Sunday, 31 May 2026

कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे


भाग–2 : आम्सताम, मक्का जात्रा, कुल देवता और गोटूल की स्मृतियाँ

पिंडी पंडूम सम्पन्न होने के बाद भी हमारे कृषि जीवन का उत्सवी क्रम समाप्त नहीं होता था। वास्तव में खेती का प्रत्येक चरण प्रकृति, देवताओं और समुदाय के साथ हमारे संबंधों को पुनर्स्थापित करने का अवसर बन जाता था। खेत में बीज बोने से लेकर फसल के घर पहुँचने तक, हर महत्वपूर्ण पड़ाव का अपना एक उत्सव और अपना एक सांस्कृतिक अर्थ था।

धान की फसल पक जाने और उसकी कटाई पूरी होने के बाद एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया आरम्भ होती थी। धान को खेतों से घर लाया जाता था, लेकिन उसके उपयोग से पहले धान की बालियों से भूसा और अन्य अवशेषों को अलग करने का कार्य किया जाता था। हमारी स्थानीय भाषा में इस प्रक्रिया को “चूरना” कहा जाता था।

किन्तु चूरने का कार्य भी सीधे आरम्भ नहीं किया जाता था। उससे पहले एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामुदायिक अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता था, जिसे “आम्सताम” कहा जाता था।

आम्सताम : फसल, पशुधन और ग्राम-सुरक्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना

आम्सताम हमारे गाँव के जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयोजन था। इस अवसर पर गाँव के सभी पुरुष हमारे गाँव के समीप बहने वाली पामूल गौतम नदी के किनारे एकत्रित होते थे। नदी का वह शांत किनारा उस दिन श्रद्धा, उत्साह और सामुदायिक भावना का केंद्र बन जाता था।

वहाँ ग्राम-देवताओं और गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली शक्तियों की पूजा की जाती थी। बकरे और सूअर की बलि अर्पित की जाती थी और सामूहिक रूप से यह प्रार्थना की जाती थी कि खेतों में बोई गई फसल सुरक्षित रहे, उसे कोई रोग या कीट न लगे, और वर्ष भर गाँव समृद्ध बना रहे।

हमारे समाज में यह विश्वास था कि खेती केवल मनुष्य के श्रम से नहीं चलती; उसमें प्रकृति, ऋतुओं, जल, वन और अदृश्य दैवी शक्तियों का भी योगदान होता है। इसलिए उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना आवश्यक था।

विशेष रूप से गाँव की सीमाओं की रक्षा करने वाली देवी को, जिन्हें हमारे क्षेत्र में माराई अथवा कुछ स्थानों पर मरी आई कहा जाता है, विशेष श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता था। उनसे प्रार्थना की जाती थी कि वे खेतों, पशुओं और पूरे गाँव को संकटों से सुरक्षित रखें।

मेरे बचपन में इन अनुष्ठानों का अर्थ पूरी तरह समझ में नहीं आता था, किंतु आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि इनके माध्यम से हमारे पूर्वज प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करते थे। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं था, बल्कि जीवन के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति भी था।

मक्का जात्रा : आम के प्रथम स्वाद का उत्सव

इसी प्रकार हमारे समाज में मक्का जात्रा का भी विशेष महत्व था।

माड़िया भाषा में मक्का का अर्थ आम होता है। जिस प्रकार नई फसल को ग्रहण करने से पहले नवा पंडूम मनाया जाता था, उसी प्रकार आम के मौसम में पहली बार आम खाने से पहले मक्का जात्रा आयोजित की जाती थी।

आज के समय में यह बात साधारण लग सकती है, किंतु हमारे लिए यह प्रकृति के प्रति सम्मान का विषय था। कोई भी नई उपज सीधे उपभोग की वस्तु नहीं मानी जाती थी। पहले उसका स्वागत किया जाता था, उसके लिए कृतज्ञता व्यक्त की जाती थी और फिर उसे ग्रहण किया जाता था।

इन परंपराओं ने हमें सिखाया कि प्रकृति केवल संसाधनों का भंडार नहीं है; वह जीवनदायिनी शक्ति है, जिसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता आवश्यक है।

