भारत को यदि किसी एक सूत्र में समझना हो, तो वह उसकी असाधारण सांस्कृतिक बहुलता और उस बहुलता के भीतर विद्यमान गहरी एकात्म चेतना है। यह वह भूमि है जहाँ हजारों वर्षों से अनेक भाषाएँ, पंथ, पूजा-पद्धतियाँ, परंपराएँ और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ एक-दूसरे के विरोध में नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित होती रही हैं। भारतीय धार्मिक संरचना की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि यहाँ धर्म किसी कठोर, बंद और एकरूप व्यवस्था का नाम नहीं है। यहाँ धर्म जीवन की विविध अभिव्यक्तियों, प्रकृति के प्रति श्रद्धा, लोकाचार, परंपरा, स्मृति और सांस्कृतिक निरंतरता का व्यापक अनुभव है। इसी कारण भारत के जनजातीय समाजों की धार्मिक परंपराएँ, प्रकृति पूजा, पूर्वज पूजा, टोटेम, ग्राम देवताओं की आराधना, धरती माता और वनदेवताओं के प्रति श्रद्धा आदि भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सबसे प्राचीन और जीवंत अभिव्यक्तियों के रूप में दिखाई देती हैं।
किन्तु हाल के वर्षों में “Other Religions and Persuasions (ORP)” के स्थान पर पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग ने एक नया विमर्श खड़ा किया है। इस मांग को कुछ लोग जनजातीय अस्मिता और सांस्कृतिक संरक्षण का प्रश्न मानते हैं, जबकि यह मांग भारतीय सभ्यता की उस ऐतिहासिक एकात्मता को खंडित करने का प्रयास है, जिसने सदियों से जनजातीय और गैर-जनजातीय समाजों को एक साझा सांस्कृतिक प्रवाह में बाँधकर रखा। यह विवाद केवल जनगणना के एक कॉलम या प्रशासनिक वर्गीकरण का नहीं है; यह भारत की सभ्यतागत आत्मा, धार्मिक पहचान और संवैधानिक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ मुद्दा है।
भारतीय धार्मिक परंपरा का विकास किसी एक पैगंबर, एक ग्रंथ या एक संस्थापक पर आधारित नहीं रहा। यही इसकी सबसे बड़ी विशिष्टता है। ऋग्वेद में अग्नि, वायु, सूर्य, पृथ्वी और जल जैसे प्रकृति तत्वों की उपासना का विस्तृत वर्णन मिलता है। बाद की पुराणिक परंपराओं में ग्रामदेवताओं, कुलदेवियों और लोक-आस्थाओं को व्यापक धार्मिक संरचना के भीतर स्थान मिला। यदि हम जनजातीय समाज की धार्मिक परंपराओं को देखें, तो धरती माता, वनदेवता, सूर्य-चंद्र, पूर्वजों और पवित्र वृक्षों की पूजा उसी सांस्कृतिक चेतना का विस्तार है। वास्तव में भारतीय पूजा-पद्धतियों की जड़ें ही प्रकृति और लोक परंपराओं में निहित हैं। इसलिए तथाकथित “आदिवासी धर्म” और “सनातन परंपरा” के बीच एक कृत्रिम विभाजन रेखा खींचने का प्रयास ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से असंगत है।
समस्या तब और गहरी हो जाती है जब भारतीय जनजातीय समाज को समझने के लिए पश्चिमी मानवविज्ञान के मॉडल लागू किए जाते हैं। औपनिवेशिक काल में यूरोपीय मानवविज्ञानियों ने अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका के अनुभवों के आधार पर मानव समाजों को “आदिम” से “सभ्य” अवस्था की ओर बढ़ने वाले विकासवादी ढाँचे में देखने का प्रयास किया। इस दृष्टिकोण में जनजातीय समुदायों को सामाजिक विकास की प्रारंभिक अवस्था का प्रतिनिधि माना गया। भारत के संदर्भ में भी यही दृष्टिकोण थोपा गया और यह स्थापित करने का प्रयास हुआ कि जनजातीय समाज “मुख्यधारा” से पृथक और कम विकसित समुदाय हैं। किन्तु भारतीय अनुभव इस पूरी अवधारणा को अस्वीकार करता है। भारत की जनजातियाँ कभी भी भारतीय सभ्यता से अलग-थलग इकाई नहीं रहीं। वे इस सभ्यता के निर्माण, संरक्षण और विस्तार की सहभागी रही हैं।
भारतीय समाजशास्त्र और मानवविज्ञान के प्रमुख विद्वानों, गोविन्द सदाशिव घुर्ये, निर्मल कुमार बोस, श्यामा चरण दुबे और सुरजीत सिन्हा आदि ने अपने अध्ययनों में स्पष्ट रूप से यह स्थापित किया कि भारतीय जनजातीय समाज को समझने के लिए भारतीय इतिहास, संस्कृति और सामाजिक संरचना की विशिष्टता को स्वीकार करना आवश्यक है। भारत में जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों के संबंध केवल सह-अस्तित्व तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें भावनात्मक, सांस्कृतिक, धार्मिक और नातेदारी के गहरे संबंध विकसित हुए। यह संबंध किसी औपनिवेशिक संरचना की तरह शासक और शासित का नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय और सहजीवन का उदाहरण था।
