जीवन-दर्शन की आधारभूमि है। वर्षों बीत गए, जीवन मुझे गाँव से दूर ले गया, किंतु कुक्कमेटा आज भी मेरे भीतर उसी तरह जीवित है जैसे बचपन के दिनों में था।
कुक्कमेटा का नाम आते ही मेरे सामने मिट्टी की सोंधी गंध, जंगलों की हरियाली, पामूल गौतम नदी का कलकल प्रवाह, गोटूल के सामने का खुला मैदान, और उन लोगों के चेहरे उभर आते हैं जिनके साथ मेरा बचपन बीता। मेरे गाँव में जनजातीय और गैर-जनजातीय, दोनों समुदायों के लोग निवास करते थे। यद्यपि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमियाँ अलग थीं, फिर भी उनके बीच जो आत्मीयता, सहयोग और पारिवारिक संबंधों की भावना थी, वह आज भी मेरे लिए आश्चर्य और प्रेरणा का विषय है।
गाँव का जीवन केवल परिवारों तक सीमित नहीं था। पूरा गाँव ही एक विस्तृत परिवार की तरह था। सुख-दुःख, उत्सव और संकट—सब कुछ साझा था। शायद यही कारण था कि संसाधनों की कमी के बावजूद जीवन में संतोष और आत्मीयता की प्रचुरता थी।
तल्लिन पंडूम : धरती माता के प्रति कृतज्ञता का उत्सव
बरसात के मौसम के आगमन से पूर्व मनाया जाने वाला तल्लिन पंडूम मेरे बचपन की सबसे सशक्त स्मृतियों में से एक है। हमारी स्थानीय माड़िया भाषा में तल्लिन का अर्थ ‘माता’ और पंडूम का अर्थ ‘उत्सव’ होता है। इस प्रकार तल्लिन पंडूम धरती माता को समर्पित कृतज्ञता का पर्व है।
आज जब मैं इस उत्सव के बारे में सोचता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंधों की अभिव्यक्ति था। धरती को केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता मानने की जो दृष्टि हमारे समाज में थी, उसका सबसे सुंदर रूप तल्लिन पंडूम में दिखाई देता था।
इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष गाँव से दूर जंगल में नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी के तट पर अस्थायी चूल्हे बनाए जाते थे और सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया जाता था। उत्सव के लिए बकरे और सूअर की व्यवस्था पूरे गाँव की ओर से की जाती थी। इसके लिए आवश्यक धनराशि गाँव के सामूहिक कोष से आती थी, जिसमें नियमों का उल्लंघन करने वालों से प्राप्त दंड की राशि भी सम्मिलित होती थी। यदि वह पर्याप्त न होती, तो प्रत्येक परिवार अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था।
तल्लिन पंडूम के आयोजन में पेरमा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती थी। लगभग सात-आठ गाँवों के समूह का एक पेरमा होता था, जिसे मुख्य पुजारी माना जाता था। पेरमा सदैव जनजातीय समुदाय से ही होता था। उत्सव की तिथि भी उसकी उपलब्धता को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती थी। निश्चित तिथि पर गाँव के लोग स्वयं जाकर उसे आदरपूर्वक अपने साथ लेकर आते थे।
पूजा के दौरान पेरमा के साथ गाँव का भूमिया भी उपस्थित रहता था। भूमिया वह व्यक्ति होता था जिसे गाँव की भूमि तथा उससे जुड़े पारंपरिक अधिकारों का संरक्षक माना जाता था। पेरमा, भूमिया और समस्त ग्रामीण मिलकर धरती माता और ग्राम देवताओं की पूजा करते थे।
अनुष्ठान सम्पन्न होने के बाद सभी लोग सामूहिक रूप से मंगलकामनाएँ व्यक्त करते थे। उनके स्वर में गाँव की समृद्धि, भरपूर वर्षा, अच्छी फसल और पूरे समुदाय के कल्याण की कामना समाहित होती थी। आज भी उन सामूहिक प्रार्थनाओं की गूँज मेरी स्मृतियों में सुनाई देती है।
इसके बाद सामूहिक भोजन का आयोजन होता था। यद्यपि सभी लोग एक ही स्थान पर उपस्थित रहते थे, फिर भी प्रत्येक परिवार का अपना अलग चूल्हा होता था। परिवार का पुरुष सदस्य अपने परिवार के लिए भोजन स्वयं तैयार करता था। इस व्यवस्था में सामूहिकता और पारिवारिक स्वायत्तता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।
