यद्यपि “अबूझमाड़” शब्द ने हाल के दशकों में प्रशासनिक तथा अकादमिक प्रचलन प्राप्त कर लिया है, तथापि यह सम्भावना कम है कि यह स्थानीय समुदायों द्वारा प्रयुक्त मूल अथवा ऐतिहासिक नाम रहा हो। नृवंशविज्ञान (एथनोग्राफी) संबंधी साक्ष्य तथा मौखिक परंपराएँ संकेत करती हैं कि इस क्षेत्र को लंबे समय से पड़ोसी जनजातीय समाजों में भिन्न-भिन्न नामों से जाना जाता रहा है, जो यहाँ की बसावट, आजीविका और सामाजिक विभेदों को प्रतिबिंबित करते हैं। बस्तर के मैदानी अथवा अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में निवास करने वाले माड़िया (मारिया) समुदायों के बीच वर्तमान अबूझमाड़ से संबद्ध घने वनाच्छादित और पहाड़ी आंतरिक क्षेत्र को प्रायः “माड़ेम” कहा जाता है। स्थानीय प्रयोग में “माड़ेम” किसी औपचारिक रूप से सीमांकित भौगोलिक इकाई को नहीं, बल्कि ऐसे भू-भाग को सूचित करता है जहाँ मुख्यतः माड़िया लोग निवास करते हैं। अबूझमाड़ के आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त मौखिक विवरण इस शब्द को “माड़ियाओं की भूमि” के रूप में व्याख्यायित करते है। इस प्रकार यह एक जातीय-भौगोलिक सूचक (ethno-territorial descriptor) के रूप में कार्य करता है, न कि किसी मानचित्रगत (cartographic) संज्ञा के रूप में।
लोकप्रिय तथा कभी-कभी प्रशासनिक विमर्श में इस आंतरिक क्षेत्र के निवासियों को “बड़ा माड़िया” भी कहा जाता है। शाब्दिक रूप से इसका अर्थ “बड़ा” अथवा “महान” माड़िया होता है, किंतु यह सम्बोधन प्रायः अपमानजनक भी माना जाता है। इसलिए अकादमिक उपयोग में इसके प्रति सावधानी अपेक्षित है। यह शब्द वस्तुनिष्ठ नृवंशीय (ethnographic) भिन्नता की अपेक्षा असमान शक्ति-संबंधों और सांस्कृतिक धारणाओं को अधिक प्रतिबिंबित करता है। प्रारम्भिक मानवशास्त्रीय लेखन, विशेषकर वेरियर एल्विन के अध्ययनों में, जनजातीय समूहों को उनके पारिस्थितिक क्षेत्रों तथा आजीविका पद्धतियों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया। एल्विन और अन्य विद्वानों ने वनाच्छादित पहाड़ियों में रहने वाले समुदायों और मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के बीच भेद स्थापित करते हुए उन्हें क्रमशः “हिल मारिया” और “बाइसन-हॉर्न मारिया” कहा। यद्यपि इन श्रेणियों का उद्देश्य वर्णनात्मक प्रकारिकी (descriptive typologies) प्रस्तुत करना था। बाद के अध्ययनों ने यह रेखांकित किया कि ऐसी वर्गीकरण प्रणालियाँ प्रायः पारिस्थितिक अंतरों को कठोर सामाजिक श्रेणियों में रूपांतरित कर देती थीं।
गहन परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि अबूझमाड़ क्षेत्र की पहाड़ियों और मैदानी इलाकों में निवास करने वाले मारिया (माड़िया) और मुरिया समुदाय मूलतः एक ही व्यापक जातीय-भाषाई (ethnolinguistic group) समूह का हिस्सा हैं, जिनमें दिखाई देने वाले अंतर मुख्यतः भौगोलिक परिस्थितियों, ऐतिहासिक पृथकता तथा बाहरी प्रभावों के असमान संपर्क के परिणाम हैं। इन समूहों को सामान्यतः व्यापक गोंड जनजातीय समूह की उप-श्रेणियों के रूप में समझा जाता है, जिनमें भाषाई, सांस्कृतिक और अनुष्ठानिक समानताएँ विद्यमान हैं। तथापि, यह स्वीकार करना भी समान रूप से आवश्यक है कि गोंड सामाजिक संरचना के भीतर आंतरिक पदानुक्रम भी मौजूद रहे हैं।