हमारे कुल देवता और गोटूल की परंपरा

हमारे गाँव के कुल देवता भी अत्यंत विशिष्ट थे। वे किसी भव्य मंदिर या मूर्तियों में स्थापित नहीं थे। उनके प्रतीक साधारण पत्थर थे, किंतु हमारे लिए वे अत्यंत पूजनीय थे।

प्रत्येक पाँच वर्ष में एक बार इन कुल देवताओं का पुनः आरोपण किया जाता था। यह अनुष्ठान गाँव के गोटूल में सम्पन्न होता था।

गोटूल हमारे समाज का केवल एक भवन नहीं था। वह हमारे सामुदायिक जीवन का केंद्र था। वहीं बैठकों का आयोजन होता था, वहीं महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे, वहीं उत्सवों की योजनाएँ बनती थीं और वहीं हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती थीं।

कुल देवताओं की पुनः प्रतिष्ठा का यह अनुष्ठान रात्रि के समय सम्पन्न किया जाता था। इसकी एक विशेष बात यह थी कि उस समय गाँव की महिलाएँ और बच्चे गाँव के बाहर नदी किनारे चले जाते थे। केवल पुरुषों को ही इस अनुष्ठान में भाग लेने की अनुमति होती थी।

पूरी पुरुष मंडली गोटूल में एकत्रित होकर रात भर चलने वाले धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेती थी। उस समय वातावरण अत्यंत गंभीर और रहस्यमय हो जाता था। जंगलों की निस्तब्धता, दूर बहती नदी की ध्वनि और गोटूल के भीतर चल रहे अनुष्ठानों की कल्पना मेरे बालमन को हमेशा रोमांचित करती थी।

माँ की गोद, नदी का किनारा और बचपन की स्मृतियाँ

इन अवसरों पर मैं भी अन्य बच्चों के साथ अपनी माँ के साथ नदी किनारे जाता था। रात धीरे-धीरे गहराती जाती थी। आकाश असंख्य तारों से भर जाता था और जंगल की शांति पूरे वातावरण को किसी लोककथा जैसा बना देती थी।

हम बच्चे खेलते-खेलते थक जाते और अंततः अपनी माताओं की गोद में ही सो जाते थे। मुझे आज भी याद है कि कई बार आधी नींद में दूर से आती आवाज़ें सुनाई देती थीं, लेकिन उनका अर्थ समझ में नहीं आता था।

जब गोटूल में पूजा सम्पन्न हो जाती थी, तब गाँव के पुरुष ऊँचे स्वर में सामूहिक उद्घोष करते थे। उनकी आवाज़ें रात के सन्नाटे को चीरती हुई नदी तक पहुँचती थीं। वह संकेत होता था कि अनुष्ठान समाप्त हो चुका है और अब महिलाएँ तथा बच्चे गाँव में लौट सकते हैं।

मेरी स्मृतियों में वह दृश्य आज भी उतना ही जीवंत है—रात का अंधकार, नदी का किनारा, माँ की गोद, और दूर से आती पुरुषों की सामूहिक आवाज़ें। बचपन में इन सबका अर्थ समझना संभव नहीं था, किंतु आज लगता है कि वे केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थे; वे हमारी सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक थे।

परंपराओं के भीतर छिपा जीवन-दर्शन

आज जब मैं इन परंपराओं को स्मरण करता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि उनमें केवल आस्था नहीं थी, बल्कि सामुदायिक अनुशासन, सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान भी निहित था।

गोटूल केवल एक भवन नहीं था; वह हमारे सामूहिक जीवन की आत्मा था।

वहीं हमारी परंपराएँ जीवित थीं।

वहीं हमारी स्मृतियाँ आकार लेती थीं।

वहीं हमारी सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहती थी।

और वहीं से हमें यह सीख मिलती थी कि मनुष्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपने समुदाय, अपनी प्रकृति और अपनी परंपराओं के साथ मिलकर जीवन जीता है।

समय बदल गया है, परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन पामूल गौतम नदी के किनारे बिताई गई वे रातें, गोटूल की वह दुनिया और कुल देवताओं के प्रति लोगों की वह अटूट श्रद्धा आज भी मेरी स्मृतियों में उसी प्रकार सुरक्षित है, जैसे कल की ही बात हो।


(क्रमशः)

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