विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा हाल ही में जारी किए गए समानता (Equity) संबंधी दिशानिर्देशों ने भारत में उच्च शिक्षण संस्थानों के भीतर जाति-आधारित भेदभाव और प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर एक तीव्र बहस को पुनर्जीवित कर दिया है। इस बहस में दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण उभरकर सामने आए हैं। सवर्ण समुदायों से जुड़े कुछ छात्र और शिक्षक यह आशंका व्यक्त कर रहे हैं कि ये दिशानिर्देश उनके अनुचित दमन और संस्थागत हाशियाकरण का कारण बन सकते हैं। दूसरी ओर, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से जुड़े वर्गों का यह कहना है कि ये नीतिगत उपाय लंबे समय से चले आ रहे संरचनात्मक बहिष्करण और जातिगत भेदभाव को संबोधित करने का एक प्रयास मात्र हैं।
इस बहस को यदि गंभीरता से समझना है, तो दोनों पक्षों के दावों का विश्लेषण भावनात्मक आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, संवैधानिक और अनुभवजन्य ढांचे के भीतर किया जाना आवश्यक है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: वर्ण से संरचनात्मक असमानता तक
भारत में जाति-आधारित भेदभाव के ऐतिहासिक अस्तित्व से इनकार करना न केवल कठिन है, बल्कि बौद्धिक रूप से असंगत भी है। वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था भले ही अतीत में सामाजिक संगठन और श्रम-विभाजन के लिए कुछ हद तक उपयोगी रही हों परन्तु समय के साथ कठोर पदानुक्रमों में परिवर्तित हो गईं। इन पदानुक्रमों ने कुछ समुदायों को, विशेष रूप से वे समुदाय जो आज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आते हैं उनको सामाजिक संरचना के निम्नतम पायदान पर स्थायी रूप से स्थापित कर दिया।
यदि यह मान भी लिया जाए कि किसी दूरस्थ अतीत में इन व्यवस्थाओं की कुछ कार्यात्मक उपयोगिता रही हो, तो आधुनिक भारत के संदर्भ में ऐसे तर्क अप्रासंगिक हो जाते हैं। उत्तर-औद्योगिक और वैश्वीकरण के युग में सामाजिक संरचनाएँ, आर्थिक संबंध और उत्पादन की पद्धतियाँ मूलतः परिवर्तित हो चुकी हैं। अतः समाज को अब भी पूर्व-आधुनिक सामाजिक सिद्धांतों की दृष्टि से देखना न केवल प्रतिगामी है, बल्कि ऐतिहासिक रूप से अप्रासंगिक भी है।
संवैधानिक संक्रमण: सामाजिक पदानुक्रम से लोकतांत्रिक समानता की ओर
26 जनवरी 1950 को संविधान को अंगीकार करते हुए भारत ने औपचारिक रूप से विरासत में मिली सामाजिक असमानताओं से नैतिक और वैधानिक विच्छेद किया। भारतीय संविधान समानता, गरिमा और न्याय के मूल्यों पर आधारित है और वह राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र में रूपांतरित करने की स्पष्ट प्रतिबद्धता व्यक्त करता है।
संविधान सभा के प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को अपने ऐतिहासिक संबोधन में इस बात पर बल दिया था कि यदि भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में जीवित रहना है, तो उसे सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की दिशा में अनिवार्य रूप से आगे बढ़ना होगा।
प्रक्रियात्मक दृष्टि से भारत ने राजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना अवश्य कर ली है, किंतु वास्तविक अथवा सारभूत अर्थों में सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की प्राप्ति अब भी अधूरी है। इस विफलता का सबसे स्पष्ट संकेत सत्ता और निर्णय-निर्माण की संस्थाओं में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की निरंतर अल्प-प्रतिनिधित्व में देखा जा सकता है।
उच्च शिक्षा में नेतृत्व स्तर पर प्रतिनिधित्व का संकट
यूजीसी के समानता दिशानिर्देशों से उत्पन्न बहस ने उच्च शिक्षण संस्थानों में वरिष्ठ शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों, जैसे कुलपति, कुलसचिव और वरिष्ठ प्रोफेसर, पर ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों की अत्यंत न्यून उपस्थिति की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। यह स्थिति तब और भी गंभीर प्रतीत होती है जब यह तथ्य सामने आता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों के लिए लगभग 7.5 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों के लिए 15 प्रतिशत और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान मौजूद है।
यदि संविधान लागू हुए पचहत्तर वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इन पदों पर प्रतिनिधित्व अत्यंत सीमित बना हुआ है, तो प्रश्न केवल “योग्यता” या “मेरिट” तक सीमित नहीं रह जाता। तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम उन संरचनात्मक और संस्थागत बाधाओं की पहचान करें जो आज भी सामाजिक बहिष्करण को पुनरुत्पादित कर रही हैं। क्या यह अल्प-प्रतिनिधित्व व्यक्तिगत अक्षमता का परिणाम है, या फिर यह समाज में व्याप्त जातिगत पूर्वाग्रहों, अनौपचारिक नेटवर्कों और अपारदर्शी चयन प्रक्रियाओं का द्योतक है?