इस अवसर पर महुआ से निर्मित पारंपरिक मदिरा का सेवन भी किया जाता था। कभी-कभी कुछ लोग नशे के प्रभाव में आपस में विवाद कर बैठते थे, किंतु उन झगड़ों का प्रभाव केवल उसी दिन तक सीमित रहता था। अगले दिन सब कुछ सामान्य हो जाता था। किसी के मन में स्थायी वैर या कटुता नहीं रहती थी। आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि शायद संबंधों की गहराई ही ऐसी थी कि छोटी-छोटी कटुताएँ उसमें स्वतः विलीन हो जाती थीं।
महिलाओं का उत्सव और रेला नृत्य
तल्लिन पंडूम का एक रोचक पक्ष यह था कि जंगल में होने वाले मुख्य अनुष्ठान में केवल पुरुष भाग लेते थे। महिलाएँ गाँव में रहकर अपने ढंग से उत्सव मनाती थीं। उनके लिए भी गाँव की ओर से बकरे की व्यवस्था की जाती थी। वे अपने घरों में भोजन बनाती थीं और भोजन के उपरांत रेला नृत्य प्रस्तुत करती थीं।
रेला माड़िया समाज का अत्यंत लोकप्रिय लोकनृत्य है। इसकी लय, सामूहिकता और सहजता पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती थी। मेरे बचपन की स्मृतियों में रेला के गीतों और नृत्य की छवियाँ आज भी जीवित हैं।
जब पुरुषों की टोली जंगल से लौटती थी, तब गाँव की महिलाएँ एक लंबी और मजबूत रस्सी बाँधकर उनका मार्ग रोक लेती थीं। पुरुषों को गाँव में प्रवेश तभी मिलता था, जब वे महिलाओं को कुछ उपहार या बख्शीश देते थे। यह परंपरा हँसी-मज़ाक, आत्मीयता और सामुदायिक सौहार्द से भरपूर होती थी। पूरे गाँव में उत्सव का वातावरण छा जाता था।
नवा पंडूम : नई उपज के स्वागत का पर्व
तल्लिन पंडूम के सम्पन्न होते ही हमारे गाँवों में उत्सवों का एक नया क्रम आरंभ हो जाता था। इन्हीं उत्सवों में सबसे पहले आता था नवा पंडूम।
हमारे घरों के आसपास थोड़ी-सी भूमि होती थी, जिसमें परिवार की आवश्यकता के लिए विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाई जाती थीं। अम्बाड़ी, लोबिया, सेम, ककड़ी, दूधी और अनेक अन्य मौसमी सब्जियाँ हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं।
जब ये फसलें तैयार हो जाती थीं, तब भी उनका सेवन तुरंत नहीं किया जाता था। पहले नवा पंडूम का आयोजन होता था। इस उत्सव के पश्चात ही नई उपज को खाने की अनुमति होती थी। यदि कोई व्यक्ति उससे पहले नई उपज का सेवन करता, तो उस पर गाँव की ओर से दंड लगाया जाता था।
इस परंपरा के पीछे केवल सामाजिक अनुशासन नहीं था, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा भी थी। नई उपज को धरती माता का आशीर्वाद माना जाता था और उसे ग्रहण करने से पहले कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक समझा जाता था।
पिंडी पंडूम : धान और जीवन का उत्सव
नवा पंडूम के बाद आता था पिंडी पंडूम, जो हमारे कृषि जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
हमारे गाँवों में मुख्यतः धान की खेती होती थी और वह भी केवल जीवन-निर्वाह के लिए। उस समय गाँवों में कृषि को व्यवसाय के रूप में नहीं देखा जाता था। हमारे क्षेत्र के गाँव इतने दूरस्थ और भौगोलिक रूप से पृथक थे कि व्यापार और बाजार की अवधारणाएँ वहाँ तक पहुँची ही नहीं थीं।
मेरे बचपन के दिनों में सरकारी व्यवस्था भी लगभग अनुपस्थित थी। गाँव में केवल तीसरी कक्षा तक का एक छोटा-सा विद्यालय था, जिसमें एक ही शिक्षक सभी कक्षाओं को पढ़ाते थे। संसाधन सीमित थे, लेकिन जीवन अपनी स्वाभाविक लय में चलता था।
जब धान पककर भोजन के योग्य हो जाता था, तब पिंडी पंडूम का आयोजन किया जाता था। प्रत्येक परिवार का अपना पारंपरिक पुजारी होता था और उसका माड़िया समुदाय से होना आवश्यक माना जाता था।
हमारे परिवार के पुजारी थे चैतु विडपी। वे हमारे परिवार के लिए केवल पुजारी नहीं थे, बल्कि एक सम्मानित बुज़ुर्ग भी थे। उनकी अगुवाई में पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद ही धान की कटाई आरंभ होती थी।