ऐतिहासिक रूप से गोंड शासक वंशों ने बस्तर और उससे लगे क्षेत्रों के बड़े हिस्सों पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया था, किंतु उन्होंने माड़ियाओं को सामाजिक समानता के स्तर पर स्वीकार नहीं किया। नृवंशविज्ञानिक तथा ऐतिहासिक विवरण संकेत करते हैं कि उच्च गोंड समूहों में कठोर अंतर्विवाह प्रथा विद्यमान थी तथा गोंड अभिजात वर्ग माड़िया समुदायों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने से परहेज़ करता था। यह प्रवृत्ति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि गोंड पहचान कभी भी पूर्णतः सामाजिक रूप से समरूप नहीं रही और जिस “जनजातीय” श्रेणी को बाहरी दृष्टि से अक्सर एकरूप माना जाता है, उसके भीतर भी स्तरीकरण विद्यमान था।
माड़िया जनसंख्या केवल अबूझमाड़ क्षेत्र तक सीमित नहीं है। माड़िया समुदाय पूरे बस्तर क्षेत्र में व्यापक रूप से फैले हुए हैं तथा महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले तक विस्तृत हैं। अबूझमाड़ के माड़ियाओं को सामान्यतः अबूझमाड़िया कहा जाता है। इनको अन्य क्षेत्रों के माड़ियाओं से जो बात अलग करती है, वह उनकी जातीय उत्पत्ति नहीं, बल्कि उनका ऐतिहासिक पृथक्करण है। क्षेत्र के घने जंगलों, दुर्गम भू-आकृति और लंबे प्रशासनिक उपेक्षा काल के कारण अबूझमाड़ लंबे समय तक गैर-जनजातीय समाज के सतत संपर्क से लगभग पृथक बना रहा। परिणामस्वरूप, मैदानी और अपेक्षाकृत सुलभ क्षेत्रों में रहने वाले माड़िया समुदाय पड़ोसी गाँवों, बाजारों और नगरीय केंद्रों के नियमित संपर्क में आए तथा धीरे-धीरे बाहरी सांस्कृतिक व्यवहारों, भौतिक रूपों और सामाजिक संस्थाओं के कुछ तत्वों को अपनाने लगे। इसके विपरीत, अबूझमाड़ के आंतरिक भागों में रहने वाले अबूझमाड़िया समुदायों ने अपनी सामाजिक संस्थाओं, अनुष्ठानिक परंपराओं और निर्वाह पद्धतियों को अपेक्षाकृत सीमित बाहरी प्रभावों के साथ संरक्षित रखा। अतः इस विभेदन को पृथक जनजातीय पहचान के प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि असमान ऐतिहासिक संपर्क और भौगोलिक परिस्थितियों के परिणामस्वरूप समझा जाना चाहिए।
अबूझमाड़ के आंतरिक क्षेत्र में निवास करने वाले समुदाय मुख्यतः कृषक हैं और वे वनाच्छादित तथा पहाड़ी भूभाग में फैली छोटी तथा विरल आबादी वाली बस्तियों में रहते हैं। गाँवों का आकार सीमित बना रहता है, जो एक ओर पारिस्थितिक सीमाओं को और दूसरी ओर बाज़ारोन्मुख कृषि के स्थान पर निर्वाह-आधारित उत्पादन प्रणालियों पर उनकी निरंतर निर्भरता को दर्शाता है। अबूझमाड़िया जनजातियाँ आज भी स्थानांतरण कृषि (झूम अथवा पोडू कृषि) पर निर्भर करती हैं। इस प्रकार का कृषि जीवन विशेषकर पहाड़ियों की ढलानों पर निवास करने वाले इस समुदाय के लोग करते हैं। यह कृषि पद्धति, जो नाजुक ऊपरी पारिस्थितिक (fragile upland ecosystems) तंत्रों के अनुकूल विकसित हुई है, वन क्षेत्रों की चक्रीय सफाई और पुनरुत्पादन (cyclical clearing and regeneration of forest patches) पर आधारित है तथा स्थानीय पारिस्थितिक ज्ञान (local ecological knowledge) से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई है। विकासवादी विमर्शों में यद्यपि इसे प्रायः “आदिम” कृषि कहा जाता है, किंतु अबूझमाड़ में यह एक ऐतिहासिक रूप से विकसित आजीविका रणनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जो निर्वाह की आवश्यकताओं और पर्यावरणीय सीमाओं के बीच संतुलन स्थापित करती है।
