Sunday, 31 May 2026

कुक्कमेटा: जहाँ उत्सव केवल पर्व नहीं, जीवन का दर्शन थे



भाग–3 : पोलवा, हार्रो, आरु और सामुदायिक जीवन की आत्मा

तल्लिन पंडूम, नवा पंडूम, पिंडी पंडूम, आम्सताम और अन्य उत्सवों के माध्यम से हमारा जीवन केवल प्रकृति से ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे से भी गहराई से जुड़ा हुआ था। हमारे गाँव में त्योहारों का उद्देश्य केवल आनंद मनाना नहीं था; वे सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करने, सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करने और समुदाय को एक सूत्र में बाँधे रखने का माध्यम भी थे।

इन्हीं परंपराओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था थी—पोलवा।

पोलवा : विश्राम का नहीं, सामुदायिक जीवन का दिवस

तल्लिन पंडूम के पश्चात हमारे गाँव में पोलवा के दिनों का आरम्भ हो जाता था। माड़िया समाज में पोलवा का अर्थ था—अनिवार्य अवकाश अथवा सामूहिक विश्राम दिवस।

प्रत्येक रविवार को पूरे गाँव में पोलवा मनाया जाता था। इसके अतिरिक्त किसी भी पंडूम अथवा उत्सव के दिन भी पोलवा लागू होता था। उस दिन गाँव का कोई भी व्यक्ति खेती, मजदूरी या किसी अन्य प्रकार का श्रम नहीं कर सकता था।

आज जब मैं इस व्यवस्था के बारे में सोचता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि हमारे पूर्वजों ने जीवन में श्रम और विश्राम के संतुलन का महत्व बहुत पहले ही समझ लिया था। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ विश्राम भी एक विलासिता बनता जा रहा है, वहाँ हमारे गाँव में विश्राम को सामुदायिक अधिकार और आवश्यकता दोनों माना जाता था।

सौभाग्य से हमारा घर गोटूल के ठीक सामने स्थित था। इसलिए पोलवा के दिन होने वाली अधिकांश गतिविधियाँ मेरी आँखों के सामने ही घटित होती थीं।

सुबह से ही गाँव के लोग गोटूल के सामने एकत्रित होने लगते थे। बुज़ुर्ग आपस में बातचीत करते, युवा विभिन्न विषयों पर चर्चा करते और बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते। पूरा वातावरण उत्साह, आत्मीयता और जीवंतता से भर जाता था।

दांडी और कुडपी : अनुशासन की सामुदायिक व्यवस्था

गाँव छोटा था और लगभग सभी लोग एक-दूसरे के जीवन से परिचित थे। इसलिए यदि कोई व्यक्ति पोलवा के दिन काम करता हुआ दिखाई देता, तो उसकी सूचना तुरंत पूरे गाँव को हो जाती थी।

ऐसे व्यक्ति पर दंड लगाया जाता था, जिसे हमारी स्थानीय भाषा में “दांडी” कहा जाता था।
दांडी का अर्थ था कि नियम तोड़ने वाले व्यक्ति को अपनी एक दिन की मजदूरी अथवा उसके बराबर मूल्य का योगदान गाँव के सामूहिक कोष में देना पड़ता था। यह दंड केवल आर्थिक नहीं था; यह व्यक्ति को सामुदायिक उत्तरदायित्व का स्मरण भी कराता था।

यदि कोई व्यक्ति बार-बार नियमों का उल्लंघन करता, तो उसे अधिक बड़ा दंड भुगतना पड़ता था, जिसे “कुडपी” कहा जाता था।

कुडपी के अंतर्गत दोषी व्यक्ति को पूरे गाँव के लिए बकरे अथवा मुर्गे के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती थी। स्वाभाविक रूप से कोई भी व्यक्ति ऐसा दंड नहीं भुगतना चाहता था, इसलिए अधिकांश लोग नियमों का पालन स्वेच्छा और सम्मान के साथ करते थे।

इन व्यवस्थाओं की विशेषता यह थी कि वे बाहरी दबाव पर आधारित नहीं थीं। न कोई पुलिस थी, न कोई न्यायालय और न कोई सरकारी तंत्र। फिर भी समाज अपने नियमों का पालन करवाने में सक्षम था, क्योंकि लोगों के भीतर समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व की भावना थी।

हार्रो : जब पूरा गाँव एक परिवार बन जाता था

किन्तु हमारे सामाजिक जीवन की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक थी—हार्रो।

हार्रो का अर्थ था सामूहिक श्रमदान।

यदि गाँव का कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाता और अपने खेत का कार्य करने में असमर्थ हो जाता, तो हार्रो बुलाया जाता था। हार्रो की सूचना मिलते ही गाँव के सभी सक्षम लोग उसके खेत में पहुँच जाते थे।

कोई जुताई करता, कोई बुवाई, कोई निराई-गुड़ाई और कोई अन्य आवश्यक कार्य संभालता। कुछ ही समय में वह कार्य पूरा हो जाता, जिसे अकेले व्यक्ति के लिए करना संभव नहीं होता।

इसी प्रकार यदि बरसात के दिनों में किसी का घर क्षतिग्रस्त हो जाता या गिर जाता और वह उसे पुनः बनाने में असमर्थ होता, तो भी हार्रो आयोजित किया जाता था।

पूरा गाँव मिलकर उसके घर को पुनः खड़ा कर देता था।

आज जब मैं आधुनिक समाज में बढ़ते व्यक्तिवाद और अकेलेपन को देखता हूँ, तो हार्रो की परंपरा बार-बार स्मरण हो आती है। वहाँ सहायता कोई उपकार नहीं थी; वह सामुदायिक जीवन का स्वाभाविक कर्तव्य थी। किसी एक व्यक्ति का संकट पूरे गाँव का संकट माना जाता था।