बचपन में मैं अनेक बार उनकी पूजा में उपस्थित रहा, किंतु आज भी मुझे यह ज्ञात नहीं कि वे कौन-से मंत्रों का उच्चारण करते थे। संभवतः वे प्रकृति, धरती और ग्राम देवताओं का स्मरण करते होंगे। लेकिन इतना निश्चित है कि उनकी प्रार्थनाओं में अच्छी फसल, समृद्धि और पूरे गाँव के कल्याण की कामना अवश्य होती थी।
नवा पंडूम और पिंडी पंडूम दोनों ही नई उपज के स्वागत के उत्सव थे। इनके माध्यम से हम प्रकृति, धरती माता और अपने देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते थे। हमारे लिए भोजन केवल जीविका का साधन नहीं था; वह प्रकृति का प्रसाद था।
इसी कारण हमारे त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे। वे प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध, सामुदायिक जीवन की एकता और परंपराओं के प्रति सम्मान के जीवंत प्रतीक थे।
(क्रमशः)
Friday, 8 May 2026
अबूझमाड़ में जीवन और आजीविका : पारिस्थितिकी और सामाजिक संरचना
यद्यपि “अबूझमाड़” शब्द ने हाल के दशकों में प्रशासनिक तथा अकादमिक प्रचलन प्राप्त कर लिया है, तथापि यह सम्भावना कम है कि यह स्थानीय समुदायों द्वारा प्रयुक्त मूल अथवा ऐतिहासिक नाम रहा हो। नृवंशविज्ञान (एथनोग्राफी) संबंधी साक्ष्य तथा मौखिक परंपराएँ संकेत करती हैं कि इस क्षेत्र को लंबे समय से पड़ोसी जनजातीय समाजों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता रहा है, जो यहाँ की बसावट, आजीविका और सामाजिक विभेदों को प्रतिबिंबित करते हैं। बस्तर के मैदानी अथवा अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में निवास करने वाले माड़िया (मारिया) समुदायों के बीच वर्तमान अबूझमाड़ से संबद्ध घने वनाच्छादित और पहाड़ी आंतरिक क्षेत्र को प्रायः “माड़ेम” कहा जाता है। स्थानीय प्रयोग में “माड़ेम” किसी औपचारिक रूप से सीमांकित भौगोलिक इकाई को नहीं, बल्कि ऐसे भू-भाग को सूचित करता है जहाँ मुख्यतः माड़िया लोग निवास करते हैं। अबूझमाड़ के आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त मौखिक विवरण इस शब्द को “माड़ियाओं की भूमि” के रूप में व्याख्यायित करते है। इस प्रकार यह एक जातीय-भौगोलिक सूचक (ethno-territorial descriptor) के रूप में कार्य करता है, न कि किसी मानचित्रगत (cartographic) संज्ञा के रूप में।
लोकप्रिय तथा कभी-कभी प्रशासनिक विमर्श में इस आंतरिक क्षेत्र के निवासियों को “बड़ा माड़िया” भी कहा जाता है। शाब्दिक रूप से इसका अर्थ “बड़ा” अथवा “महान” माड़िया होता है, किंतु यह सम्बोधन प्रायः अपमानजनक भी माना जाता है। इसलिए अकादमिक उपयोग में इसके प्रति सावधानी अपेक्षित है। यह शब्द वस्तुनिष्ठ नृवंशीय (ethnographic) भिन्नता की अपेक्षा असमान शक्ति-संबंधों और सांस्कृतिक धारणाओं को अधिक प्रतिबिंबित करता है। प्रारम्भिक मानवशास्त्रीय लेखन, विशेषकर वेरियर एल्विन के अध्ययनों में, जनजातीय समूहों को उनके पारिस्थितिक क्षेत्रों तथा आजीविका पद्धतियों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया। एल्विन और अन्य विद्वानों ने वनाच्छादित पहाड़ियों में रहने वाले समुदायों और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच भेद स्थापित करते हुए उन्हें क्रमशः “हिल मारिया” और “बाइसन-हॉर्न मारिया” कहा। यद्यपि इन श्रेणियों का उद्देश्य वर्णनात्मक प्रकारिकी (descriptive typologies) प्रस्तुत करना था। बाद के अध्ययनों ने यह रेखांकित किया कि ऐसी वर्गीकरण प्रणालियाँ प्रायः पारिस्थितिक अंतरों को कठोर सामाजिक श्रेणियों में रूपांतरित कर देती थीं।