अबूझमाड़िया समुदायों की खाद्य आदतें पारिस्थितिक उपलब्धता (ecological availability) तथा निर्वाहगत सीमाओं (subsistence constraints) दोनों को प्रतिबिंबित करती हैं। दैनिक भोजन सामान्यतः तीन साधारण आहारों तक सीमित रहता है, जिनमें मुख्यतः मोटे अनाज और वन उत्पाद सम्मिलित होते हैं। प्रातःकालीन भोजन सामान्यतः रागी (एल्यूसाइन कोरकाना) से निर्मित पतले माड़ अथवा पेय के रूप में होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर “पेज” कहा जाता है। मध्याह्न भोजन भी लगभग इसी प्रकार का होता है और उसमें प्रायः उबले हुए महुआ (मधुका इंडिका) को सम्मिलित किया जाता है, जो पोषण और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण वन उत्पाद है। रात्रिकालीन भोजन में सामान्यतः रागी अथवा मोटा चावल सम्मिलित होता है, जिसे प्रायः नमक और अत्यंत सीमित सहायक खाद्य पदार्थों के साथ ग्रहण किया जाता है। पशु-आधारित प्रोटीन का सेवन सीमित मात्रा में होता है और वह मुख्यतः अनुष्ठानों तथा उत्सवों तक सीमित रहता है। चिकन सबसे सामान्य रूप से खाया जाने वाला मांस है। मांस का नियमित उपभोग केवल व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि आर्थिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक मानदंडों से भी नियंत्रित होता है।
भौतिक सादगी के बावजूद अबूझमाड़िया समुदाय अत्यंत समृद्ध मौखिक परंपरा (vibrant oral tradition) के धारक हैं। लोककथाएँ (Folklore), मिथक (myths), अनुष्ठानिक आख्यान (ritual narratives), गीत और ऐतिहासिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती हैं। यह विधाएँ सामूहिक पहचान, नैतिक मूल्यों, पारिस्थितिक ज्ञान तथा सामाजिक मान्यताओं के संरक्षण का प्रमुख माध्यम बानी हैं। लिखित परंपरा के अभाव में मौखिक संस्कृति न केवल इतिहास के भंडार के रूप में कार्य करती है, बल्कि सामुदायिक एकता की संरचना के रूप में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
स्वतंत्रता के पश्चात अबूझमाड़ क्षेत्र में शासन-प्रशासन केवल भौगोलिक दुर्गमता से ही नहीं, बल्कि विशिष्ट नीतिगत विकल्पों (deliberate policy choices) और प्रशासनिक दृष्टिकोणों (administrative philosophies) से भी प्रभावित हुआ। कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों, विशेषकर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व अधिकारी और बस्तर के जिला कलेक्टर रहे बी. डी. शर्मा की भूमिका ने राज्य और अबूझमाड़ के संबंधों को आकार देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। शर्मा ने निरंतर इस क्षेत्र के प्रति गैर-हस्तक्षेपवादी दृष्टिकोण का समर्थन किया और यह तर्क दिया कि आदिवासी समुदायों को राज्यीय हस्तक्षेप तथा बाहरी शोषण से बचाया जाना चाहिए। यद्यपि यह दृष्टिकोण जनजातीय स्वायत्तता और सांस्कृतिक संरक्षण की चिंता पर आधारित था, किंतु व्यवहारिक स्तर पर इसका परिणाम प्रशासनिक अनुपस्थिति के दीर्घीकरण के रूप में सामने आया। संतुलित राज्यीय हस्तक्षेप के अभाव में अबूझमाड़ नियमित शासन-व्यवस्थाओं, जैसे राजस्व प्रशासन, सार्वजनिक सेवा वितरण और संस्थागत निगरानी, के दायरे से काफी हद तक बाहर बना रहा। समय के साथ, जब गैर-हस्तक्षेपवादी नीति के साथ सहभागी शासन की वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित नहीं की गईं, तब इसने अबूझमाड़िया समुदायों की निरंतर पृथकता को और गहरा किया।