अनौपचारिकता, अपारदर्शिता और अभिजात वर्ग का वर्चस्व
यह समस्या केवल उच्च शिक्षा तक सीमित नहीं है। इसी प्रकार की प्रवृत्तियाँ उच्च न्यायपालिका और अन्य शासन-संबंधी संस्थाओं में भी देखी जा सकती हैं, विशेषकर वहाँ जहाँ नियुक्ति प्रक्रियाएँ पारदर्शी नहीं हैं और साक्षात्कार, लॉबिंग तथा सामाजिक संपर्कों पर अत्यधिक निर्भर करती हैं। ऐसे संदर्भों में सामाजिक पूंजी, जो प्रायः जातिगत विशेषाधिकार से जुड़ी होती है, निर्णायक भूमिका निभाती है।
इसके विपरीत, संघ लोक सेवा आयोग, राज्य लोक सेवा आयोग, स्टाफ सिलेक्शन कमीशन, बैंकिंग सेवा चयन जैसी संस्थाओं के माध्यम से होने वाली भर्ती अपेक्षाकृत अधिक संतोषजनक प्रतीत होती है। इन संस्थाओं में नियमबद्ध प्रक्रियाएँ और उत्तरदायित्व सुनिश्चित होने के कारण व्यवस्था में हेरफेर की संभावना कम होती है और प्रतिनिधित्व अधिक समावेशी बन पाता है।
“अनारक्षित” पदों को लेकर व्याप्त भ्रांति
सामाजिक बहिष्करण को सामान्यीकृत करने वाली एक गंभीर वैचारिक भ्रांति यह है कि “अनारक्षित” पदों को स्वाभाविक रूप से सामान्य वर्ग के लिए ही माना जाता है। यह धारणा न केवल गलत है, बल्कि संवैधानिक दृष्टि से भी अस्वीकार्य है। अनारक्षित पद किसी भी पात्र उम्मीदवार के लिए खुले होते हैं, चाहे उसकी जातिगत पहचान कुछ भी हो।
यदि जनसंख्या के मात्र 10–15 प्रतिशत हिस्से से आने वाले वर्ग के लिए परोक्ष रूप से 50 प्रतिशत से अधिक पद सुरक्षित माने जाने लगें, तो यह न केवल संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन है, बल्कि वितरणात्मक न्याय की अवधारणा के भी विपरीत है।
औपचारिक ढांचे से परे सत्ता का प्रश्न
प्रतिनिधित्व का संकट उन अनौपचारिक किंतु प्रभावशाली पदों में और भी स्पष्ट हो जाता है, जो औपचारिक आरक्षण ढांचे से बाहर हैं, उदा जैसे मंत्रियों के अतिरिक्त निजी सचिव (APS), विशेष कार्य अधिकारी (OSD) और अन्य सलाहकार पद। ये पद भले ही अस्थायी हों, किंतु नीति निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों पर इनका प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। इन पदों पर वंचित समुदायों की लगभग अनुपस्थिति सत्ता से उनके बहिष्करण को और सुदृढ़ करती है।
इसी प्रकार, सचिव, संयुक्त सचिव और उप-सचिव जैसे वरिष्ठ नौकरशाही पदों पर भी यदि प्रतिनिधित्व असंतुलित बना हुआ है, तो समाज को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है, न कि इस वास्तविकता से आँख मूँद लेने की।
एकता, बंधुत्व और साझा उत्तरदायित्व
यदि भारत को 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनना है, तो सामाजिक एकता अनिवार्य है। किंतु यह अपेक्षा कि एकता का बोझ सभी वर्गों पर समान रूप से डाला जाए यह ऐतिहासिक और नैतिक दोनों दृष्टियों से अनुचित है। जिन वर्गों ने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक संरचनाओं से लाभ उठाया है, उन पर सुधारात्मक नीतियों को स्वीकार करने की अधिक जिम्मेदारी है।
साथ ही, यह स्वीकार करना भी आवश्यक है कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के भीतर भी आंतरिक असमानताएँ विद्यमान हैं। कुछ वर्गों ने संवैधानिक सुरक्षा का अपेक्षाकृत अधिक लाभ उठाया है, जबकि अन्य अब भी वंचित हैं। सामाजिक न्याय तभी टिकाऊ हो सकता है जब इन आंतरिक विषमताओं को भी संबोधित किया जाए।
जाति, वर्ग और आर्थिक वंचना
यह भी उतना ही आवश्यक है कि जाति और वर्ग के अंतर्संबंध को समझा जाए। अनेक व्यक्ति, जो पारंपरिक रूप से उच्च जातियों से आते हैं, आज भारत की आर्थिक संरचना के निम्नतम स्तर पर जीवन यापन कर रहे हैं और गंभीर अभाव झेल रहे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आरक्षण का प्रावधान इसी यथार्थ को संबोधित करने का प्रयास है।
आर्थिक वंचना वह चाहे वह किसी भी जाति में हो, नीतिगत हस्तक्षेप की मांग करती है। यदि सामाजिक न्याय की परिकल्पना को चरितार्थ करना है तो हमें भौतिक अभाव की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
समकालीन यथार्थ और जाति जनगणना की आवश्यकता
यूजीसी के दिशानिर्देशों के विरोध में हुए हालिया प्रदर्शनों में जातिगत अपशब्दों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जाति-चेतना समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में यह दावा कि जातिगत विभाजन स्वतः समाप्त हो रहे हैं वह तथ्यात्मक रूप से संदिग्ध प्रतीत होता है।
