Sunday, 31 May 2026

कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे-स्मृतियों, परंपराओं और सामुदायिक जीवन का एक आत्मीय संस्मरण

भाग-१ 

जब भी मैं कुक्कमेटा के बारे में सोचता हूँ, तो मेरे भीतर स्मृतियों का एक पूरा संसार जाग उठता है। भामरागढ़ के सुदूर वनों के बीच बसा यह छोटा-सा गाँव, जिसमें आज भी लगभग साठ घर हैं, केवल मेरा जन्मस्थान भर नहीं है; यह मेरे व्यक्तित्व, मेरी सांस्कृतिक चेतना और मेरे जीवन-दर्शन की आधारभूमि है। वर्षों बीत गए, जीवन मुझे गाँव से दूर ले गया, किंतु कुक्कमेटा आज भी मेरे भीतर उसी तरह जीवित है जैसे बचपन के दिनों में था।

कुक्कमेटा का नाम आते ही मेरे सामने मिट्टी की सोंधी गंध, जंगलों की हरियाली, पामूल गौतम नदी का कलकल प्रवाह, गोटूल के सामने का खुला मैदान, और उन लोगों के चेहरे उभर आते हैं जिनके साथ मेरा बचपन बीता। मेरे गाँव में जनजातीय और गैर-जनजातीय, दोनों समुदायों के लोग निवास करते थे। यद्यपि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमियाँ अलग थीं, फिर भी उनके बीच जो आत्मीयता, सहयोग और पारिवारिक संबंधों की भावना थी, वह आज भी मेरे लिए आश्चर्य और प्रेरणा का विषय है।

गाँव का जीवन केवल परिवारों तक सीमित नहीं था। पूरा गाँव ही एक विस्तृत परिवार की तरह था। सुख-दुःख, उत्सव और संकट—सब कुछ साझा था। शायद यही कारण था कि संसाधनों की कमी के बावजूद जीवन में संतोष और आत्मीयता की प्रचुरता थी।

तल्लिन पंडूम : धरती माता के प्रति कृतज्ञता का उत्सव

बरसात के मौसम के आगमन से पूर्व मनाया जाने वाला तल्लिन पंडूम मेरे बचपन की सबसे सशक्त स्मृतियों में से एक है। हमारी स्थानीय माड़िया भाषा में तल्लिन का अर्थ ‘माता’ और पंडूम का अर्थ ‘उत्सव’ होता है। इस प्रकार तल्लिन पंडूम धरती माता को समर्पित कृतज्ञता का पर्व है।

आज जब मैं इस उत्सव के बारे में सोचता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंधों की अभिव्यक्ति था। धरती को केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता मानने की जो दृष्टि हमारे समाज में थी, उसका सबसे सुंदर रूप तल्लिन पंडूम में दिखाई देता था।

इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष गाँव से दूर जंगल में नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी के तट पर अस्थायी चूल्हे बनाए जाते थे और सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया जाता था। उत्सव के लिए बकरे और सूअर की व्यवस्था पूरे गाँव की ओर से की जाती थी। इसके लिए आवश्यक धनराशि गाँव के सामूहिक कोष से आती थी, जिसमें नियमों का उल्लंघन करने वालों से प्राप्त दंड की राशि भी सम्मिलित होती थी। यदि वह पर्याप्त न होती, तो प्रत्येक परिवार अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता था।

तल्लिन पंडूम के आयोजन में पेरमा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती थी। लगभग सात-आठ गाँवों के समूह का एक पेरमा होता था, जिसे मुख्य पुजारी माना जाता था। पेरमा सदैव जनजातीय समुदाय से ही होता था। उत्सव की तिथि भी उसकी उपलब्धता को ध्यान में रखकर निर्धारित की जाती थी। निश्चित तिथि पर गाँव के लोग स्वयं जाकर उसे आदरपूर्वक अपने साथ लेकर आते थे।

पूजा के दौरान पेरमा के साथ गाँव का भूमिया भी उपस्थित रहता था। भूमिया वह व्यक्ति होता था जिसे गाँव की भूमि तथा उससे जुड़े पारंपरिक अधिकारों का संरक्षक माना जाता था। पेरमा, भूमिया और समस्त ग्रामीण मिलकर धरती माता और ग्राम देवताओं की पूजा करते थे।

अनुष्ठान सम्पन्न होने के बाद सभी लोग सामूहिक रूप से मंगलकामनाएँ व्यक्त करते थे। उनके स्वर में गाँव की समृद्धि, भरपूर वर्षा, अच्छी फसल और पूरे समुदाय के कल्याण की कामना समाहित होती थी। आज भी उन सामूहिक प्रार्थनाओं की गूँज मेरी स्मृतियों में सुनाई देती है।

इसके बाद सामूहिक भोजन का आयोजन होता था। यद्यपि सभी लोग एक ही स्थान पर उपस्थित रहते थे, फिर भी प्रत्येक परिवार का अपना अलग चूल्हा होता था। परिवार का पुरुष सदस्य अपने परिवार के लिए भोजन स्वयं तैयार करता था। इस व्यवस्था में सामूहिकता और पारिवारिक स्वायत्तता का अद्भुत संतुलन दिखाई देता था।

इस अवसर पर महुआ से निर्मित पारंपरिक मदिरा का सेवन भी किया जाता था। कभी-कभी कुछ लोग नशे के प्रभाव में आपस में विवाद कर बैठते थे, किंतु उन झगड़ों का प्रभाव केवल उसी दिन तक सीमित रहता था। अगले दिन सब कुछ सामान्य हो जाता था। किसी के मन में स्थायी वैर या कटुता नहीं रहती थी। आज पीछे मुड़कर देखने पर लगता है कि शायद संबंधों की गहराई ही ऐसी थी कि छोटी-छोटी कटुताएँ उसमें स्वतः विलीन हो जाती थीं।