ऐतिहासिक अभिलेख संकेत करते हैं कि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में अबूझमाड़ क्षेत्र का कम-से-कम आंशिक मानचित्रण (partially mapped) और सर्वेक्षण किया गया था, जो सीमित और संसाधन-उन्मुख प्रशासनिक रुचि (limited and extractive in nature) को दर्शाता है। किंतु स्वतंत्रता के बाद इस क्षेत्र में लोकतांत्रिक अथवा विकासोन्मुख प्रशासन का समान विस्तार नहीं हुआ। इसके विपरीत, अबूझमाड़ उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के भीतर एक परिधीय क्षेत्र (marginal space within the post-colonial state) के रूप में बना रहा, जहाँ आंतरिक भागों में कोई पूर्णतः कार्यशील अथवा स्थायी प्रशासनिक ढाँचा विकसित नहीं हो सका। शासन के इस दीर्घकालिक रिक्त स्थान ने क्षेत्र को माओवादी उग्रवादी समूहों के लिए विशेष रूप से अनुकूल बना दिया, जिन्होंने अबूझमाड़ को “सुरक्षित आश्रय” (“safe haven”) अथवा “मुक्त क्षेत्र” (“liberated zone”) के रूप में विकसित करने का प्रयास किया। घने जंगल, कठिन भूभाग और न्यूनतम राज्यीय उपस्थिति ने उग्रवादी समूहों को अपेक्षाकृत स्वतंत्र संचालन की सुविधा प्रदान की, जिसके माध्यम से उन्होंने इस क्षेत्र का उपयोग संगठन, प्रशिक्षण और रसद समन्वय के लिए किया। समय के साथ माओवादी प्रभाव ने नागरिक प्रशासन की संभावनाओं को और जटिल बना दिया, जिससे एक ऐसा चक्र निर्मित हुआ जिसमें असुरक्षा ने राज्यीय अनुपस्थिति को उचित ठहराया और अनुपस्थिति ने उग्रवादी जड़ों को और गहरा किया।
प्रशासनिक उपेक्षा के दीर्घकालिक परिणाम अबूझमाड़िया समुदायों के दैनिक जीवन में सर्वाधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। वर्तमान समय में भी बुनियादी आवश्यकताओं तक पहुँच अत्यंत सीमित बनी हुई है। आंतरिक गाँवों के निवासियों को नमक, खाद्य तेल, वस्त्र तथा घरेलू उपयोग की अन्य आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए निकटतम साप्ताहिक हाटों तक पहुँचने हेतु प्रायः 20–25 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। ये यात्राएँ अधिकांशतः घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर की जाती हैं तथा मौसमी परिस्थितियों और गाँव की स्थिति के अनुसार दो से चार दिनों तक भी चल सकती हैं। आधारभूत अवसंरचना (Basic infrastructure) अत्यंत अपर्याप्त है। सुरक्षित पेयजल की विश्वसनीय व्यवस्था लगभग अनुपस्थित है, जिसके कारण समुदायों को मौसमी जलधाराओं (seasonal streams), वन स्रोतों अथवा अत्यंत साधारण कुओं पर निर्भर रहना पड़ता है। स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली तक पहुँच भी सीमित अथवा अनियमित बनी हुई है, जिससे दीर्घकालिक असुरक्षा और वंचना की स्थितियाँ लगातार पुनरुत्पादित होती रहती हैं।
वंचना की यह स्थिति क्षेत्र की समृद्ध प्राकृतिक संपदाओं जैसे घने वनों और विविध वन-आधारित संसाधनों आदि के साथ तीव्र विरोधाभास प्रस्तुत करती है। इन संसाधनों का लाभ स्थानीय समुदायों के जीवन-स्तर में सुधार के रूप में परिवर्तित नहीं हो सका है। इसके विपरीत, कठोर वन व्यवस्थाओं, बाज़ार तक सीमित पहुँच तथा कमजोर संस्थागत समर्थन के कारण संसाधन-संपन्नता और स्थायी निर्धनता साथ-साथ विद्यमान हैं। परिणामस्वरूप, अबूझमाड़िया समुदायों का भौतिक जीवन आज भी कठिनाइयों, असुरक्षा और अनिश्चितताओं से चिह्नित है। यह विरोधाभास की जहाँ पारिस्थितिक समृद्धि के साथ मानवीय अभाव सह-अस्तित्व में हैं, अबूझमाड़ में संरचनात्मक हाशियाकरण की प्रकृति को रेखांकित करता है तथा ऐसे शासन-मॉडलों की तात्कालिक आवश्यकता को उजागर करता है जो अधिकार-सुरक्षा, विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित हों।



