पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत मेरे लिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है। यह उन अनुभवों, संवादों और भावनाओं की पुष्टि है जिन्हें मैंने पिछले कई वर्षों में बंगाल के लोगों के बीच रहकर महसूस किया है। यह परिवर्तन अचानक नहीं आया, बल्कि यह लंबे समय से जमा हो रही नाराज़गी, असुरक्षा, बेरोजगारी, राजनीतिक हिंसा और बदलाव की इच्छा का परिणाम है।
मेरी पत्नी बंगाल से हैं और विवाह से पहले भी मेरा इस राज्य से मेरा जुड़ाव रहा है। लगभग दस वर्षों से मैं लगातार बंगाल आता-जाता रहा हूँ। इस दौरान मुझे गाँवों, कस्बों और शहरों में रहने वाले सामान्य लोगों, खासकर युवाओं, सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और छोटे व्यवसायियों, से बात करने का अवसर मिला। यही कारण है कि जो मैं लिख रहा हूँ, वह किसी टीवी डिबेट या राजनीतिक विश्लेषण का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि मेरे अपने अनुभवों और प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित एक व्यक्तिगत दृष्टिकोण है।
बंगाल को बाहर से देखने और बंगाल के भीतर रहकर समझने में बहुत अंतर है। बाहर से यह राज्य अपनी संस्कृति, साहित्य, राजनीति और बौद्धिक परंपरा के लिए जाना जाता है, लेकिन जमीन पर रहने वाले लोगों की चिंताएँ कहीं अधिक व्यावहारिक हैं। इनमे रोजगार, सुरक्षा, भ्रष्टाचार और सम्मानजनक जीवन यह बातें शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में मैंने महसूस किया कि लोगों के भीतर बदलाव की इच्छा धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी। पहले लोग खुलकर अपनी बात कहने से हिचकिचाते थे, लेकिन इस चुनाव में पहली बार मैंने देखा कि बहुत से लोग खुलकर कह रहे थे कि वे परिवर्तन चाहते हैं।
इस चुनाव में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी और गृहमंत्री श्री अमित शाह जी की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। दोनों नेताओं ने जिस प्रकार लगातार बंगाल में समय दिया, गाँव-गाँव और शहर-शहर जाकर लोगों से संवाद किया, उससे लोगों के मन में यह विश्वास उतपन्न हुआ कि BJP केवल चुनावी औपचारिकता निभाने नहीं आई है, बल्कि वह राज्य में राजनीतिक रूप से गंभीर है। मेरे कई परिचितों ने मुझसे कहा कि पहले उन्हें लगता था कि BJP बंगाल में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आती है, लेकिन इस बार उन्हें लगा कि पार्टी वास्तव में सत्ता संभालने और राज्य की दिशा बदलने के लिए तैयार है।
हालाँकि, यदि मुझे अपने अनुभवों के आधार पर सबसे बड़ा मुद्दा चुनना हो, तो वह बेरोजगारी और भर्ती व्यवस्था में भ्रष्टाचार होगा। बंगाल के अनेक युवाओं से मेरी बातचीत हुई है, ऐसे लड़के और लड़कियाँ जो वर्षों से सरकारी नौकरियों की तैयारी कर रहे हैं। उनमें प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। बंगाल का युवा पढ़ा-लिखा, जागरूक और मेहनती है। लेकिन पिछले कई वर्षों में नियमित भर्तियों का अभाव और भर्ती प्रक्रियाओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों ने उनके भीतर गहरी निराशा पैदा कर दी।
