कुछ कहानियाँ समय और स्थान की सीमाओं को लाँघ जाती हैं। वे किसी देश, भाषा या युग की नहीं रह जातीं, बल्कि पूरी मानवता की धरोहर बन जाती हैं। ऐसी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि मनुष्य के भीतर अभी भी करुणा जीवित है; कि युद्ध, हिंसा और स्वार्थ के बीच भी कहीं न कहीं प्रेम का एक दीपक जलता रहता है।
यह कहानी द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों की है।
सन् 1944 का जनवरी महीना। इटली का एंज़ियो (Anzio) क्षेत्र। चारों ओर युद्ध की विभीषिका फैली हुई थी। धरती बारूद की गंध से भरी थी। आसमान में उड़ते विमानों की गर्जना और तोपों की गूँज लगातार सुनाई देती थी। घर खंडहर बन चुके थे, खेत उजड़ चुके थे और इंसान अपनी जान बचाने के लिए दर-दर भटक रहे थे।
अमेरिकी सेना का एक युवा सैनिक, कॉर्पोरल जेम्स व्हिटेकर, अपने कुछ साथियों के साथ गश्त पर निकला था। उसकी उम्र मात्र चौबीस वर्ष थी। वह जॉर्जिया के एक छोटे से गाँव का रहने वाला था। युद्ध उसके लिए केवल एक सैन्य अभियान नहीं था; वह हर दिन मृत्यु को अपने सामने खड़ा देखता था।
उस दिन भी वह एक बमबारी से तबाह हुए पुराने फार्महाउस की तलाशी ले रहा था। अचानक उसे एक अजीब-सी आवाज़ सुनाई दी।
वह रोने की आवाज़ नहीं थी।
शायद रोते-रोते थक जाने के बाद निकलने वाली वह करुण ध्वनि थी, जिसमें दर्द था, भूख थी और जीवन से चिपके रहने की आख़िरी कोशिश थी।
जेम्स उस आवाज़ का पीछा करते हुए तहखाने तक पहुँचा।
वहाँ जो उसने देखा, उसे वह जीवनभर नहीं भूल पाया।
एक लकड़ी के बक्से में, ऊनी कोट के ऊपर, एक नन्ही बच्ची लेटी हुई थी। उसकी उम्र आठ-नौ महीने से अधिक नहीं रही होगी। चेहरा पीला पड़ चुका था। होंठ सूख चुके थे। शरीर ठंड से काँप रहा था।
आसपास कोई नहीं था।
न माँ, न पिता, न कोई पड़ोसी।
सिर्फ़ वह बच्ची और चारों ओर पसरा हुआ सन्नाटा।
जेम्स कुछ क्षणों तक उसे देखता रहा। शायद उसके माता-पिता बमबारी में मारे जा चुके थे। शायद वे उसे बचाने के लिए वहाँ छोड़ गए थे। शायद वे लौटना चाहते थे, लेकिन लौट नहीं पाए।
इन प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं था।
उसके सामने केवल एक सच था और वह था यदि अभी कुछ नहीं किया गया, तो यह बच्ची जीवित नहीं बचेगी।
जेम्स ने उसे अपनी बाँहों में उठा लिया।
लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई।
वह एक युद्धरत सैनिक था। उसके पास न दूध था, न कोई दवा, न बच्चों की देखभाल का कोई साधन। निकटतम फील्ड अस्पताल लगभग चालीस मील दूर था। रास्ते में दुश्मन की गोलियाँ थीं, बर्फीली हवाएँ थीं और मृत्यु हर मोड़ पर घात लगाए बैठी थी।
फिर भी उसने निर्णय ले लिया।
वह बच्ची को लेकर चलेगा।
चाहे कुछ भी हो जाए।
उसने बच्ची को अपनी सैन्य जैकेट के भीतर, सीने से लगाकर रखा ताकि उसके शरीर की गर्मी उसे ठंड से बचा सके।
यात्रा शुरू हुई।
रास्ते भर जेम्स उसे पानी की छोटी-छोटी बूंदें अपनी उँगली से पिलाता रहा। उसे अचानक अपनी माँ की याद आई, जो खेतों में जन्मे छोटे जानवरों को इसी तरह पानी पिलाया करती थीं।
उसके पास एक चॉकलेट बार थी।
वह उसके छोटे-छोटे टुकड़े करता और अपनी उँगली पर लगाकर बच्ची को चटाता, ताकि उसके शरीर को थोड़ी ऊर्जा मिल सके।
दिन-रात का भेद मिट गया।
जेम्स चलता रहा।
गोलियों की आवाज़ों के बीच।
बारूद के धुएँ के बीच।
ठंडी हवाओं के बीच।
और सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि वह उस बच्ची से लगातार बातें करता रहता।
उसे पता था कि बच्ची उसकी भाषा नहीं समझती।
लेकिन शायद प्रेम की भाषा समझती थी।
वह उसे अपने गाँव के बारे में बताता।
जॉर्जिया के हरे-भरे खेतों के बारे में।
अपनी माँ के हाथों के बने भोजन के बारे में।
अपने बचपन की शरारतों के बारे में।
और हर थोड़ी देर में कहता,
"सब ठीक हो जाएगा।"
हालाँकि उसे स्वयं भी नहीं पता था कि सब सचमुच ठीक होगा या नहीं।
लगभग दो दिनों की कठिन यात्रा के बाद, भोर के समय वह फील्ड अस्पताल पहुँचा।
बच्ची अभी भी जीवित थी।
नर्सों ने तुरंत उसे अपने संरक्षण में ले लिया।
जेम्स ने उसे अंतिम बार देखा।
फिर वह अस्पताल के बाहर जमीन पर बैठ गया।
शायद थकान से।
शायद राहत से।
शायद उस भावनात्मक बोझ से, जिसे वह दो दिनों से ढो रहा था।
कुछ देर बाद उसे बताया गया कि बच्ची अब सुरक्षित है और उसे रेड क्रॉस के हवाले कर दिया जाएगा।
बस इतना ही।
युद्ध ने उसे आगे बढ़ने का आदेश दिया और वह वापस अपनी यूनिट में लौट गया।
युद्ध समाप्त हुआ।
जेम्स घर लौट आया।
उसने विवाह किया।
बच्चे हुए।
फिर पोते-पोतियाँ।
जीवन अपनी सामान्य गति से चलता रहा।
लेकिन उस बच्ची की स्मृति उसके मन से कभी नहीं गई।
कभी सुबह चाय पीते समय।
कभी रात को सोने से पहले।
कभी अपने बच्चों को खेलते हुए देखकर।
वह सोचता-
"क्या वह जीवित होगी?"