गहन परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि अबूझमाड़ क्षेत्र की पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में निवास करने वाले मारिया (माड़िया) और मुरिया समुदाय मूलतः एक ही व्यापक जातीय-भाषाई (ethnolinguistic group) समूह का हिस्सा हैं, जिनमें दिखाई देने वाले अंतर मुख्यतः भौगोलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक पृथकता तथा बाहरी प्रभावों के असमान संपर्क के परिणाम हैं। इन समूहों को सामान्यतः व्यापक गोंड जनजातीय समूह की उप-श्रेणियों के रूप में समझा जाता है, जिनमें भाषाई, सांस्कृतिक और अनुष्ठानिक समानताएँ विद्यमान हैं। तथापि, यह स्वीकार करना भी समान रूप से आवश्यक है कि गोंड सामाजिक संरचना के भीतर आंतरिक पदानुक्रम भी मौजूद रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से गोंड शासक वंशों ने बस्तर और उससे लगे क्षेत्रों के बड़े हिस्सों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया था, किंतु उन्होंने माड़ियाओं को सामाजिक समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं किया। नृवंशविज्ञानिक तथा ऐतिहासिक विवरण संकेत करते हैं कि उच्च गोंड समूहों में कठोर अंतर्विवाह प्रथा विद्यमान थी तथा गोंड अभिजात वर्ग माड़िया समुदायों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने से परहेज़ करता था। यह प्रवृत्ति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि गोंड पहचान कभी भी पूर्णतः सामाजिक रूप से समरूप नहीं रही और जिस “जनजातीय” श्रेणी को बाहरी दृष्टि से अक्सर एकरूप माना जाता है, उसके भीतर भी स्तरीकरण विद्यमान था।
माड़िया जनसंख्या केवल अबूझमाड़ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। माड़िया समुदाय पूरे बस्तर क्षेत्र में व्यापक रूप से फैले हुए हैं तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले तक विस्तृत हैं। अबूझमाड़ के माड़ियाओं को सामान्यतः अबूझमाड़िया कहा जाता है। इनको अन्य क्षेत्रों के माड़ियाओं से जो बात अलग करती है, वह उनकी जातीय उत्पत्ति नहीं, बल्कि उनका ऐतिहासिक पृथक्करण है। क्षेत्र के घने जंगलों, दुर्गम भू-आकृति और लंबे प्रशासनिक उपेक्षा काल के कारण अबूझमाड़ लंबे समय तक गैर-जनजातीय समाज के सतत संपर्क से लगभग पृथक बना रहा। परिणामस्वरूप, मैदानी और अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में रहने वाले माड़िया समुदाय पड़ोसी गाँवों, बाजारों और नगरीय केंद्रों के नियमित संपर्क में आए तथा धीरे-धीरे बाहरी सांस्कृतिक व्यवहारों, भौतिक रूपों और सामाजिक संस्थाओं के कुछ तत्वों को अपनाने लगे। इसके विपरीत, अबूझमाड़ के आंतरिक भागों में रहने वाले अबूझमाड़िया समुदायों ने अपनी सामाजिक संस्थाओं, अनुष्ठानिक परंपराओं और निर्वाह पद्धतियों को अपेक्षाकृत सीमित बाहरी प्रभावों के साथ संरक्षित रखा। अतः इस विभेदन को पृथक जनजातीय पहचान के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि असमान ऐतिहासिक संपर्क और भौगोलिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप समझा जाना चाहिए।
अबूझमाड़ के आंतरिक क्षेत्र में निवास करने वाले समुदाय मुख्यतः कृषक हैं और वे वनाच्छादित तथा पहाड़ी भूभाग में फैली छोटी तथा विरल आबादी वाली बस्तियों में रहते हैं। गाँवों का आकार सीमित बना रहता है, जो एक ओर पारिस्थितिक सीमाओं को और दूसरी ओर बाज़ारोन्मुख कृषि के स्थान पर निर्वाह-आधारित उत्पादन प्रणालियों पर उनकी निरंतर निर्भरता को दर्शाता है। अबूझमाड़िया जनजातियाँ आज भी स्थानांतरण कृषि (झूम अथवा पोडू कृषि) पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार का कृषि जीवन विशेषकर पहाड़ियों की ढलानों पर निवास करने वाले इस समुदाय के लोग करते हैं। यह कृषि पद्धति, जो नाजुक ऊपरी पारिस्थितिक (fragile upland ecosystems) तंत्रों के अनुकूल विकसित हुई है, वन क्षेत्रों की चक्रीय सफाई और पुनरुत्पादन (cyclical clearing and regeneration of forest patches) पर आधारित है तथा स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान (local ecological knowledge) से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। विकासवादी विमर्शों में यद्यपि इसे प्रायः “आदिम” कृषि कहा जाता है, किंतु अबूझमाड़ में यह एक ऐतिहासिक रूप से विकसित आजीविका रणनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जो निर्वाह की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करती है।