मैंने कई युवाओं की आँखों में वह हताशा देखी है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। वे कहते थे कि परीक्षा होती है, परिणाम रुक जाते हैं; परिणाम आते हैं तो घोटाले की खबरें सामने आ जाती हैं; और कई बार योग्य उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं। एक बार बातचीत के दौरान मैंने कुछ युवाओं से पूछा कि फिर वे वोट क्यों देते हैं। उनका जवाब मेरे मन में आज भी गूंजता है—“हम वोट नहीं देते, वोट डलवाए जाते हैं।”
यह केवल एक वाक्य नहीं था; यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर लोगों के अविश्वास और भय का संकेत था।
मेरे एक करीबी मित्र बंगाल के एक सरकारी कॉलेज में कार्यरत हैं। उन्होंने मुझे जो अनुभव बताए, वे और भी चिंताजनक थे। उनके अनुसार शिक्षा संस्थानों में राजनीतिक हस्तक्षेप इतना बढ़ चुका है कि कई बार शिक्षकों तक पर दबाव बनाया जाता है। कुछ मामलों में आर्थिक मांगें भी की जाती हैं और विरोध करने पर मानसिक तथा प्रशासनिक परेशानियाँ झेलनी पड़ती हैं। यह समस्या किसी एक कॉलेज या जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक व्यवस्था की ओर संकेत करती है जिसमें राजनीतिक प्रभाव प्रशासनिक निष्पक्षता पर भारी पड़ता दिखाई देता है।
पिछले चुनावों और उपचुनावों के दौरान बंगाल के राजनीतिक माहौल को लेकर जो बातें सुनने को मिलती थीं, वे भी चिंताजनक थीं। विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं को डराना, मतदान केंद्रों पर दबाव बनाना और हिंसा की घटनाएँ लोगों के बीच आम चर्चा का विषय थीं। लेकिन इस बार मैंने एक महत्वपूर्ण बदलाव महसूस किया और वह है केंद्रीय सुरक्षा बलों की मजबूत मौजूदगी। बहुत से लोगों ने मुझसे कहा कि इस बार वे अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता और बिना भय के मतदान कर पाए। लोकतंत्र की असली ताकत तभी सामने आती है जब नागरिक बिना किसी दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।
एक और विषय जो लगातार चर्चाओं में सामने आया, वह था तुष्टिकरण की राजनीति। कई लोगों का मानना था कि कानून का पालन समान रूप से नहीं हो रहा। कुछ लोग यह महसूस करते थे कि राजनीतिक कारणों से प्रशासनिक कार्रवाई में भेदभाव दिखाई देता है। चाहे ये धारणाएँ पूरी तरह सार्वभौमिक हों या नहीं, लेकिन यह सच है कि इस प्रकार की भावनाओं ने समाज के एक हिस्से में असंतोष को जन्म दिया। लोगों की अपेक्षा केवल इतनी थी कि कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो।
महिला सुरक्षा का मुद्दा भी लोगों के बीच गंभीर चिंता का विषय रहा। कई परिवारों में यह भावना दिखाई दी कि सामाजिक वातावरण पहले जैसा सुरक्षित नहीं रहा। कुछ घटनाओं ने लोगों के मन में भय और असुरक्षा की भावना को और भी मजबूत किया। विशेषकर माता-पिता अपनी बेटियों के भविष्य और सुरक्षा को लेकर चिंतित दिखाई दिए। आ। जी कर अस्पताल में अभया के साथ हुई घटना को कैसे भुलाया जा सकता है?