महिलाओं का उत्सव और रेला नृत्य

तल्लिन पंडूम का एक रोचक पक्ष यह था कि जंगल में होने वाले मुख्य अनुष्ठान में केवल पुरुष भाग लेते थे। महिलाएँ गाँव में रहकर अपने ढंग से उत्सव मनाती थीं। उनके लिए भी गाँव की ओर से बकरे की व्यवस्था की जाती थी। वे अपने घरों में भोजन बनाती थीं और भोजन के उपरांत रेला नृत्य प्रस्तुत करती थीं।

रेला माड़िया समाज का अत्यंत लोकप्रिय लोकनृत्य है। इसकी लय, सामूहिकता और सहजता पूरे वातावरण को उल्लास से भर देती थी। मेरे बचपन की स्मृतियों में रेला के गीतों और नृत्य की छवियाँ आज भी जीवित हैं।

जब पुरुषों की टोली जंगल से लौटती थी, तब गाँव की महिलाएँ एक लंबी और मजबूत रस्सी बाँधकर उनका मार्ग रोक लेती थीं। पुरुषों को गाँव में प्रवेश तभी मिलता था, जब वे महिलाओं को कुछ उपहार या बख्शीश देते थे। यह परंपरा हँसी-मज़ाक, आत्मीयता और सामुदायिक सौहार्द से भरपूर होती थी। पूरे गाँव में उत्सव का वातावरण छा जाता था।

नवा पंडूम : नई उपज के स्वागत का पर्व

तल्लिन पंडूम के सम्पन्न होते ही हमारे गाँवों में उत्सवों का एक नया क्रम आरंभ हो जाता था। इन्हीं उत्सवों में सबसे पहले आता था नवा पंडूम।

हमारे घरों के आसपास थोड़ी-सी भूमि होती थी, जिसमें परिवार की आवश्यकता के लिए विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ उगाई जाती थीं। अम्बाड़ी, लोबिया, सेम, ककड़ी, दूधी और अनेक अन्य मौसमी सब्जियाँ हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा थीं।

जब ये फसलें तैयार हो जाती थीं, तब भी उनका सेवन तुरंत नहीं किया जाता था। पहले नवा पंडूम का आयोजन होता था। इस उत्सव के पश्चात ही नई उपज को खाने की अनुमति होती थी। यदि कोई व्यक्ति उससे पहले नई उपज का सेवन करता, तो उस पर गाँव की ओर से दंड लगाया जाता था।

इस परंपरा के पीछे केवल सामाजिक अनुशासन नहीं था, बल्कि प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा भी थी। नई उपज को धरती माता का आशीर्वाद माना जाता था और उसे ग्रहण करने से पहले कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक समझा जाता था।

पिंडी पंडूम : धान और जीवन का उत्सव

नवा पंडूम के बाद आता था पिंडी पंडूम, जो हमारे कृषि जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।

हमारे गाँवों में मुख्यतः धान की खेती होती थी और वह भी केवल जीवन-निर्वाह के लिए। उस समय गाँवों में कृषि को व्यवसाय के रूप में नहीं देखा जाता था। हमारे क्षेत्र के गाँव इतने दूरस्थ और भौगोलिक रूप से पृथक थे कि व्यापार और बाजार की अवधारणाएँ वहाँ तक पहुँची ही नहीं थीं।

मेरे बचपन के दिनों में सरकारी व्यवस्था भी लगभग अनुपस्थित थी। गाँव में केवल तीसरी कक्षा तक का एक छोटा-सा विद्यालय था, जिसमें एक ही शिक्षक सभी कक्षाओं को पढ़ाते थे। संसाधन सीमित थे, लेकिन जीवन अपनी स्वाभाविक लय में चलता था।

जब धान पककर भोजन के योग्य हो जाता था, तब पिंडी पंडूम का आयोजन किया जाता था। प्रत्येक परिवार का अपना पारंपरिक पुजारी होता था और उसका माड़िया समुदाय से होना आवश्यक माना जाता था।

हमारे परिवार के पुजारी थे चैतु विडपी। वे हमारे परिवार के लिए केवल पुजारी नहीं थे, बल्कि एक सम्मानित बुज़ुर्ग भी थे। उनकी अगुवाई में पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद ही धान की कटाई आरंभ होती थी।

बचपन में मैं अनेक बार उनकी पूजा में उपस्थित रहा, किंतु आज भी मुझे यह ज्ञात नहीं कि वे कौन-से मंत्रों का उच्चारण करते थे। संभवतः वे प्रकृति, धरती और ग्राम देवताओं का स्मरण करते होंगे। लेकिन इतना निश्चित है कि उनकी प्रार्थनाओं में अच्छी फसल, समृद्धि और पूरे गाँव के कल्याण की कामना अवश्य होती थी।

नवा पंडूम और पिंडी पंडूम दोनों ही नई उपज के स्वागत के उत्सव थे। इनके माध्यम से हम प्रकृति, धरती माता और अपने देवताओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते थे। हमारे लिए भोजन केवल जीविका का साधन नहीं था; वह प्रकृति का प्रसाद था।

इसी कारण हमारे त्योहार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे। वे प्रकृति के साथ हमारे गहरे संबंध, सामुदायिक जीवन की एकता और परंपराओं के प्रति सम्मान के जीवंत प्रतीक थे।


(क्रमशः)

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