अबूझमाड़िया समुदायों की खाद्य आदतें पारिस्थितिक उपलब्धता (ecological availability) तथा निर्वाहगत सीमाओं (subsistence constraints) दोनों को प्रतिबिंबित करती हैं। दैनिक भोजन सामान्यतः तीन साधारण आहारों तक सीमित रहता है, जिनमें मुख्यतः मोटे अनाज और वन उत्पाद सम्मिलित होते हैं। प्रातःकालीन भोजन सामान्यतः रागी (एल्यूसाइन कोरकाना) से निर्मित पतले माड़ अथवा पेय के रूप में होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर “पेज” कहा जाता है। मध्याह्न भोजन भी लगभग इसी प्रकार का होता है और उसमें प्रायः उबले हुए महुआ (मधुका इंडिका) को सम्मिलित किया जाता है, जो पोषण और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण वन उत्पाद है। रात्रिकालीन भोजन में सामान्यतः रागी अथवा मोटा चावल सम्मिलित होता है, जिसे प्रायः नमक और अत्यंत सीमित सहायक खाद्य पदार्थों के साथ ग्रहण किया जाता है। पशु-आधारित प्रोटीन का सेवन सीमित मात्रा में होता है और वह मुख्यतः अनुष्ठानों तथा उत्सवों तक सीमित रहता है। चिकन सबसे सामान्य रूप से खाया जाने वाला मांस है। मांस का नियमित उपभोग केवल व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक मानदंडों से भी नियंत्रित होता है।
भौतिक सादगी के बावजूद अबूझमाड़िया समुदाय अत्यंत समृद्ध मौखिक परंपरा (vibrant oral tradition) के धारक हैं। लोककथाएँ (Folklore), मिथक (myths), अनुष्ठानिक आख्यान (ritual narratives), गीत और ऐतिहासिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती हैं। यह विधाएँ सामूहिक पहचान, नैतिक मूल्यों, पारिस्थितिक ज्ञान तथा सामाजिक मान्यताओं के संरक्षण का प्रमुख माध्यम बानी हैं। लिखित परंपरा के अभाव में मौखिक संस्कृति न केवल इतिहास के भंडार के रूप में कार्य करती है, बल्कि सामुदायिक एकता की संरचना के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
स्वतंत्रता के पश्चात अबूझमाड़ क्षेत्र में शासन-प्रशासन केवल भौगोलिक दुर्गमता से ही नहीं, बल्कि विशिष्ट नीतिगत विकल्पों (deliberate policy choices) और प्रशासनिक दृष्टिकोणों (administrative philosophies) से भी प्रभावित हुआ। कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों, विशेषकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व अधिकारी और बस्तर के जिला कलेक्टर रहे बी. डी. शर्मा की भूमिका ने राज्य और अबूझमाड़ के संबंधों को आकार देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। शर्मा ने निरंतर इस क्षेत्र के प्रति गैर-हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण का समर्थन किया और यह तर्क दिया कि आदिवासी समुदायों को राज्यीय हस्तक्षेप तथा बाहरी शोषण से बचाया जाना चाहिए। यद्यपि यह दृष्टिकोण जनजातीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण की चिंता पर आधारित था, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इसका परिणाम प्रशासनिक अनुपस्थिति के दीर्घीकरण के रूप में सामने आया। संतुलित राज्यीय हस्तक्षेप के अभाव में अबूझमाड़ नियमित शासन-व्यवस्थाओं, जैसे राजस्व प्रशासन, सार्वजनिक सेवा वितरण और संस्थागत निगरानी, के दायरे से काफी हद तक बाहर बना रहा। समय के साथ, जब गैर-हस्तक्षेपवादी नीति के साथ सहभागी शासन की वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित नहीं की गईं, तब इसने अबूझमाड़िया समुदायों की निरंतर पृथकता को और गहरा किया।