आरु : नदी, श्रम और साझेदारी का उत्सव

बरसात के दिनों में एक और रोचक सामुदायिक गतिविधि आयोजित होती थी, जिसे हमारी स्थानीय भाषा में “आरु” कहा जाता था।

आरु नदी में मछली पकड़ने की एक सामूहिक व्यवस्था थी। वर्षा ऋतु में जब नदियाँ जल से भर जाती थीं, तब गाँव के लोग मिलकर बड़ी-बड़ी लकड़ियों और बाँसों की सहायता से नदी के बीच एक विशेष संरचना तैयार करते थे।

इसका उद्देश्य नदी के प्रवाह के साथ आने वाली मछलियों को पकड़ना होता था।

आरु का निर्माण अत्यंत श्रमसाध्य कार्य था। नदी का तीव्र प्रवाह कई बार जोखिम भी उत्पन्न करता था। पानी का वेग इतना अधिक होता था कि किसी के बह जाने की आशंका बनी रहती थी।

किन्तु मेरी स्मृतियों में ऐसा कोई प्रसंग नहीं है कि हमारे गाँव का कोई व्यक्ति नदी में बह गया हो। इसका एक कारण यह भी था कि हमारे गाँव के लोग उत्कृष्ट तैराक होते थे। नदी उनके जीवन का हिस्सा थी और बचपन से ही वे उसके स्वभाव को समझना सीख जाते थे।

आरु में पकड़ी गई मछलियों का वितरण भी अत्यंत रोचक होता था। वे किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं मानी जाती थीं। जो भी मछलियाँ प्राप्त होतीं, उन्हें पूरे गाँव में समान रूप से बाँटा जाता था। प्रत्येक परिवार को उसका हिस्सा मिलता था।

इस प्रकार आरु केवल मछली पकड़ने की तकनीक नहीं थी; वह साझेदारी, सहयोग और सामूहिक श्रम का उत्सव भी था।

स्मृतियों से वर्तमान तक

जब मैं अपने बचपन की इन सभी स्मृतियों को एक साथ देखता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि हमारे गाँव का जीवन केवल परंपराओं पर आधारित नहीं था; वह गहरे सामाजिक विश्वास, सामूहिक उत्तरदायित्व और मानवीय संबंधों की ऊष्मा पर भी टिका हुआ था।

पोलवा हमें विश्राम और सामूहिक जीवन का महत्व सिखाता था।
दांडी और कुडपी सामाजिक अनुशासन का बोध कराते थे।
हार्रो हमें यह सिखाता था कि किसी व्यक्ति का दुःख केवल उसका निजी दुःख नहीं होता।
और आरु हमें साझेदारी तथा सामूहिक श्रम का महत्व समझाता था।

इन सभी परंपराओं ने मिलकर गाँव के लोगों के भीतर भाईचारे, आत्मीयता और जिंदादिली की भावना को जीवित रखा। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद लोगों के जीवन में संतोष, आत्मविश्वास और सामुदायिक शक्ति का अद्भुत संचार दिखाई देता था।

पढ़ाई के लिए मुझे अपना गाँव छोड़े हुए आज तीस वर्षों से भी अधिक समय बीत चुका है। इस दौरान मैंने अनेक शहर देखे, विभिन्न संस्थानों में अध्ययन और कार्य किया तथा जीवन के अनेक आयामों को निकट से समझा। किंतु जब भी मैं कुक्कमेटा लौटता हूँ—चाहे स्मृतियों में या वास्तविक रूप से—तो अनुभव करता हूँ कि मेरी जड़ें आज भी वहीं हैं।

समय बदला है, परिस्थितियाँ बदली हैं, जीवन की गति बदली है, लेकिन कुक्कमेटा की अनेक परंपराएँ आज भी जीवित हैं। वे आज भी लोगों के जीवन को दिशा देती हैं और उन्हें एक-दूसरे से जोड़े रखती हैं।

उपसंहार : मेरी स्मृतियों का जीवंत संसार

आज जब मैं अपने बचपन की उन स्मृतियों को याद करता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि वे उत्सव केवल पर्व नहीं थे। वे हमारे सामूहिक जीवन, सामाजिक समरसता, प्रकृति के प्रति श्रद्धा और मानवीय संबंधों की गहराई को व्यक्त करने वाले जीवंत अनुभव थे।

वे स्मृतियाँ आज भी मेरे भीतर उतनी ही ताज़ा हैं जितनी दशकों पहले थीं। वे मुझे बार-बार अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देती हैं। वे मुझे याद दिलाती हैं कि मनुष्य की वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उन संबंधों, परंपराओं और सामुदायिक मूल्यों में निहित होती है जो जीवन को अर्थ, गरिमा और आत्मीयता प्रदान करते हैं।

मेरे लिए कुक्कमेटा केवल एक गाँव नहीं है।
वह मेरी स्मृतियों का संसार है।
वह मेरी सांस्कृतिक पहचान की आधारभूमि है।
वह मेरे जीवन की पहली पाठशाला है, जहाँ मैंने प्रकृति के प्रति श्रद्धा, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और मनुष्य के प्रति आत्मीयता का सबसे सुंदर पाठ सीखा।

और शायद यही कारण है कि समय की लंबी यात्रा के बाद भी कुक्कमेटा आज मेरे भीतर उतना ही जीवित है, जितना मेरे बचपन के दिनों में था।

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