इसी संदर्भ में आगामी जनगणना में जाति जनगणना कराना अधिक प्रासंगिक हो जाता है। विश्वसनीय और वर्गीकृत आँकड़े यह स्पष्ट करने में सहायक होंगे कि कौन-से समुदाय सशक्त हुए हैं, कौन-से अब भी हाशिए पर हैं, और इसके कारण क्या हैं। विचारधारात्मक आग्रहों के स्थान पर साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण की यही अनिवार्य शर्त है।
निष्कर्ष:
अंततः, भारत के संवैधानिक परियोजना की सफलता बंधुत्व की स्थापना पर निर्भर करती है, एक ऐसी भावना जो साझा पहचान और पारस्परिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करती है। जैसा कि डॉ. अंबेडकर ने चेतावनी दी थी, गहन असमानताओं से विभाजित समाज लोकतंत्र को बनाए नहीं रख सकता।
यदि परिवार के कुछ सदस्य कुपोषित या अविकसित हैं, तो सामूहिक कल्याण की माँग है कि उन्हें विशेष देखभाल प्रदान की जाए। इसी प्रकार, यूजीसी के समानता दिशानिर्देशों को दमन के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि संविधान के परिवर्तनकारी वचन को साकार करने के साधन के रूप में देखा जाना चाहिए।
इनकार से विभाजित समाज टिक नहीं सकता; न्याय और बंधुत्व से सशक्त गणराज्य ही स्थायी हो सकता है।
सर, आपका लेख पढ़कर विषय को समझने का एक संतुलित दृष्टिकोण मिला। आपने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और समान अवसर के मुद्दे को ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भ में स्पष्ट तरीके से रखा है। साथ ही यह भी अच्छा लगा कि लेख में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की चुनौतियों को भी स्वीकार किया गया है। इस तरह की गंभीर और तथ्य आधारित चर्चा समाज के लिए बहुत आवश्यक है। धन्यवाद सर, इतना विचारोत्तेजक लेख साझा करने के लिए।
ReplyDeleteकृशांक, आपके सुविचारित टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
DeleteThoughtful analysis!
ReplyDeleteThanks for reading Sandip🙏🌺
Deleteमहोदय, विषय भेदभावपूर्ण यूजीसी दिशानिर्देश थे, न कि उच्च पदों पर हाशिए पर पड़े वर्गों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व। और यदि आप अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर चर्चा कर रहे हैं, तो हमें इस बारे में बात करनी चाहिए।
ReplyDeleteमेरा लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद अर्जुन. I might disagree with your stand but you have every right to disagree with mine. Thats the beauty of being a student of Social Sciences 🙏
DeleteYes sir I have utmost respect and regards for you. As a student I have always learnt from you . I don't intend to disrespect you but putting own opinion is what I have learnt from you .
Deleteआरक्षण के 75 साल बाद भी क्यों? आरक्षण लागू करने में हम कहां चूक रहे हैं? क्या 90 अंकों के बजाय 33 अंकों को अवसर देना हमारे देश के लिए फायदेमंद है? अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के दुरुपयोग का क्या?
ReplyDeleteआप के टिपणी के लिए धन्यवाद अर्जुन 🙏
Deleteक्या इस तरह हम डॉ. बी.आर. अंबेडकर के सपनों का राष्ट्र बना पाएंगे?
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Deleteबहुत श्रम से संतुलित बात कही है आपने विवेकानंद जी, आपको बधाई और लेखन के लिए धन्यवाद, लेखन मे भाषा, तर्क और टिप्पणियों में आपकी उदारता प्रकट होती है, वर्तमान प्रश्न यह है कि यूजीसी के नियम को कैसे लागू किया जाए? इसी प्रकार या कुछ संशोधन के साथ, क्या उसमें संसदीय समिति के सुझाव को शामिल किया जाए या नहीं? यह यक्ष प्रश्न है अनेक विद्वानों के लिए,
Deleteमेरी राय है कि शब्द “caste discrimination” को उदार बनाया जाए, means हटा कर include किया जाए, sc st obc के पूर्व including लगाया जाए, जानबूझकर की गई शिकायत के लिए कार्यवाही का प्रावधान हो, आदि यह अभी हायपोथेसिस के रूप मे लिया जा सकता है, क्योंकि मेरे प्रस्ताव मे भी कई ifs और buts हैं, और इस पर चर्चा के बाद निर्णय लिया जाना चाहिए
धन्यवाद अनुराग जी 🙏🌺आप ने अत्यंत समर्पक सुझाव दिए है. कमस कम इस बात पर हम सब सोच रहें है यह सकारात्मक पहलु है 🙏
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