ऐतिहासिक अभिलेख संकेत करते हैं कि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में अबूझमाड़ क्षेत्र का कम-से-कम आंशिक मानचित्रण (partially mapped) और सर्वेक्षण किया गया था, जो सीमित और संसाधन-उन्मुख प्रशासनिक रुचि (limited and extractive in nature) को दर्शाता है। किंतु स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक अथवा विकासोन्मुख प्रशासन का समान विस्तार नहीं हुआ। इसके विपरीत, अबूझमाड़ उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के भीतर एक परिधीय क्षेत्र (marginal space within the post-colonial state) के रूप में बना रहा, जहाँ आंतरिक भागों में कोई पूर्णतः कार्यशील अथवा स्थायी प्रशासनिक ढाँचा विकसित नहीं हो सका। शासन के इस दीर्घकालिक रिक्त स्थान ने क्षेत्र को माओवादी उग्रवादी समूहों के लिए विशेष रूप से अनुकूल बना दिया, जिन्होंने अबूझमाड़ को “सुरक्षित आश्रय” (“safe haven”) अथवा “मुक्त क्षेत्र” (“liberated zone”) के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। घने जंगल, कठिन भूभाग और न्यूनतम राज्यीय उपस्थिति ने उग्रवादी समूहों को अपेक्षाकृत स्वतंत्र संचालन की सुविधा प्रदान की, जिसके माध्यम से उन्होंने इस क्षेत्र का उपयोग संगठन, प्रशिक्षण और रसद समन्वय के लिए किया। समय के साथ माओवादी प्रभाव ने नागरिक प्रशासन की संभावनाओं को और जटिल बना दिया, जिससे एक ऐसा चक्र निर्मित हुआ जिसमें असुरक्षा ने राज्यीय अनुपस्थिति को उचित ठहराया और अनुपस्थिति ने उग्रवादी जड़ों को और गहरा किया।
प्रशासनिक उपेक्षा के दीर्घकालिक परिणाम अबूझमाड़िया समुदायों के दैनिक जीवन में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वर्तमान समय में भी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच अत्यंत सीमित बनी हुई है। आंतरिक गाँवों के निवासियों को नमक, खाद्य तेल, वस्त्र तथा घरेलू उपयोग की अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए निकटतम साप्ताहिक हाटों तक पहुँचने हेतु प्रायः 20–25 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। ये यात्राएँ अधिकांशतः घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर की जाती हैं तथा मौसमी परिस्थितियों और गाँव की स्थिति के अनुसार दो से चार दिनों तक भी चल सकती हैं। आधारभूत अवसंरचना (Basic infrastructure) अत्यंत अपर्याप्त है। सुरक्षित पेयजल की विश्वसनीय व्यवस्था लगभग अनुपस्थित है, जिसके कारण समुदायों को मौसमी जलधाराओं (seasonal streams), वन स्रोतों अथवा अत्यंत साधारण कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक पहुँच भी सीमित अथवा अनियमित बनी हुई है, जिससे दीर्घकालिक असुरक्षा और वंचना की स्थितियाँ लगातार पुनरुत्पादित होती रहती हैं।
वंचना की यह स्थिति क्षेत्र की समृद्ध प्राकृतिक संपदाओं जैसे घने वनों और विविध वन-आधारित संसाधनों आदि के साथ तीव्र विरोधाभास प्रस्तुत करती है। इन संसाधनों का लाभ स्थानीय समुदायों के जीवन-स्तर में सुधार के रूप में परिवर्तित नहीं हो सका है। इसके विपरीत, कठोर वन व्यवस्थाओं, बाज़ार तक सीमित पहुँच तथा कमजोर संस्थागत समर्थन के कारण संसाधन-संपन्नता और स्थायी निर्धनता साथ-साथ विद्यमान हैं। परिणामस्वरूप, अबूझमाड़िया समुदायों का भौतिक जीवन आज भी कठिनाइयों, असुरक्षा और अनिश्चितताओं से चिह्नित है। यह विरोधाभास की जहाँ पारिस्थितिक समृद्धि के साथ मानवीय अभाव सह-अस्तित्व में हैं, अबूझमाड़ में संरचनात्मक हाशियाकरण की प्रकृति को रेखांकित करता है तथा ऐसे शासन-मॉडलों की तात्कालिक आवश्यकता को उजागर करता है जो अधिकार-सुरक्षा, विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित हों।