"क्या उसे कोई परिवार मिला होगा?"
"क्या वह खुश होगी?"
इन प्रश्नों का उत्तर उसके पास नहीं था।
और शायद यही अधूरापन उसके जीवन का हिस्सा बन गया।
साठ वर्ष बीत गए।
सन् 2004 में उसकी पोती सारा स्कूल प्रोजेक्ट के लिए द्वितीय विश्वयुद्ध पर काम कर रही थी।
उसने अपने दादा से पूछा,
"क्या आपके पास युद्ध की कोई कहानी है?"
जेम्स ने पहली बार विस्तार से उस बच्ची की कहानी सुनाई।
सारा ने वह कहानी इंटरनेट पर डाल दी।
और फिर एक चमत्कार हुआ।
तीन महीने बाद इटली के बोलोन्या शहर से एक ईमेल आया।
उस महिला का नाम मारिया कॉन्टी था।
उसकी उम्र साठ वर्ष थी।
उसने लिखा था कि उसे उसके दत्तक माता-पिता ने बताया था कि वह युद्ध के दौरान एक अमेरिकी सैनिक द्वारा बचाई गई थी, जिसने उसे एंज़ियो से उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुँचाया था।
वह पिछले चालीस वर्षों से उस सैनिक को खोज रही थी।
जब सारा ने यह ईमेल अपने दादा को दिखाया, तो जेम्स की आँखें भर आईं।
उन्होंने पत्र दो बार पढ़ा।
फिर धीरे से कहा,
"वह जीवित है..."
साठ वर्षों का बोझ जैसे एक क्षण में हल्का हो गया।
अगले कुछ महीनों में दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान हुआ।
फोन पर बातचीत हुई।
और फिर 2005 में मारिया इटली से अमेरिका आई।
वह इकसठ वर्ष की थी।
एक स्कूल शिक्षिका।
तीन बच्चों और पाँच नाती-पोतों की माँ।
जब वह जेम्स के घर पहुँची, तब जेम्स पचासी वर्ष के हो चुके थे।
दरवाज़ा खुला।
दोनों आमने-सामने खड़े थे।
एक वह सैनिक जिसने उसे मौत के मुँह से निकाला था।
दूसरी वह बच्ची, जो अब एक पूर्ण जीवन जी चुकी महिला थी।
मारिया धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसने जेम्स के दोनों हाथ पकड़ लिए।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसने इतालवी भाषा में कुछ कहा।
सारा ने अनुवाद किया-
"वह कहती हैं कि वह जीवनभर आपको धन्यवाद कहना चाहती थीं। उन्हें खेद है कि इसमें साठ वर्ष लग गए।"
जेम्स मुस्कुराए।
उन्होंने उसके हाथों को कसकर थामा।
और बोले-
"उसे बताओ कि साठ साल कोई मायने नहीं रखते।"
कुछ क्षण रुककर उन्होंने आगे कहा-
"मुझे बस इतना जानना था कि वह बच गई।"
उस क्षण वहाँ कोई सैनिक नहीं था, कोई युद्ध नहीं था, कोई राष्ट्र नहीं था।
वहाँ केवल दो मनुष्य थे।
एक जिसने बिना किसी स्वार्थ के जीवन बचाया था।
और दूसरी, जिसका पूरा जीवन उस करुणा का जीवित प्रमाण था।
शायद यही मानवता है।
युद्धों से बड़ी।
विचारधाराओं के दम्भ से बड़ी।
सीमाओं से बड़ी।
समय से भी बड़ी।
और यही कारण है कि ऐसी कहानियाँ कभी पुरानी नहीं होतीं। वे हमें बार-बार याद दिलाती हैं कि दुनिया चाहे कितनी भी कठोर क्यों न हो जाए, एक दयालु हृदय अभी भी हमें मानवता और उसमे निहित करुणा का पाठ पढ़ाता रहेगा। मानवता और करुणा के आगे सारी चीजें कितनी छोटी लगने लगती हैं।
किसी कविता में कहा है ना.....
रात का नाम अँधेरा है, ये जितना सच है,
सच ये उतना ही है कि कुछ जलते सितारें होंगे।

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