यह कहना गलत होगा कि राज्य सरकार ने कोई काम नहीं किया। Lakshmi Bhandar जैसी योजनाओं ने प्रारंभिक स्तर पर लोगों को काफी आकर्षित किया और आर्थिक सहायता के कारण कई परिवारों को तत्काल राहत भी मिली। लेकिन समय के साथ लोगों को यह महसूस होने लगा कि केवल आर्थिक सहायता से स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। लोगों की सबसे बड़ी अपेक्षा रोजगार, उद्योग और अवसरों की थी।
जब लोग अन्य राज्यों—जैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र या गुजरात—की तुलना करते थे, तो वे कहते थे कि वहाँ सामाजिक योजनाओं के साथ-साथ उद्योग, निवेश और रोजगार पर भी समान रूप से ध्यान दिया जा रहा है। यह तुलना बंगाल के लोगों की सोच को प्रभावित करने लगी। धीरे-धीरे लोगों के बीच यह भावना बनी कि केवल सहायता योजनाएँ पर्याप्त नहीं हैं; राज्य को दीर्घकालिक आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
बंगाल की राजनीति लंबे समय तक वामपंथी प्रभाव में रही है। बंद, आंदोलन और राजनीतिक हिंसा की संस्कृति ने दशकों तक राज्य की कार्यशैली को प्रभावित किया। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने औद्योगिकीकरण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रयास किए थे। टाटा का नैनो प्रोजेक्ट इसी दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। लेकिन राजनीतिक विरोध और परिस्थितियों के कारण वह परियोजना सफल नहीं हो सकी। उस समय बंगाल के बहुत से लोगों को लगा था कि राज्य एक बड़े औद्योगिक अवसर से वंचित हो गया।
जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, तब लोगों को उम्मीद थी कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव आएगा और विकास की नई दिशा दिखाई देगी। प्रारंभिक वर्षों में कुछ सकारात्मक उम्मीदें भी बनीं, लेकिन समय के साथ लोगों को यह महसूस होने लगा कि कई पुरानी समस्याएँ अब भी बनी हुई हैं।
आज बंगाल का युवा बड़ी संख्या में रोजगार के लिए दूसरे राज्यों की ओर जा रहा है। दिल्ली, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद और गुजरात जैसे राज्यों में बंगाल के युवाओं की बढ़ती उपस्थिति इसका प्रमाण है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है; यह सामाजिक और भावनात्मक संकट भी है। जब युवाओं को अपने ही राज्य में अवसर नहीं मिलते, तो उनके भीतर अपने राज्य और व्यवस्था के प्रति विश्वास कम होने लगता है। यही निराशा धीरे-धीरे राजनीतिक परिवर्तन की मांग में बदल गई।
BJP की जीत निश्चित रूप से एक बड़ा अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। अब लोगों की अपेक्षाएँ केवल राजनीतिक बदलाव तक सीमित नहीं हैं। वे वास्तविक परिवर्तन चाहते हैं—पारदर्शी भर्ती प्रणाली, उद्योगों का विस्तार, निवेश, बेहतर कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक निष्पक्षता। यदि नई व्यवस्था भी उन्हीं गलतियों को दोहराती है जिनसे लोग पहले परेशान थे, तो जनता का विश्वास जल्दी टूट सकता है।
बंगाल की भौगोलिक स्थिति इसे राष्ट्रीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ का मुद्दा लंबे समय से चर्चा का विषय रहा है। बहुत से लोगों का मानना है कि यह केवल जनसांख्यिकीय या स्थानीय राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संसाधनों से जुड़ा प्रश्न भी है। इसलिए लोग चाहते हैं कि इस विषय पर गंभीर और संतुलित नीति अपनाई जाए।
बंगाल केवल एक राज्य नहीं है; यह भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन, सामाजिक सुधार, साहित्य, कला और राष्ट्रवाद—हर क्षेत्र में बंगाल ने देश को दिशा दी है। यही भूमि स्वामी विवेकानंद, बंकिम चंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस जैसी विभूतियों की रही है। इसलिए जब बंगाल बदलता है, तो उसका प्रभाव केवल राज्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे भारत पर पड़ता है।
मेरे अपने अनुभवों के आधार पर मैं इतना अवश्य कह सकता हूँ कि यह बदलाव केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं है। यह लोगों की मानसिकता, उम्मीदों और आकांक्षाओं में आए परिवर्तन का संकेत है। बंगाल का सामान्य नागरिक अब भय, भ्रष्टाचार और निराशा से आगे बढ़कर अवसर, विकास और सम्मानजनक जीवन की तलाश कर रहा है।
यदि इस अवसर का सही उपयोग किया गया, तो बंगाल फिर से भारत के विकास का अग्रदूत बन सकता है। और संभव है कि आने वाले वर्षों में यही बंगाल “Viksit Bharat @ 2047” के सपने को साकार करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।

Very nice explain Vivek!
ReplyDeleteThank you Sandip 🙏🌺
DeleteVivekanand ji....powerful and thought-provoking reflection on Bengal’s changing political mindset.
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