Saturday, 21 February 2026

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस और भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा



हर वर्ष 21 फ़रवरी को विश्व भर में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है। यह दिन हमें यह स्मरण कराता है कि भाषाएँ केवल संप्रेषण के साधन नहीं, बल्कि स्मृति, पहचान और जीवनानुभव की वाहक होती हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ भाषाओं की आश्चर्यजनक विविधता विद्यमान है, यह दिवस केवल भाषाई विविधता के संरक्षण का नहीं, बल्कि उन गहरे सभ्यतागत प्रक्रियाओं को समझने का अवसर भी है, जिन्होंने इस विविधता को सदियों तक सह-अस्तित्व में बनाए रखा है।

हम प्रायः भारत की भाषाई बहुलता को विखंडन के रूप में देखते हैं। भाषाओं को परिवारों में वर्गीकृत किया जाता है, उनकी गणना की जाती है, उन्हें अलग-अलग श्रेणियों में बाँटा जाता है और कभी-कभी उनकी तुलना भी की जाती है। विविधता को एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है—ऐसी चुनौती जिसे राष्ट्रीय एकता के हित में नियंत्रित या संतुलित किया जाना चाहिए। किंतु भारत के भाषाई इतिहास पर एक निकट दृष्टि डालने से एक भिन्न चित्र सामने आता है।

भारतीय भाषाएँ कभी भी एक-दूसरे से अलग-थलग विकसित नहीं हुईं। वे सदियों के साझा सामाजिक जीवन—तीर्थयात्राओं, व्यापार, प्रवासन, प्रदर्शनात्मक परंपराओं, साहित्यिक आदान-प्रदान और दैनिक बहुभाषिक संवाद—के माध्यम से एक-दूसरे को प्रभावित करती हुई विकसित हुई हैं। इस दृष्टि से भारत केवल अनेक भाषाओं का देश नहीं है; यह एक भाषाई संगम-क्षेत्र है, जहाँ विभिन्न वंशगत मूल की भाषाएँ निरंतर संपर्क के कारण एक-दूसरे के समान रूप ग्रहण करती रही हैं।

इसी कारण “भारतीय भाषा परिवार” की अवधारणा अधिक सार्थक प्रतीत होती है, एक ऐसा भाषाई परिवार जो समान उत्पत्ति के आधार पर नहीं, बल्कि साझा सांस्कृतिक अनुभवों के माध्यम से निर्मित हुआ है।

भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसी अनेक भाषाएँ हैं, जिनका ऐतिहासिक स्रोत भिन्न है, फिर भी वे ध्वनियों, व्याकरणिक संरचनाओं और अभिव्यक्ति के तरीकों में उल्लेखनीय समानताएँ प्रदर्शित करती हैं। ये समानताएँ केवल शब्दों के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भाषा के गहरे ढाँचों तक जाती हैं,  जैसे प्रश्न पूछने की शैली, संबंधों को व्यक्त करने के तरीके, क्रियाओं का निर्माण, अथवा स्थान और समय का संकेत।

ऐसी समानताओं को केवल प्रवासन या वंशावली के आधार पर नहीं समझा जा सकता। वे इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि भारत में द्विभाषिकता और बहुभाषिकता सदैव सामाजिक जीवन का स्वाभाविक अंग रही है।

सदियों से भारतीय समाज में लोग तीर्थयात्रा, शिक्षा, व्यापार या बसावट के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाते रहे हैं। सांस्कृतिक संपर्क किसी एक प्रमुख भाषा के माध्यम से नहीं, बल्कि अनुवाद, अनुकूलन और परस्पर प्रभाव के जटिल ताने-बाने के माध्यम से स्थापित हुआ है। दार्शनिक विचार, भक्ति परंपराएँ और नैतिक मूल्य विभिन्न भाषाओं में प्रवाहित होते रहे. यह प्रवाह संस्कृत से प्राकृत और क्षेत्रीय भाषाओं तक, शास्त्रीय ग्रंथों से लोककथाओं तक, और पांडुलिपियों से गीतों एवं प्रदर्शनात्मक रूपों तक बहता रहा है। 