भारतीय सभ्यता का मूल तत्व “एकता में विविधता” रहा है। यहाँ विभिन्न समुदायों के बीच संबंध संघर्ष या अलगाव पर आधारित नहीं रहे, बल्कि परस्पर आदान-प्रदान और सांस्कृतिक सहभागिता पर आधारित रहे हैं। मध्य भारत के गोंड समुदाय की धार्मिक मान्यताओं में प्रकृति पूजा और व्यापक भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। झारखंड के सरना समुदाय में साल वृक्ष की पूजा भारतीय वृक्ष-पूजा परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है। अरुणाचल प्रदेश की डोनी-पोलो परंपरा में सूर्य और चंद्रमा की उपासना वैदिक देवताओं की स्मृति जगाती है। राजस्थान के भील समुदाय में शिव पूजा शैव परंपरा से उनका सांस्कृतिक संबंध स्पष्ट करती है। यदि इन परंपराओं को ध्यान से देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय धार्मिक जीवन की विविध धाराएँ किसी विभाजन की नहीं, बल्कि निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह की कहानी कहती हैं।
भारतीय समाज में विवाह और नातेदारी के संबंधों ने भी जनजातीय और अन्य समुदायों के बीच गहरी सामाजिक एकता का निर्माण किया। अनेक क्षेत्रों में स्थानीय जातीय समूहों और जनजातीय समुदायों के बीच वैवाहिक संबंधों ने सामाजिक दूरी को कम किया और सांस्कृतिक निकटता को बढ़ाया। यह स्थिति पश्चिमी औपनिवेशिक समाजों से बिल्कुल भिन्न थी, जहाँ आदिवासी समुदायों को अक्सर “रिजर्व” क्षेत्रों में सीमित कर दिया गया और उन्हें मुख्य समाज से अलग रखने की नीति अपनाई गई। भारत में जनजातीय समाज गाँवों, मेलों, तीर्थों, धार्मिक उत्सवों और आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से निरंतर व्यापक समाज के संपर्क में रहे। यही कारण है कि भारतीय जनजातीय जीवन को अलग-थलग या पृथक पहचान के रूप में देखना भारतीय यथार्थ को नकारने जैसा है।
इतिहास भी इस सत्य की पुष्टि करता है कि जनजातीय समाज केवल सांस्कृतिक इकाई नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भारत की राष्ट्रीय चेतना और स्वाधीनता संघर्ष में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संथाल विद्रोह, भील आंदोलन, कोल विद्रोह और भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान केवल स्थानीय असंतोष नहीं थे; वे औपनिवेशिक दमन और सांस्कृतिक अपमान के विरुद्ध भारतीय प्रतिरोध के शक्तिशाली अध्याय थे। इन आंदोलनों में जनजातीय समाज स्वयं को भारत की व्यापक सभ्यतागत चेतना से पृथक नहीं मानता था। वे अपनी परंपराओं की रक्षा के साथ-साथ उस सांस्कृतिक स्वाभिमान की भी रक्षा कर रहे थे, जो भारत की आत्मा का हिस्सा है।
भारतीय दर्शन में प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य को अत्यंत महत्व दिया गया है। यही दृष्टिकोण जनजातीय जीवन में भी दिखाई देता है। वन, जल, भूमि और जीव-जंतुओं के प्रति श्रद्धा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। आज जब पूरी दुनिया “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” और पर्यावरण संरक्षण की बात कर रही है, तब यह समझना आवश्यक है कि भारतीय जनजातीय समाज सदियों से प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीता आया है। आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श जिन मूल्यों को नए सिद्धांतों के रूप में प्रस्तुत करता है, वे जनजातीय जीवन में प्राचीन काल से विद्यमान रहे हैं।