भारतीय संदर्भ में ज्ञान का संचरण केवल लिखित पाठों तक सीमित नहीं रहा है। कहावतों, लोकगीतों, अनुष्ठानों और प्रदर्शनात्मक परंपराओं ने भी ज्ञान के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यहाँ भाषा केवल बोली या लिखी नहीं जाती; उसे जिया जाता है। ज्ञान का संप्रेषण केवल पाठन से नहीं, बल्कि पुनरावृत्ति और सामूहिक सहभागिता से होता है।

यह आधुनिक धारणा को चुनौती देता है कि भाषा मुख्यतः पाठ के रूप में ही अस्तित्व में होती है। भारत की अनेक ज्ञान-परंपराएँ उन रूपों में संरक्षित हैं, जिन्हें प्रदर्शनात्मक परंपराएँ कहा जा सकता है, जहाँ स्मृति लिखित दस्तावेज़ों के बजाय सामूहिक अभ्यास और अनुभव के माध्यम से सुरक्षित रहती है। यहाँ सहभागिता ही सीखने का प्रमुख माध्यम बन जाती है।

अतः जब हम भाषाओं के संरक्षण की बात करते हैं, तो हम केवल व्याकरण या शब्दावली की रक्षा नहीं कर रहे होते, बल्कि उन ज्ञान-प्रणालियों की रक्षा कर रहे होते हैं, जिनमें पर्यावरणीय समझ, नैतिक ढाँचे, सामाजिक व्यवहार और सांस्कृतिक कल्पना निहित होती है।

यह भी स्मरणीय है कि भारतीय भाषाओं के बीच जो कठोर विभाजन आज दिखाई देते हैं, उनमें से अनेक औपनिवेशिक काल की बौद्धिक विरासत हैं। यूरोप में भाषाई विविधता अक्सर राजनीतिक सीमाओं और राष्ट्र-निर्माण से जुड़ी रही है। उसी विश्लेषणात्मक ढाँचे को भारत पर लागू करने से विविधता को सभ्यतागत निरंतरता के बजाय विभाजन के रूप में देखा जाने लगा।

किन्तु भाषाई और साहित्यिक साक्ष्य यह दर्शाते हैं कि भारत की बहुलता सदैव संबंधपरक रही है। भारतीय भाषाएँ ऐतिहासिक रूप से प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि संवादशील रही हैं।

समकालीन संदर्भ में इस समझ के शिक्षा और ज्ञान-उत्पादन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ते हैं। मातृभाषा में शिक्षा न केवल समझ को सुदृढ़ करती है, बल्कि सांस्कृतिक जुड़ाव को भी प्रगाढ़ बनाती है। जब ज्ञान उसी भाषा में उपलब्ध होता है, जिसमें लोग सोचते और अनुभव करते हैं, तो वह अधिक सुलभ और अर्थपूर्ण हो जाता है।

डिजिटल युग में यह चुनौती और अवसर दोनों प्रस्तुत करता है। प्रौद्योगिकी के माध्यम से भारतीय भाषाओं में ज्ञान का संरक्षण और प्रसार संभव है, किन्तु भाषाओं में निहित सांस्कृतिक अर्थों को समझने के लिए मानवीय हस्तक्षेप आवश्यक है।

भारत की साहित्यिक, संगीतात्मक और कलात्मक परंपराएँ लंबे समय से यह दर्शाती रही हैं कि भाषाएँ भिन्न होते हुए भी सह-अस्तित्व में रह सकती हैं। अनुवाद ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसने विभिन्न क्षेत्रों के बीच संवाद को सुदृढ़ किया है।

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर यह आवश्यक है कि हम भाषाई विविधता को समस्या के रूप में देखने की प्रवृत्ति से आगे बढ़ें। भारतीय भाषा परिवार की अवधारणा हमें यह समझने का अवसर देती है कि विविधता विखंडन नहीं, बल्कि साझा सभ्यतागत विरासत का प्रतीक है।

यदि भाषाएँ सांस्कृतिक स्मृति की संरक्षक हैं, तो उनका संरक्षण अतीत को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि बौद्धिक आत्मनिर्भरता के प्रति प्रतिबद्धता है। भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को समझने के लिए हमें उसकी भाषाओं के भीतर ही झाँकना होगा।

क्योंकि इन्हीं भाषाओं में भारत का अतीत बोलता है, और शायद, इन्हीं के माध्यम से उसका भविष्य भी निर्मित होगा।

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