ऐसी स्थिति में पृथक आदिवासी धर्म कोड की मांग कई गंभीर प्रश्न खड़े करती है। सबसे पहला प्रश्न यह है कि क्या सैकड़ों जनजातीय पंथों और स्थानीय आस्थाओं को एक ही “आदिवासी धर्म” की श्रेणी में समाहित किया जा सकता है? यदि गोंड, सरना, डोनी-पोलो, भील, मुंडा और अन्य समुदायों की परंपराएँ अलग-अलग हैं, तो क्या उन्हें एक कृत्रिम प्रशासनिक कोड में बाँधना उनकी वास्तविक विविधता को समाप्त नहीं करेगा? विडंबना यह है कि जो लोग सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण के नाम पर पृथक कोड की मांग कर रहे हैं, वही विविधता को एक प्रशासनिक श्रेणी में सीमित करने का प्रयास भी कर रहे हैं।
दूसरा प्रश्न संविधान और भारतीय न्यायिक दृष्टिकोण से जुड़ा है। संविधान सभा की बहसों में धर्म को एक व्यापक सांस्कृतिक श्रेणी के रूप में देखा गया था। “हिंदू” शब्द को केवल संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं, बल्कि एक सभ्यतागत श्रेणी के रूप में समझा गया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्वयं यह स्पष्ट किया था कि भारतीय समाज में धार्मिक पहचान बहुस्तरीय है। हिंदू विधि सुधारों (Hindu Code बिल्स) के दौरान भी “हिंदू” की परिभाषा में अनेक पंथों और समुदायों को शामिल किया गया। भारतीय न्यायपालिका ने भी बार-बार यही माना है कि हिंदू धर्म किसी एक पैगंबर, एक ग्रंथ या एक सिद्धांत पर आधारित नहीं है। शास्त्री यज्ञपुरुषदास बनाम मूलदास वैश्य (1966) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “हिंदू धर्म जीवन जीने की एक पद्धति है।” एस.पी. मित्तल बनाम भारत संघ (1983) और रामकृष्ण मिशन केस (1995) में भी न्यायालय ने हिंदू धर्म की व्यापकता और बहुलता को रेखांकित किया। इन निर्णयों से यह स्पष्ट होता है कि जनजातीय आस्थाएँ इस व्यापक सांस्कृतिक परंपरा के भीतर स्वाभाविक रूप से समाहित हैं।
जनगणना के संदर्भ में भी पृथक धर्म कोड की मांग व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न करती है। भारत सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि धर्म कोड का उद्देश्य केवल गणना और प्रशासनिक सुविधा है। 2001 की जनगणना में सौ से अधिक जनजातीय धर्मों और पंथों का उल्लेख सामने आया था। ऐसे में प्रत्येक समुदाय के लिए पृथक कोड देना प्रशासनिक दृष्टि से लगभग असंभव है। “Other Religions and Persuasions” श्रेणी किसी भेदभाव का संकेत नहीं, बल्कि एक तकनीकी व्यवस्था है। इसे सांस्कृतिक अस्वीकृति के रूप में प्रस्तुत करना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं है।
यह भी याद रखना चाहिए कि “animism” और “tribal religion” जैसी श्रेणियाँ औपनिवेशिक प्रशासन की देन थीं। ब्रिटिश शासन ने भारतीय समाज को अलग-अलग वर्गों में बाँटकर देखने की नीति अपनाई, ताकि सांस्कृतिक एकता को कमजोर किया जा सके। आज यदि हम उसी औपनिवेशिक दृष्टिकोण को नए नामों के साथ पुनर्जीवित करते हैं, तो यह भारत की सभ्यतागत निरंतरता को समझने में गंभीर भूल होगी।
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जनजातीय समाज की वास्तविक समस्याओं का समाधान केवल पृथक धर्म कोड में निहित है? क्या इससे उनकी आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वास्थ्य, वनाधिकार या सांस्कृतिक संरक्षण के प्रश्न हल हो जाएंगे? वास्तविक आवश्यकता यह है कि जनजातीय भाषाओं, लोककला, परंपराओं, ज्ञान प्रणालियों और सांस्कृतिक संस्थाओं को सशक्त किया जाए। संरक्षण का मार्ग सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सम्मान में है, न कि केवल प्रशासनिक वर्गीकरण में।
भारत की जनजातीय परंपराएँ इस राष्ट्र की सांस्कृतिक जड़ों का हिस्सा हैं। वे “अन्य” नहीं हैं; वे भारत की आत्मा की मूल अभिव्यक्तियाँ हैं। उन्हें पृथक पहचान देने के नाम पर भारतीय सभ्यता की व्यापक सांस्कृतिक एकता से काटना समाधान नहीं, बल्कि एक नया भ्रम उत्पन्न करना है। भारत का वास्तविक मॉडल संघर्ष का नहीं, बल्कि समन्वय, सहजीवन और सांस्कृतिक एकात्मता का रहा है। यही भारतीयता की शक्ति है और यही उसकी सबसे बड़ी सभ्यतागत विशेषता भी।

बढिया विश्लेषण किया है
ReplyDeleteधन्यवाद सर 🙏🌺
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